प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा
एक धरोहर खड़ी हुई मिथ्या की नीव पर
जिसके नीचे
शवदाह में दबी अस्थियां
इतिहासकारों की परिकल्पना को सहलाती रही
जो जीवित होना चाहते थे
नासमझी पर रोना चाहते थे
ऐसे चमकीले दांत और अस्थियों के अवशेष
जिन्हें फूंक मार कर जिन्दा करने को
लालायित थे तांत्रिक
पर क्रुद्ध मौत के समक्ष जीवन की हार
हुई सिर फुटौवल
खुद ही घंटी बजाता खतरे का निशान
हत्या हुई बलिदान
लो फिर एक कुनामी
बन कर आई सुनामी ।
-हरिहर झा



























12 टिप्पणी:
हरिहर जी,
रचना बेहद प्रभावी है। कुछ बिम्ब अच्छे हैं जिन्हें रचना के आरंभिक पैरा में आपने प्रयुक्त किया है साथ ही कुछ बिम्ब भ्रामक भी जैसे "शवदाह में दबी अस्थियां"। "कौओ", "मोत", "फुटोवल", "कुद्ध" जैसी गलतियों नें रचना को कमजोर किया है।
आपका कथ्य प्रशंसनीय है।
***राजीव रंजन प्रसाद
प्रपंच किया किया कुछ सिरफिरों ने- ---- -भंवर में फंसता रहा। ये पंक्तियॉ बेहद अच्छी हैं।
---देवेन्द्र पाण्डेय।
बहुत बहुत धन्यवाद राजीव जी!
बहुत सुंदर रचना लिखी है आपने हरिहर जी ..
झा जी,
सशक्त रचना है.. परंतु दूसरा पैरा अनेकार्थी सा लग रहा है.. सुगमता खो रहा है..
बधाई
खुद ही घंटी बजाता खतरे का निशान
हत्या हुई बलिदान
लो फिर एक कुनामी
बन कर आई सुनामी
अच्छी लगी यह पंक्तियाँ ...सीमा सचदेव
क्या मतलब है इसका ?
समझा ही नही |
अवनीश तिवारी
हरि हर ji
बहुत ही सुंदर लिखा है अपने-
प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा
बधाई
हरिहर जी ,
प्रथम चंद पंक्तियाँ अच्छी लगी ,
शुभकामनाएँ
^^पूजा अनिल
रचना पूरी तरह से समझ नहीं आई , परंतु जितनी भी समझ आई, अच्छी लगी। ऎसा लगता है कि आप मूल बात को परदे के पीछे हीं रखना चाहते थे, इसलिए अलग-अलग बिंब डाले गए हैं और यही बिंब मुझे असमंजस में डाल रहे हैं।
कुछ पंक्तियाँ बेहद अच्छी हैं जैसे
प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा
-विश्व दीपक ’तन्हा’
हरिहर जी
बहुत ही सुन्दर प्रतीक लिइ हैं-
प्रपंच किया कुछ सिरफिरों ने
रजनी को दिया नाम उषा
किताबी फूलों से भर ली मंजूषा
जिसमें कौओं ने कांव कांव कर पत्थर डाले
असमंजस में पड़ा नादान इंसान
डूबता रहा आस्थाओं में
भंवर में फंसता रहा
एक सशक्त रचना के लिए बधाई।
बहुत सुंदर बधाई
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