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Wednesday, February 24, 2010

देखो, कहीं सपेरा है क्या--गज़ल


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जग में कुछ भी तेरा है क्या
जोगी-वाला फेरा है क्या

नाहक आँखें बरसाती हैं
बिरहन रैन, सवेरा है क्या

घर अपना, पर हम बेगाने
वक्त का उलटा फेरा है क्या

लगता बीवी-बच्चों के बिन
घर भूतों का डेरा है क्या

घूम रहे विषधर बस्ती में
देखो, कहीं सपेरा है क्या

सबकी ही सुनता है वो 'श्याम’
तूने  उसको टेरा है क्या  है

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

अमिताभ मीत का कहना है कि -

बढ़िया है श्याम भाई ....

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बहुत खूब श्याम सखा जी को इस के लिये बधाई। धन्यवाद्

Anonymous का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर रचना , श्याम जी को बहुत बहुत बधाइयाँ , धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

pravesh soni का कहना है कि -

sunder arth purn .......badhai

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

घर अपना, पर हम बेगाने
वक्त का उलटा फेरा है क्या

बहुत खूब....सुंदर रचना श्याम जी..

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