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Saturday, February 07, 2009

फिर नयन उन्माद छाया



प्रेम की ऋतु फिर से आई
फिर नयन उन्माद छाया
फिर जगी है प्यास कोई
फिर से कोई याद आयाफिर खिलीं कलियाँ चमन में
रूप रस मदमा रहीं----
प्रेम की मदिरा की गागर
विश्व में ढलका रही
फिर पवन का दूत लेकर
प्रेम का पैगाम आया-----
टूटी है फिर से समाधि
आज इक महादेव की
काम के तीरों से छलनी
है कोई योगी-यति
धीर और गम्भीर ने भी
रसिक का बाना बनाया—
करते हैं नर्तन खुशी से
देव मानव सुर- असुर
‘प्रेम के उत्सव’ में डूबे
प्रेम रस में सब हैं चूर
प्रेम की वर्षा में देखो
सृष्टि का कण-कण नहाया
प्रेम रस की इस नदी में
आओ नफ़रत को डुबा दें
एकता का भाव समझें
भिन्नता दिल से मिटा दें
प्रान्तीयता का भाव देखो
राष्ट्रीयता में है समाया--

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

संगीता पुरी का कहना है कि -

बहुत अच्‍छी रचना....अच्‍छा लगा पढकर...

Asha joglekar का कहना है कि -

प्रेम की वर्षा में देखो
सृष्टि का कण-कण नहाया ।

सुंदर वासंती रचना

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सुंदर रचना |
बधाई

अवनीश तिवारी

तपन शर्मा का कहना है कि -

प्रान्तीयता का भाव देखो
राष्ट्रीयता में है समाया...

प्रेम की ऋतु फिर से आई
फिर नयन उन्माद छाया..
"नयन उन्माद" ..:)
अच्छी रचना है

manu का कहना है कि -

टूटी है फ़िर से समाधि.....आज इक महादेव की ....
आपको पढ़ना सुखदायी रहा.........बहुत अच्छा लिखा है...

neelam का कहना है कि -

प्रेम रस की इस नदी में
आओ नफ़रत को डुबा दें
एकता का भाव समझें
भिन्नता दिल से मिटा दें
प्रान्तीयता का भाव देखो
राष्ट्रीयता में है समाया--

vaasaanti prem se raastra prem tak
le jaati hui ,achcha sandesh deti hui ,achchi rachna
badhaai sweekaaren ,sobha ji

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

सुंदर,बहुत सुंदर...
आलोक सिंह "साहिल"

rachana का कहना है कि -

प्रेम रस की इस नदी में
आओ नफ़रत को डुबा दें
एकता का भाव समझें
भिन्नता दिल से मिटा दें
प्रान्तीयता का भाव देखो
राष्ट्रीयता में है समाया

bahut manoram
rachana

sumit का कहना है कि -

प्रेम रस की इस नदी में
आओ नफ़रत को डुबा दें
एकता का भाव समझें
भिन्नता दिल से मिटा दें
प्रान्तीयता का भाव देखो
राष्ट्रीयता में है समाया--

वाह,
कविता बहुत अच्छी लगी
सुमित भारद्वाज

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

गीत गुनगुनाती सी सुंदर पंक्तियाँ
सादर!!

shyamskhashyam का कहना है कि -

धीर और गम्भीर ने भी
रसिक का बाना बनाया—

मधुर भावों से ओतप्रोत
गीत मेरे मन को भाया
सखी लौट फ़िर सावन आया
श्यान सखा श्याम

mohammad ahsan का कहना है कि -

हिन्दी की कविता में उर्दू के दो तीन शब्द मन में गड़ते रहे

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