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Saturday, August 23, 2008

कृष्ण तेरा युद्ध दर्शन क्या कहें, मौत के सुनसान की बस भोर है


इस जन्माष्टमी पर प्रेमचंद सहजवाला कृष्ण से कुछ सवाल करना चाहते हैं

राम और कृष्ण हिंदू समाज के लिए भगवान् के रूप हैं. राम विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं और कृष्ण आठवें. त्रेता युग का प्रारंभ उस समय हुआ जब परशुराम जो कि छठे अवतार माने जाते हैं, का जन्म हुआ. इस दिवस पर 'अक्षय तृतीय' या आम भाषा में 'आखा तीज' मनाया जाता है. इसी दिन कहते हैं कि गंगा नदी भी स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी थी. तमाम प्रागैतिहासिक बातों के विषय में कहा जाता है कि इन में तर्क न करो, इन को ज्यों का त्यों मान लो.

चलिए, मान लिया कि राम भी हुए, जहाँ बजरंगदल कहता है कि रामसेतु है, वहीं राम सेतु भी है और यह भी कि कृष्ण ने अपनी अंगुली पर पहाड़ उठा कर मथुरा वासियों को भारी बारिश से बचाया था और कि द्रौपदी के अपमान के समय उन्होंने कई मील लम्बी साड़ी का भी निर्माण कर लिया था और द्रौपदी की लाज भी बच गई थी. इस पर मीरा बाई कितना इतरा कर कहती हैं:

हरी तुम हरो जन की पीर
द्रौपदी की लाज राखी तुम बढायो चीर.


मीरा बाई की शादी हुई तो पति से कह दिया कि वे कृष्ण से पहले ही विवाहित हैं और जब उन्हें ज़हर का प्याला दिया गया तो वह भी सहर्ष पी लिया उन्होंने. यदि आज कोई मीरा ऐसा करे तो मुमकिन है कि उसका पति अदालत में conjugal rights का मुकद्दमा दायर कर दे. एक थी राधा जो कृष्ण से बहुत प्यार करती थी. कृष्ण ने उससे कहा भी था कि लोग पहले राधा का नाम लेंगे और फिर कृष्ण का. इसीलिए लोग झूम झूम कर गाते हैं:

राधे राधे
श्याम श्याम
राधे राधे
श्याम श्याम


पर कई विचारकों ने प्रश्न उठाये हैं कि हे कृष्ण तुम क्षत्रिय कुल में जन्मे. पर तुम्हें यशोदा और नन्द ने पाला और बड़ा किया. वे लोग यादव थे. यादवों के बीच तुम खेले कूदे. यादव लोग आज OBC में माने जाते हैं. पर कृष्ण, तुम ने किसी भी OBC लड़की से शादी नहीं की. राधा का तो कुछ लोग कहते हैं कि वह कृष्ण से बहुत बड़ी थी और कई यह कि वह तो विवाहित थी या यह कि वह उनकी रिश्तेदार थी. पर कई लड़कियों के तुम कपड़े चुराते थे और बांसुरी बजा कर ऐसा अलौकिक दृश्य उत्पन्न करते थे कि हर गोपी को लगे कि कृष्ण उसी के साथ नाच रहा है. पर तुम्हारी सब रानियाँ क्षत्राणी थी. रुक्मिणी, सत्याभ्रामा , सत्या, जामवती, लक्ष्मणा, भद्रा, मित्रवृन्दा, कालिंदी. ये सब क्षत्रानियाँ यानी उच्च जाति की थी. कृष्ण, शादियों की बात जाने दो. पर सब से अधिक जो प्रश्न दुनिया के विचारकों को विचलित करता है वह यह कि तुमने महाभारत जैसा सर्वनाशी युद्ध क्यों होने दिया. जब तुम एक से बढ़ कर एक चमत्कार कर सकते हो, आकाश जितने ऊंचे हो सकते हो, बचपन में ही अपने पालने से लात लम्बी कर के किसी राक्षस को मार सकते हो, पूतना के स्तन को काट कर उसे मार सकते हो, और तो और तुम नदी में प्रवेश कर के काली नाग को भी मौत के घाट उतार सकते हो, तो दुर्योधन क्या चीज़ थी तुम्हारे लिए. दुर्योधन का हृदय परिवर्तन क्यों न कर पाए और शान्ति दूत क्यों न बन पाये, बजाय युद्ध दूत बनने के. जब युद्ध हुआ तो प्रारंभ में ही एक शान्ति दूत अर्जुन ने हथियार रख दिए.उस शान्ति दूत अर्जुन को तुमने युद्ध करने की शिक्षा दी, कि यदि तुम युद्ध नहीं लडोगे तो क्षत्रिय धर्म की हानि होगी. यदि युद्ध जीत गए तो जीत का फल भोगोगे और यदि मृत्यु को प्राप्त हुए तो मुझ में विलीन हो जाओगे. पर क्या पांडव भाई युद्ध जीतने का फल भोग पाये? नहीं. जीत के क्षण उन के चारों तरफ़ मौत का एक विराट सुनसान था. पांडव भाई हिमालय चले गए. कुरु वंश की आखिरी निशानी राजा परीक्षित को तक्षक सौंप डस गया. गांधारी, ध्रृतराष्ट्र और कुंती ने कई वर्ष बाद जंगल में आत्म-दाह कर लिया. यह कैसी जीत थी? ये पन्ने पढ़ कर तो मेरा कवि मन कह उठता है:

कृष्ण तेरा युद्ध दर्शन क्या कहें,
मौत के सुनसान की बस भोर है.


गांधी जैसे विचारक जो श्रीमद भगवत गीता को अहिंसा की प्रेरणा देना वाली रचना मानते हैं, प्रश्न उठाते हैं की गीता के केवल पहले डेढ़ अध्याय में युद्ध की बात है और शेष साढे सोलह अध्यायों में कई शिक्षाएं हैं. कहीं यह तो नहीं कि डेढ़ अध्याय और साढे सोलह अध्याय अलग अलग समयों पर लिखे गए हों और बाद में आकस्मिक तरीके से मिला दिए गए हों? कुछ लोग यह भी मानते हैं कि साढ़े सोलह अध्याय जिन में अहिंसा की शिक्षा भी कहीं कहीं है, वे गौतम बुद्ध के जन्म के बाद कई विचारकों ने जोड़ दी. गांधी को भी विश्वास नहीं आता कि ऐसा सर्वविनाश्कारी युद्ध कोई प्रेरणा का विषय हो सकता है. पर वे अपने तरीके से इस बात में शरण लेते हैं कि महाभारत से तो यही शिक्षा मिलती है कि युद्ध के बाद कोई नहीं जीत पाता और हर तरफ़ विध्वंस ही विध्वंस नज़र आता है!

कृष्ण, गांधारी ने तुम्हें शाप दिया. महाभारत के बाद लोग इस कदर विक्षिप्त हो गए कि छोटे छोटे तिनके उठा कर मंत्र पढने लगे और तिनके अग्नि की लौ से जलने लगे और उनके किसी भी शत्रु का जा कर वंश सहित विनाश करने लगे. गांधारी ने तुम्हें शाप दिया और कहा कि हे मधुसूदन, मुझे विश्वास नहीं कि यह सब तुम ने किया. और एक दिन तुम स्वयं भी एक निम्न जाति के लड़के के तीर से चल बसे. इस बीच तुम्हारे अपने राज्य में भी अभागे नर-नारी अपनी जानें बचाने को विवश हो गए क्यों कि कई असामाजिक तत्त्व उनके अपहरण कर रहे थे. अर्जुन ने कोशिश की थी और वह कई लोगों को बचा कर सुरक्षित जगह पर जा रहे थे पर सफल नहीं हुए. कई नारियों ने असहाय सी हो कर अपहरणकर्ताओं के पास जाना स्वीकार कर लिया. तुमने अश्वत्थामा को अभिशाप दिया कि वह कभी नहीं मरेगा और शाश्वत रूप से बदले की आग में जलेगा क्यों कि अपने पिता द्रोन की शहादत के बाद उसने धोखे से बदला लेते हुए द्रौपदी के भाइयों और पुत्रों को मार दिया था. पर कृष्ण, पूरा का पूरा महाभारत बदले की ही तो कहानी थी जो तुम ने रची!

आज जब पूरा विश्व आतंकवाद और युद्ध की अग्नि में जल रहा है तब किसी शान्ति दूत की आवश्यकता है. पर कृष्ण, आज हर विचारवान व्यक्ति के मन में यही जिज्ञासा है कि क्या तुम चाहते तो वह युद्ध रुक नहीं सकता था? यदि तुम ऐसा युद्ध टाल सकते तो क्या आज जितनी पूजा तुम्हारी हो रही है, उससे हज़ार गुना अधिक न होती? अपने जन्म दिवस पर तुम्हें मेरी इस जिज्ञासा का उत्तर देना पड़ेगा.

---प्रेमचंद सहजवाला

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29 कविताप्रेमियों का कहना है :

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की बधाई |
ईश्वर आपके जिज्ञासा का उतार दे , ऐसी मंगल कामना |

मेरा विचार है कि -
१. कृष्ण शान्ति दूत बनकर गए थे लेकिन उनका प्रस्ताव स्वीकार नही गया |
२. कृष्ण प्रसंग के साथ OBC आदि जोड़ना कोई तार्किक नही दिखता |
३. महाभारत बिना युध्य के अधूरा होगा क्योंकि उसमे गीता उपदेश नही होगा |
४. महाभारत युध्य एक शैक्षणिक युध्य था | मैंने तो सूना है IIM के छात्र महाभारत के पात्र और युध्य का विश्लेषण करके उससे प्रबंधन के गुन सीखने की तैयारी में है |
जो हुया सब अच्छा ही तो था |


--- अवनीश तिवारी

रंजना का कहना है कि -

ईश्वर आपको सदबुद्धि दें और यदि सचमुच आप ज्ञान पिपासुं हैं,जो प्रश्न आपने मन में उठे हैं,उनका उत्तर चाहते हैं तो आपके शंकाओं का समाधान भी करें.यही अभिलाषा है. वैसे एक बार आस्था की नजरों से देख विषय वस्तु से सम्बंधित पुस्तकों का गहन अध्यन करेंगे तो उत्तर अवश्य मिलेगा.

तपन शर्मा का कहना है कि -

कृष्ण जन्माष्टमी की सभी पाठकों को बधाई..

तपन शर्मा का कहना है कि -

क्या कहूँ प्रेमचंद जी.. आप उम्र में बढे हैं..
राम के विषय में भी आपने कुछ ऐसा ही कहा था.. लगता है आप ईश्वर में यकीन नहीं करते..या राम कॄष्ण को ईश्वर नहीं मानते हैं.. कोई बात नहीं है.. मेरे कईं बहुत अच्छे मित्र हैं जो ईश्वर में यकीन नहीं करते हैं.. पर...ऐसे बेतुके सवाल वो नहीं करते हैं...ईश्वर में विश्वास या अविश्वास सबका अपना मत है..किन्तु किसी भी बात को बिना परखे जाने कह जाना..माफ कीजियेगा..मूर्खता है..मैं जानता हूँ आप बढें हैं हमसे..और इतने कटु शब्दों के लिये माफी चाहता हूँ..पर आपने मुझे मजबूर कर दिया है..

मैं चाहता हूँ आप पहले मानस.. और महाभारत..गीता सब पढें.. आपको उत्तर मिलेगा..
अवनीश जी ने जो ऊपर लिखा है वो सही लिखा है..एक बार दोबारा पढें..

१. कृष्ण शान्ति दूत बनकर गए थे लेकिन उनका प्रस्ताव स्वीकार नही गया |
२. कृष्ण प्रसंग के साथ OBC आदि जोड़ना कोई तार्किक नही दिखता |
३. महाभारत बिना युध्य के अधूरा होगा क्योंकि उसमे गीता उपदेश नही होगा |
४. महाभारत युध्य एक शैक्षणिक युध्य था | मैंने तो सूना है IIM के छात्र महाभारत के पात्र और युध्य का विश्लेषण करके उससे प्रबंधन के गुन सीखने की तैयारी में है |
जो हुया सब अच्छा ही तो था |

मुझे सिखाया गया है..कहीं से भी अच्छा मिले उसे अपना लो..आप गीता की आपके मुताबिक वाली "बुरी" बातों पर न जायें और अच्छी बातों को ग्रहण करें... कृष्ण आपको स्वयं उत्तर देंगे..

Anonymous का कहना है कि -

हिन्द युग्म इस तरह के लेख अपनी पब्लिसिटी के लिये छापता है। शर्मनाक लेख है।

RAVI KANT का कहना है कि -

"राम और कृष्ण हिंदू समाज के लिए भगवान् के रूप हैं"... कृष्ण जैसा विराट व्यक्तित्व किसी एक समाज से संबंधित नहीं होता वरन जिनके हृदय में भी सत्य की प्यास है उनके लिये कृष्ण भगवान हैं।
"कृष्ण, तुम ने किसी भी OBC लड़की से शादी नहीं की"...शादी के लिए प्रेम की अनिवार्यता है, जाति की नहीं।
"दुर्योधन का हृदय परिवर्तन क्यों न कर पाए और शान्ति दूत क्यों न बन पाये, बजाय युद्ध दूत बनने के"...ताली एक हाथ से नहीं बजती।

"कुछ लोग यह भी मानते हैं कि साढ़े सोलह अध्याय जिन में अहिंसा की शिक्षा भी कहीं कहीं है, वे गौतम बुद्ध के जन्म के बाद कई विचारकों ने जोड़ दी"... गीता उपनिष्दों का सार है और स्वयं बुद्ध ने भी उपनिषद पढ़ा था अतः शंका निर्मूल है।
"यदि तुम ऐसा युद्ध टाल सकते तो क्या आज जितनी पूजा तुम्हारी हो रही है, उससे हज़ार गुना अधिक न होती? "...आत्मज्ञानी किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं रखते। यह तो सीधे -सीधे बनिये की बुद्धि है जो ज्यादा पूजा के लालच में ऐसा करने की सोचे।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सभी मित्रों को जन्माष्टमी की शुभ कामनाएं.
इस शुभ अवसर पैर ऐसी विवादित पोस्ट डालने का औचित्य नज़र नहीं आया.

Kheteshwar Borawat, B.tech, SASTRA UNIVERSITY का कहना है कि -

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं |


हिन्दी में लिखने की लिए पर जायें

http://hindiinternet.blogspot.com/

हरि का कहना है कि -

रंजना जी कह रहीं हैं कि लेखक को प्रभु सद्-बुद्धि दें लेकिन साहित्य संदर्भों में समालोचना का हक सभी को है। इसलिए प्रेमचंद जी को अपने विचार रखने का पूरा हक है। आप यदि सहमत नहीं हैं तो उन्हें तर्कों के साथ बताईए कि उन्होंने क्या गलत कहा है व क्या सही। रही बात आस्था की तो उसमें गलत व सही को देखने आैर समझने की शक्ति ही नहीं बचती। क्षमायाचना सहित,

venus kesari का कहना है कि -

हे कृष्ण तुम क्षत्रिय कुल में जन्मे. पर तुम्हें यशोदा और नन्द ने पाला और बड़ा किया. वे लोग यादव थे. यादवों के बीच तुम खेले कूदे. यादव लोग आज OBC में माने जाते हैं. पर कृष्ण, तुम ने किसी भी OBC लड़की से शादी नहीं की. राधा का तो कुछ लोग कहते हैं कि वह कृष्ण से बहुत बड़ी थी और कई यह कि वह तो विवाहित थी या यह कि वह उनकी रिश्तेदार थी

ऐसा जातिवाद??///

ऐसे बेतुके सवाल ?????????

प्रेमचंद सहजवाला ईश्वर आपको सदबुद्धि दें.....

मै वीनस केसरी इस पोस्ट को घोर विरोध करता हूँ और हिन्दी युग्म के संचालक से मांग करता हूँ की इस पोस्ट को जल्द से जल्द ब्लॉग से मिटाया जाए क्योकि हमारा ब्लॉग हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए है न की जातीवाद , छेत्रवाद, और सम्प्रदायिक विवादों से भरी पोस्ट के लिए मै फ़िर से आग्रह करता हूँ की इस पोस्ट को हटाया जाए

वीनस केसरी

venus kesari का कहना है कि -

प्रेमचंद सहजवाला जी
तुलसी जयन्ती विशेष
की आपकी पोस्ट पढ़ी वहां पर भी आलोचना हुई और आज भी आप ने तथ्य दोहराए है
जहाँ बात आस्था की आ जाती है (मै आस्था की बात कर रहा हूँ न की अंधविश्वास की) जहाँ बात आस्था की आती है वहां आदमी कुछ नही सुनना चाहता है क्योकि आस्था के साथ आदमी की आत्म शक्ति का ऐसा जुडाव होता है जिसे आदमी टूटते हुए नही देख सकता है नही देखना चाहता है कृपया आप ऐसी कोई पोस्ट न डाले जिससे किसी की आस्था आहात हो
सविनय
वीनस केसरी

सजीव सारथी का कहना है कि -

आपके सभी तर्क बेहद बेतुके लगे प्रेमचंद जी....कृष्ण अपने हर रूप में जीवन की एक मुक्कमल तस्वीर पेश करते हैं, बस देखने का नजरिया चाहिए.....खैर ...

Prem Chand Sahajwala का कहना है कि -

प्रिय साथियो,
सामान्य तौर पर किसी भी लेखक को पढने वालों की प्रतिक्रियाओं पर अपनी प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए. पर मेरे लेख पर जो आक्रोश उभरा है उसने मुझे कुछ कहने को विवश कर दिया है. कोई मुझे सद्बुद्धि मिलने की प्रार्थना कर रहा है तो कोई जातिवाद या क्षेत्रवाद के आक्षेप लगा रहा है. अधिकांश लोगों ने आस्था की बात कही है. आस्था अक्सर अंध-आस्था में ही बदल जाती है. यह आस्था ही थी जिसने बाबरी मस्जिद टूटने के बाद देश को ही तोड़ दिया और हजारों लोग मौत के घाट उतर गए. यह आस्था ही थी जिस ने NASA द्वारा यह कहे जाने पर कि भारत व श्रीलंका के बीच एक सेतु जैसा कुछ नज़र आता है कि देखते देखते नयी websites बन गई और ज़बरदस्ती उसे रामसेतु का नाम दे कर देश में एक झगडा भी उत्पन्न किया गया और जहाजरानी सम्बन्धी एक विकास कार्य को भी अदालत की चौखट पर ले जा कर उसमें विलंब ही पैदा किया गया. आस्था के दुष्परिणाम असंख्य हैं. मुस्लिम लोग शरिया के नाम पर किस महिला जिस का बलात्कार उस का ससुर करे उसे रातोंरात पति की माँ व ससुर की बीबी करार देते हैं. आस्था की रामकहानी यह कि एक ही गोत्र में शादी करने वाले युगलों को मार कर लोग गंदे नाले में फ़ेंक देते हैं. आस्था ने सती प्रथा प्रारम्भ की थी जिस से बहुत मुश्किल से पीछा छूटा था पर अब भी एक दशक में एकाध ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं. इस आस्था की बात करने वाले राजस्थान जा कर देखें जहाँ अब तक हुई सती महिलाओं के नाम मन्दिर बने हैं और लोग जा कर श्रद्धा से वहां सर नवाते हैं. एक बार दूरदर्शन पर एक अस्सी वर्षीय महिला कह रही थी कि सती में बहुत शक्ति होती है. एक बार मध्य प्रदेश में एक औरत जल गई तो कुछ लोगों ने कहा कि वह सती हो गई है क्यों कि उसी दिन उस का पति मरा था. उस की मृत्यु की छानबीन करने की बजाय मैंने दूरदर्शन पर देखा कि एक आदमी आया और उस स्थल पर पूरा उल्टा लेट गया और आँख मूँद कर उस स्थल का नमन कर रहा था और वहां कि मिट्टी माथे से लगा रहा था. आस्था के कारण महाकुम्भ मेले में साढ़े तीन करोड़ भक्त जमा हुए थे जब कि अल्लाहबाद की जनसँख्या मात्र १२ लाख थी. साढ़े तीन करोड़ लोगों ने कितना प्रदूषण किया होगा यह समझा जा सकता है और यदि मोक्ष मिला तो पेप्सी वालों को जिनकी अरबों रुपये की कमी हो गई. महाकुम्भ मेले में असंख्य साधू नंगे हे घूम रहे थे और अरुंधती राय ने अपने एक लेख में लिखा कि एक IASअधिकारी अपनी पत्नी के साथ कार में बैठ गए और कार के सामने एक नंगा साधू खड़ा हो कर यह चमत्कार दिखाने की कोशिश करने लगा कि वह अपने (तथाकथित पवित्र) गुप्तांग से कार को चला सकता है. अधिकारी की पत्नी क्यों कि गंगा में और धर्मं में आस्था रखती थी इसलिए किसी नंगे व्यक्ति को सामने देखने में उसे कोई संकोच या लाज नहीं थी. गंगा में आस्था के कारण लाखों कांवरिये अपनी ऊर्जा नष्ट करते हैं और यदि दुर्भाग्य से उनमें से कोई ट्रक वृक के नीचे आ जाए तो वे कई ट्रक जला देते हैं. गणेश जी की मूर्तियों के दूध पीने से ले कर साईं बाबा की एक आंख खुल जाने तक मेरे पास असंख्य उदाहरण हैं जिन्हें लिखूं तो पुस्तक बन जायेगी. मैं तो विवेकानंद के इस वाक्य में आस्था रखता हूँ कि 'मैं उस प्रभु का सेवक हूँ जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं.' संयोग से विवेकानंद की एक मूर्ती मैं ने अपने अध्ययन कक्ष की दीवार में लगा राखी हैं और उसी की छाया में बैठ कर लिखता पढता हूँ. आस्था और अंध आस्था में फर्क करना मैं जनता हूँ.
२. एक पाठक ने मुझे फ़ोन कर के पूछा कि मैं क्या पारसी हूँ क्यों कि मेरी surname पालखीवाला या रंगूंवाला से मिलती है. और क्या इसीलिए हिंदू धर्मं की खिल्ली उडाता हूँ. मैं पारसी धर्म के साथ अन्य सभी धर्मों का आदर करता हूँ पर मैं स्वयं हिंदू हूँ इसीलिए हिंदू धर्म पर अधिक लिखता हूँ. एक पुस्तक 'Hinduism through modern spectacles' प्रकाशनाधीन है. वह पढ़ कर तो हिन्दयुग्म में पाठक मुझे और न जाने क्या क्या कहेंगे. धर्म को सही परिप्रेक्ष्य में रखना मैं अधिक उचित मानता हूँ भले ही कोई मुझे अधर्मी कहे कोई मूर्ख. धन्यवाद.

Harihar का कहना है कि -

प्रेमचंद जी, मजेदार बात यह है कि आप परंपरागत
मान्यता के खिलाफ़ लिखेंगे तो आपको गीता, महाभारत गहराई से पढ़ने की नसीहत दी जायगी।
आप आँख मूँद कर "आस्था" की बात मान लीजिये,फिर आपको किसी गहराई की आवश्यकता नहीं पड़ेगी फिर आपने इन ग्रन्थों के दर्शन भी न किये हों तो चल जायगा ।

RAVI KANT का कहना है कि -

आस्था और अंधआस्था में ही फ़र्क की बात हो तो थोड़ी रिसर्च इस पर भी करते कि विवेकानंद को सत्य का कितना अनुभव था????और ये भी कि तथाकथित बुधिजीवियों में वो इतना लोकप्रिय किसलिए हैं???

rachana का कहना है कि -

kisi bhi chij ko dekhne ke kai nazariye hote hain ho sakta hai ki hum ko kahi gai koi baat na pasan ho pr sabhi ko apne vichar rakhne aur baat kahne ki svatantrata to hai hi na .
saader
rachana

venus kesari का कहना है कि -

प्रेमचंद सहजवाला जी आपने जो भी उदाहरण दिए है वो अंध विशवास के उदाहरण है न की आस्था के ....
आस्था वो है जिसके बल पर हम पत्थर की मूर्ती के सामने भी हाँथ जोड़ कर सच्चे दिल से प्रार्थना करते है ....
और अंधविश्वास वो है जब हम उसी मूर्ती को दूध पीता हुआ देख कर ख़ुद भी दूध पिलाने लगते है आप सही कह रहे है की अंधविश्वास समाज को खोखला करता है मगर साथ ही साथ आस्था आदमी को जीने की प्रेरणा देती है चाहे वो राम की आस्था हो रहीम की हो कृष्ण की हो या अल्लाह की हो या वो आस्था हो विवेकानंद जी पर
या हो अपने मात पिता पर या हो हमको बनने वाले परम पिता परमेश्वर पर इससे ज्यादा इस विषय पर कुछ नही कहना चाहता

कुछ नही कह सकता ...........

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

महाभारत पढने का समय न भी हो अपने आसपास देखने भर से ही अधिकाँश प्रश्नों का उत्तर मिल जायेगा.

कृष्ण जिस यदुवंशी कुल में जन्मे वह निस्संदेह क्षत्रिय है - आज आप उसे OBC कहें या एबीसी - आपकी आज की अनुसूची को भूतकाल को परिवर्तित करने का हक नहीं है.

"कपड़े चुराते थे..." पढ़कर मासूम पाठकों को ऐसा लग सकता है जैसे की कृष्ण और कुछ न कर के बस कपड़े ही चुराते रहते थे - ऐसे वाक्य को सवाल की तरह रखने से पहले क्या आपने कभी कहीं पढने की कोशिश की की ऐसा कितनी बार हुआ और किस परिस्थिति में? एकाध ग्रन्थ का हवाला भी देते तो पूर्वाग्रह और तथ्य अन्तर पता लग जाता.

"कहीं यह तो नहीं कि..." यह कहीं अपने में बहुत संभावनाएं समेटे होता है - कहीं यह तो नहीं की आप सिर्फ़ सवाल फैंककर पाठकों को गुमराह करना चाहते हों - उत्तर जानने की इच्छा कतई भी न हो - तथ्य खोजिये, सामने रखिये और अपनी बात सिद्ध करिए - गीता पढी हो तो जान पायेंगे की सभी १८ अध्याय बहुत गहराई से एक दूसरे से गुंथे हैं और अहिंसा, प्रेम, सत्य और अनश्वरता का संदेश पूरी गीता में अमृत की तरह बह रहा है.

"स्वयं भी एक निम्न जाति के लड़के के तीर से..." आप जैसे विद्वानों को किसी भी जाती को उच्च या निम्न कहना शोभा नहीं देता है. कम से लम आज के युग में हमें इस उच्च-निम्न से बाहर आकर गीता के शब्दों में हर प्राणी में समानता ढूंढनी चाहिए.

सत्ता के अंधे तानाशाहों के युद्ध कभी रुकते नहीं. महाभारत से पहले भी होते थे और उसके बाद भी, आज भी होते है. वे किसी भी कृष्ण, बुद्ध, गांधी या दलाई लामा को अपने सामने कुछ नहीं समझते. जिस तरह चीन के तानाशाह तिब्बत की जिम्मेदारी लेने के बजाय दलाई लामा को असंतोष का जिम्मेदार ठहराते हैं उसी तरह तब हुआ.
युद्ध न होता तो क्या होता? - भीष्म राजकुमारियों का अपहरण कर रहे होते, एक्लावा के अंगूठे कट रहे होते, घर की बहुओं का वस्त्र हरण हो रहा होता और लाख के घरों में लोगों को ज़िंदा जलाया जा रहा होता.
अगर और भी सवाल हैं तो मेरी सलाह है की महाभारत पढिये और उस पर वार्ता और मनन करिए. बुद्धिमानों के लिए कोई प्रश्न उत्तर्विहीन नहीं होता है.

जन्माष्टमी की बधाई! श्री कृष्णं वंदे जगदगुरुम!

Anonymous का कहना है कि -

कहीं कुछ गड़बड़ है मानसिकता में लेखक व् हिन्दयुग्म संयोजक के जो ऐसे उत्पत्तंग विचारों को थोप रहें है यूनिपथ्कों पर |परहेज करें

Anonymous का कहना है कि -

कभी हज़रत मुहम्मद इस्लाम या सिख गुरुओं पर लिखने की हिम्मत करें महाश्य हिंदू सहिष्णु हैं इसका फायदा उठा रहें आप और युग्म

तपन शर्मा का कहना है कि -

Anonymous ji..
Aap se gujaarish hai ki aap apna naam to spasht karein...

lekhak apna vichaar rakh raha hai... aap apne rakhein.. tabhi baat banti hai... aapne kahaa yunipathakon par vichaar thope jaa rahe hain.. mujhe to nahin lagta.. sab apna mat rakh rahe hain...
aapne kaha ki lekh sharmnaak hai... kisi ke liye ho sakta hai... aur kisi ke nahin... na aap na hi main koi rules regulations banaate hain...

yun hindyugm ke niyantrak ya lekhak par iljaam na lagaayein... bahas karein.. aapne teen baar post kiya..par daleel nahin di...

venus kesari का कहना है कि -

yun hindyugm ke niyantrak ya lekhak par iljaam na lagaayein... bahas karein..

तपन शर्मा जी मै आपसे केवल एक बात जानना चाहता हूँ क्या अब हमारे पास ये ही विषय बचा है विचार करने के लिए

मै एक बात जानता हूँ

कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति अंधविश्वास को बढ़ावा नही देना चाहेगा
कोई भी भला आदमी किसी के आस्था पर प्रहार नही करना चाहेगा चाहे वह उस विषय पर आस्था रखता हो या नही

अगर एक पत्नी अपने पति पर विश्वास करती है की उसका पति उसकी रच्छा करेगा
तो क्या आप उसको विस्वास दिलाने जायेगे की यदि आपको १० गुंडे पकड़ ले तो आपका पति भी कुछ नही कर पायेगा
जवाब दीजिये तपन जी ?

जब एक आदमी मर रहा हो और अगर उसे विस्वास हो की भगवान् उसको बचा लेगे तो क्या जरूरी है उसको ये विश्वास दिलाना की मै तुमको यकीन दिलाता हूँ की तुम दो दिन में मर जाओगे और तुम्हे भगवान् भी नही बचा सकते?


यदि किसी ने पढ़ा है की कर्म कर फल अच्छा ही मिलेगा
और वह इस बात पर अपनी आस्ता रखता है और फल के बारे में सोंचे बिना अच्छे कर्म करता है तो क्या ये बताना जरूरी है की तुम जो करने जा रहे हो उसका फल बुरा भी हो सकता है भगवान् पर विश्वास मत करो गीता झूटी है कृष्ण तो भगवान् थे ही नही वो तो ख़ुद एक नीचग जाती के थे नीच जाती के हांथो मर गए ..............

यदि कोई आदमी किसी शुभ कार्य की शुरुआत करके जा रहा हो और इसके लिए अनुष्ठान कर रहा हो उसी समय आप पहुच कर उससे कहे की ऐसा मत करो इससे कुछ नही होगा कुछ शुभ नही होता सब मिथ्या है और आओ इस विषय पर हम और चर्चा करे ...
तो वो आदमी आके साथ चर्चा नही करेगा वरन आपको दुत्कारेगा क्योकि वह जिस चीज़ में आस्था रखता है आप उस चीज़ के अस्तित्व को ही नकारने पर तुले हुए है
इसलिए आपसे गुजारिश करता हूँ की विचार विमर्श के लिए किसी और विषय को उठाइए जिसमे किसी की आस्था पर प्रहार न हो और जिस विषय पर स्वस्थ विचार रखे जा सके मै हिन्दी युग्म को ६ महीनो से पढ़ रहा हूँ कुछ दिनों से ही टिप्पडी करने लगा हूँ मगर पहली बार देख रहा हूँ की यहाँ पर हिन्दी को छोड़ कर किसी अन्य विषय पर इस तरह की बांटे हो रही है कृपया इस मंच को हिन्दी के लिए समर्पित रहने दे अगर ऐसे ही विषयों पर चर्चा करनी है तो ब्लोगों की कमी नही है न चर्चा करने वालो की
बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी ........

आपका वीनस केसरी

Harihar का कहना है कि -

इतिहास गवाह है जब धर्म की आड़ ले कर खुल कर विचार विनिमय नहीं किया जाता उस धर्म के
लोग या तो अन्धविश्वासी हो जाते हैं या आक्रामक
व जेहादी हो जाते है। याने या तो खुद को नुकसान
पहुँचाते हैं या फिर औरों को ।

Anonymous का कहना है कि -

na tv eva´ham jatuna´sam na tvam neme janadhipah,
nachai´va na bhavishyamah sarve vayam atah param..12../2/srimadbhagvad geeta//

never was there a time when I was not, nor you, nor these lords of men nor will there ever be a time hereafter when we all shall be cease to be

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

@हरिहर जी आपने जो कहा वह बिल्कुल ठीक है मगर इस लेख पर लागू नहीं होता है क्योंकि इसमें विचार विनिमय की कोई गुंजाइश नहीं है - लेखक ने सिर्फ़ अपने पूर्वाग्रहों को अधकचरे ज्ञान और तोडे-मरोड़े तथ्यों को पाठकों पर थोपने की कोशिश की है अगर ऐसा नहीं होता तो १. लेखक युध्ध न होने की स्थिति के तानाशाहों के कुचले भारत के विकल्प की भी चर्चा करता. २. "कपड़े चुराते थे..." , "कहीं यह तो नहीं कि..." जैसे आधारहीन बातें कहने के बजाय उनके बारे में ठोस तर्क सामने रखता.

@तपन जी, कौन क्यों बेनामी टिप्पणी लिखता है यह हम नहीं जान सकते मगर इस सुविधा के होने के पीछे बहुत से बहुमूल्य कारण हैं और किसी की टिप्पणी सिर्फ़ इसलिए बेकार नहीं हो सकती क्योंकि वह बेनामी है. इसी तरह एक बेतुका लेख सिर्फ़ इसलिये प्रकाशन-योग्य नहीं हो जाता क्योंकि लेखक अपना नाम किसी महान लेखक के साथ जोड़ता है.

@लेखक जी, बुरा न मानें, मगर किसी को "निम्न जाति" का कहना न सिर्फ़ असामाजिक, घमंड से भरा और गैर- जिम्मेदाराना है बल्कि गैर-कानूनी भी है.

bulbula का कहना है कि -

'literate' aur 'educated' mein kya fark hota hai. ye lekh aur uss par sabhi prtikriyaaein padh kar saaf maaloom ho jaata hai.

Anonymous का कहना है कि -

बहुत अच्छा. मैं वास्तव में लोगों को हमारे धर्म के बारे में बहस देखकर खुशी हो रही है. एक सही हिन्दू के रूप में मैं किसी का जनमत दुखी नहीं करना चाहता, नीचे सिर्फ विचारों के लिए एक जवाब है.
प्रेमचंद भाई,
मैं धर्म और मैं पर अपने विचार की और तार्किक जवाब सराहना करते हैं. मैं बस आपसे किताबें ईमानदारी से पढ़ने के लिए और कुछ संशोधन के साथ प्रश्न पूछें, अनुरोध करना चाहते हैं.हाँ, वहाँ सीखने की कोई उम्र होती है. कोई नए विचारों का स्वागत नहीं करता है.विश्वास रखो, बशर्ते आपके विचारों स्वस्थ हैं.हर किसी में है कृष्णा. कृष्ण में है हर कोई.

Anonymous का कहना है कि -

प्रेमचंद जी क्षमा चाहता हूँ पर मैं सोचता हूँ यदि आपने स्वामीजी( स्वामी विवेकानंद जी)के बारे में अधिक पढ़ा होता तो आप शायद इस तरह का लेख कभी नहीं लिखते, स्वामीजी ने वेदांत का पूरे विश्व में प्रचार किया और भगवत गीता वेदांत का सार है और गीता में जो भक्ति,ज्ञान और कर्म योग बताया गया है स्वामी जी ने बहुत ही सरल भाषा में पूरे विश्व को समझाया है आप अंध विश्वास और आस्था में फर्क होता है , आस्था सिर्फ आस्था होती है वो अंधी नहीं होती, आस्था के बिना भक्ति उदय नहीं होती?
भगवान,आत्मा और प्रेम समझने के विषय नहीं हैं ये अनुभूति के विषय हैं, आप ज्यादा से ज्यादा अध्यात्मिक अध्यन और साधना कीजिये आपके सभी प्रश्नों उत्तर में परिडित हो जायेंगे, मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हैं यदि शरीर का कोई अंग बीमार हो जाए और काम करना बंद कर दे तब भी हम उसको अपने से अलग नहीं करते किन्तु यदि वो अंग और अंगों को नुक्सान पहुचाने लगे तो उसको निकाल दिया जाता है, उसी तरह से कृष्ण भगवान ने भी आखिरी वक्त तक शान्ति संदेश भेजा था किन्तु कोरवों ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा, भगवान जो कुछ भी करवाते हैं वो मनुष्य को जगाने (आत्मज्ञान कराने)के लिए करवाते हैं, जिंदगी वो जो जाग्रत और निर्भय हो कर जी जाए और शिक्षा वो जो जीवन के उतार चढाव में अविचलित रहना सिखाए,भगवान कृष्ण ने यही शिक्षा दी थी, स्वामीजी ने भी कहा था कि जानकारी एकत्र करना शिक्षा नहीं है , शिक्षा है मन को एकाग्र करना | जिंदगी एक नाटक है और हम सब उसके कलाकार हैं और इस नाटक का हर दृश्य हमें कुछ न कुछ सिखाता है ,एक ग़लत निर्णय हमारा अनुभव बढाता है और आगे गलती करने से रोकता है और एक सही निर्णय हमारा आत्मविश्वास बढाता है तो निर्णय लेना ज़रूरी है, किसी ने खूब कहा है मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही गुमराह तो वो हैं जो घर से ही नहीं निकले, मुझे आशा है कि भगवान कृष्ण आपके प्रश्नों के उत्तर जल्द ही देंगें यदि आप विश्वास रखेंगे कि आपको आपके प्रश्नों के उत्तर ज़रूर मिलेंगे|

Rashmi Prasad का कहना है कि -

He kanha �� jaldi aao avtaar lekar bohoto ko aap se Kai prasn ke uttar chahiye or is kalyug ko v khatam karo jisme adharm badh chuka hai or apne bhakto ko apni Saran me lekar mokchh do aap ke itezaar me Kai baithe hai nazre garage...

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