फटाफट (25 नई पोस्ट):

Monday, July 28, 2008

कविता क्या है???


रस्सी पर चलने वाले
नट के हाथों का बांस...

किसी आम आदमी की
असामान्यता
और सामान्यता के बीच
संतुलन साधने की बड़ी कोशिश....

किसी फैक्ट्री से निकले
स्लैग की तरह
मशीनीकृत मानव के
दिमाग की उपज....

कोई एकालाप नहीं
वरन् व्यक्ति विशेष के
विखण्डित व्यक्तित्त्व का
समूह गान.....
सामूहिक क्रंदन.....
सामूहिक वार्त्तालाप.....

हरक्षण के इतिहास को
सहेजने की अनूठी परम्परा...

किसी बेसुरे साज संग
सुर साधने की सफल कोशिश...

राजहंसों के मानिन्द
असहजता से सहजता
चुग लेने की कला....

और भी बहुत कुछ....
जो अकथनीय है....पर
जिनसे हर किसी का
सरोकार है....
..क्योंकि हर कोई
मानसिक रुप से बीमार है...
परेशान है....
..जो थोड़ा-सा खुद के लिए
इंसान है.....
ईमानदार है.....
समझदार है....
कविता किसी एक
स्वनामधन्य की बपौती नहीं

कविता....
आम से आम व्यक्ति के
सरोकार की दुनिया है
एक ऐसी दुनिया....
जिसमें दुनिया बसती है....

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

13 कविताप्रेमियों का कहना है :

Smart Indian का कहना है कि -

"कविता....
आम से आम व्यक्ति के
सरोकार की दुनिया है
एक ऐसी दुनिया....
जिसमें दुनिया बसती है...."


अच्छी लगी कविता की आपकी परिभाषा. उत्तम!

Harihar का कहना है कि -

बहुत अच्छी लगी कविता

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

बहुत अच्छा आपकी सोच और आपकी अभिव्यक्ति की दाद देता हूँ

sahil का कहना है कि -

बेहतरीन परिभाषा.
आलोक सिंह "साहिल"

राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

और भी बहुत कुछ....
जो अकथनीय है....पर
जिनसे हर किसी का
सरोकार है....
..क्योंकि हर कोई
मानसिक रुप से बीमार है...
परेशान है....
..जो थोड़ा-सा खुद के लिए
इंसान है.....
ईमानदार है.....
समझदार है....
कविता किसी एक
स्वनामधन्य की बपौती नहीं
उत्तम.

शोभा का कहना है कि -

कोई एकालाप नहीं
वरन् व्यक्ति विशेष के
विखण्डित व्यक्तित्त्व का
समूह गान.....
सामूहिक क्रंदन.....
सामूहिक वार्त्तालाप.....
अच्छा लिखा है।

rachana का कहना है कि -

sunder soch achchhi kavita
badhi
saader
rachana

Seema Sachdev का कहना है कि -

अभिषेक जी वैसे तो कविता को किसी परिभाषा में बांधा ही नही जा सकता ,फ़िर भी कविता को समझाने का प्रयास ....अच्छा लगा |यही समझाने का प्रयास करते-करते हमने भी एक कविता लिखी थी
.....

हे कविते

हे कविते
क्या पावन
रूप है तुम्हारा
भवुक हृदय का
तुम्ही तो हो सहारा
स्वच्छन्द प्रवाहित निश्चल
ज्यो
सूर्य की पहली किरण से
खिलता हुआ कमल
साहित्याकाश पर
सूर्य की भान्ति देदिप्यमान
कोमल सुन्दर
निष्कपट , बन्धन रहित
भावो का अरमान
हुआ
क्रोञ्च पक्षी का वध
निकले मुँह से ऐसे शब्द
बहने लगी
भावो की ऐसी सरिता
हो गई अमर कविता
बदले
युगो-युगान्त्रो मे
न जाने तुमने कितने रूप
फिर भी
हे कविते
नही बदला तेरा सुरूप
वही
बनी रही
नाजुकता , कोमलता , भावुकता
रहा
हर युग मे
कवि इसमे बहता
हे कविते
नही बन्ध सकती
तुम किसी बन्धन मे
तुम तो
बसती हो
हर भावुक मन मे

devendra का कहना है कि -

हाँ-शायद यही है कविता।

संग्रहणीय चिंतन-देवेन्द्र पाण्डेय।

tanha kavi का कहना है कि -

कविता की क्या खूब परिभाषा दी है आपने!!! ऎसा लगा मानो आज जान पाया हूँ कि कविता क्या होती है।

बधाई स्वीकारें।
-विश्व दीपक ’तन्हा’

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत सुंदर अभिषेक भाई

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

क्या भैया? कविता पर खूब कविता लिखते हैं। एक बार 'कवि की बेटी' लिखा था अब परिभाषा ही लिख डाली। वैसे बढ़िया है।

mona का कहना है कि -

Aapki Kavitaoon ke liye kaha ja sakta hai :
किसी आम आदमी की
असामान्यता
और सामान्यता के बीच
संतुलन साधने की बड़ी कोशिश....

किसी बेसुरे साज संग
सुर साधने की सफल कोशिश...

और भी बहुत कुछ....
जो अकथनीय है....पर
जिनसे हर किसी का
सरोकार है....
..क्योंकि हर कोई
मानसिक रुप से बीमार है...
परेशान है....
kar koi mujhse sehmat hoga ki sahi mane mein aap ki har kavita mein mera upar quote kiya hua sach hai.

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)