फटाफट (25 नई पोस्ट):

Thursday, August 28, 2008

शहर के पेड़


अट्टालिकाओं
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते |
.
विनय के जोशी

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

5 कविताप्रेमियों का कहना है :

sahil का कहना है कि -

क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते |
. वाह! टीस उठ गई.बहुत ही मारक प्रस्तुति
आलोक सिंह "साहिल"

diya22 का कहना है कि -

अद्वितीय कविता.अन्तिम पंक्तिया बहुत ही सुंदर है.जोशी जी इतनी सुंदर कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई कम शब्दों में बहुत बढ़िया प्रस्तुतीकरण

तपन शर्मा का कहना है कि -

क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते |..

जबर्द्स्त अंत... बहुत अच्छा...

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

बहुत ही खूब विनय जी कुछ पंक्तियों में आपने कितनी बड़ी बात कह दी
सिर्फ़ पेड़ नही प्रकृति में मौजूद हर वजूद जिंदा है क्युकी ये आत्महत्या नही करते

rajesh का कहना है कि -

बहुत खूब !!!!!
ये बात सही है
जहाँ न पहुंचे रवि , शशि
वहां पहुचे कवि .
एक मूक , बधिर की आवाज आपने सुनी और एक एक शब्द को बड़े तहे दिल से कविता के माला में गुंथा ...
आपको ढेर सारा साधुवाद

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)