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Monday, July 26, 2010

महानगर


महानगरों में बने रहते हैं हम
अपने आप को लगातार
ढूँढ़ते हुये
महानगर के बोझ को
अपने कमजोर कंधों पर ढोते हुये
अभिमान से अभिज्ञान के लम्बे सफर में
बेतरतीब उलझे हुये हम
महानगर की धमक हमें
हर कदम पर
साफ सुनाई देती है
इसकी चाल में बड़ा बेरहम शोर है
वह घंटों अपने आप से ही बोलता बतियाता है
किसी जीवित शख्स के साथ
दो पल बतियाने का समय नहीं है उसके पास

हम महानगर के शयनकक्ष में आ गये हैं
यहीं अपने आप को पूरी तरह खोने का
सही सही मुआवजा लेंगे

दूर तक बिखरी हुई उदासी से खुशी के
बारीक कणों को
छानते हुये
महानगर के सताये हुये हम
अपने गाँवों-कस्बों से
बटोर लायी हुई खुशियों
को बड़ी कँजूसी से खर्च करते हैं

महानगर के करीब आने पर हमें
अपने बरसों के गठरी
किये हुये सपनों को
परे सरका कर उसकी कठोर जमीन पर
नंगे पाँव चलनें की आदत डालनी पडी है

उसके पास खबरों का दूर तक
फैला हुआ कारोबार है
पर जो महीन खबरें महानगर के पथरीले पाँवों के
नीचें आकर कुचली जाती हैं
वे ही हम सबके लिये बड़ी पीड़ा का
सबब बनती हैं
ये विशाल नगर
एक हाथ से देने में आना कानी
करते हैं पर
दोनों हाथों से छीनते हुये
जरा भी संकोच नहीं करते
अपनी अद्‍भुत विशेषताओं के कारण
एक साथ कई रंग दिखाने में माहिर है महानगर

फ्लाई ओवर के नीचे से गुजरते हुये
एक रेडिमेड उदासी हमारे अगल-बगल
हो लेती है
लम्बी चौड़ी इमारतें, मैट्रो हमें
तुम्हारी बादशाहत और
झोपडी हमें अपने फक्कड़पन का
अहसास दिला देती है

तुम्हें लाँघते हुये चलते चलना
अपने आप को
बड़ा दिलासा देना है
तुम्हारी चाल बहुत तेज है महानगर
पर तुम्हें शायद मालूम नही
एक समय के बाद
दौड़ते-फाँदते, इठलाते खरगोश की
चाल भी मंद पड़ जाती है।


कवयित्री- विपिन चौधरी

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

महानगर के सताये हुये हम
अपने गाँवों-कस्बों से
बटोर लायी हुई खुशियों
को बड़ी कँजूसी से खर्च करते हैं
और फिर
एक समय के बाद
दौड़ते-फाँदते, इठलाते खरगोश की
चाल भी मंद पड़ जाती है।
महानगर और गाँव के अंतर्द्वन्द को बहुत खूबसूरती से बयान किया है

Deepali Sangwan का कहना है कि -

फ्लाई ओवर के नीचे से गुजरते हुये
एक रेडिमेड उदासी हमारे अगल -बगल
हो लेती है
kya baat hai vipin ji, shaandar kavita, teekha kataksh.

sada का कहना है कि -

तुम्हें लाँघते हुये चलते चलना
अपने आप को
बड़ा दिलासा देना है
तुम्हारी चाल बहुत तेज है महानगर
पर तुम्हें शायद मालूम नही
एक समय के बाद
दौड़ते-फाँदते, इठलाते खरगोश की
चाल भी मंद पड़ जाती है।
बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

nishant का कहना है कि -

apni maa chudaaaiye

nishant का कहना है कि -
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