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Thursday, April 10, 2008

अहम



अपने मैं होने का
दंभ क्यों
कैसे
जहन पर
छा जाता है

सोते जागते
हँसते गाते
हर वक़्त बस
मैं ,मैं
का राग
यह दिल
अलापता है

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक बना
पाता है....

जैसे रात का
अस्तित्व भी
चाँद,तारों
जुगनू से
जगमगाता है

पर यदि सोचे चाँद
ख़ुद को अहम
अपनी ही धुन में
खोया सा
घुलते घुलते
बस सिर्फ़ एक
लकीर सा
रह जाता है
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है !!

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23 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

पर यदि सोचे चाँद
ख़ुद को अहम
अपनी ही धुन में
खोया सा
घुलते घुलते
बस सिर्फ़ एक
लकीर सा
रह जाता है
बहुत खूब रंजूजी!
अपने में बंद अहम कितना छोटा पड़ जाता है

Kavi Kulwant का कहना है कि -

वाह रंजू जी.. वाह

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक बना
पाता है....
बहुत सार्थक चित्रण किया,
शब्दों के कैनवास में सही रंग भरे-मैं,तुम के साथ का .

मीनाक्षी का कहना है कि -

सरल और सहज भाव से अहम का बहुत खूबसूरत रूप दिखा दिया.

Mohinder56 का कहना है कि -

रंजना जी,

सुन्दर और सामयिक कविता रच दी आपने.

अहम का वहम पाल कर कई सूरमा गये
वक्त के साथ चन्द धुंधले निंशा रह गये

Unknown का कहना है कि -

baut badiya anju jee

seema sachdeva का कहना है कि -

रंजू जी बहुत अच्छी लगी आपकी कविता लेकिन साथ ही कहना भी चाहूंगी कि चाँद अकेला होता ही तभी टू उसके प्रति आकर्षण होता है और हर कोई उसी की तरह चमकना चाहता है |yah to chaand ke liye lekin sach me aham insaan ko apani pahchaan hi nahi hone deta........सीमा सचदेव

mehek का कहना है कि -

सच मैं में तुम का मिलना ही उसको सार्थक बनता है,बहुत सुंदर कविता.

Anonymous का कहना है कि -

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक बना
पाता है..
बहुत खूब,मैं का तुम में समावेषित होना एक अवश्यम्भावी प्रक्रिया है,इस बात को इतने सहज रूप में उकेरना अच्छा लगा.बधाई
आलोक सिंह "साहिल"

Sanjeet Tripathi का कहना है कि -

रोमांस से अलग हटकर लिखी गई आपकी यह कविता , आपकी लव गुरु वाली छवि को तोड़ती है जो कि एक अच्छी बात कही जा सकती है।

तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -

बहुत अच्छे रंजना जी,
बड़े साधारण तरीके से इतनी गहरी बात कह दी।

Anonymous का कहना है कि -

बहुत खूब रंजू जी अहम् को आइना दिखाती हुई अच्छी रचना है,
पूजा अनिल

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

रंजना जी,
सुंदर रचना है | बधाई |

अवनीश

डॉ .अनुराग का कहना है कि -

अहम् पर लिखना मेरा प्रिय विषय रहा है ,आपकी कविता को पढ़ना अच्छा लगा .....

Divine India का कहना है कि -

विषय से हटकर चिंतनशील तत्वों पर आपका लिखना अच्छा लगा… मगर मुझे कुछ कमियाँ लगी…चूँकि यह विषय बहुत व्यापक है… थोड़ा और गहरा हो सकता था…।

सरस्वती प्रसाद का कहना है कि -

अहम् के आते सब ख़त्म!
हम का होना ही सार्थक हैं,
बहुत सही लिखा.......

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

खोया सा
घुलते घुलते
बस सिर्फ़ एक
लकीर सा
रह जाता है
तब चाँद
कितना अकेला
और बेबस सा
हो जाता है !!

रंजना जी अच्छा विश्लेषण।

*** राजीव रंजन प्रसाद

GIRISH JOSHI का कहना है कि -

अच्छी रचना है| आपने मैं और तुम वाली जो बात कही उसे और आगे बढाकर हम तक ले जाती तो भाव पूर्ण होता|
गिरीश जोशी

रेनू जैन का कहना है कि -

किंतु मैं
सिर्फ़ ख़ुद के
होने से कहाँ
पूर्ण हो
पाता है
तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक बना
पाता है....

सच में रंजू जी... 'मैं' और 'तुम' यदि अहम पालें तो कितने अकेले हैं और 'हम' बन जाएं तो जीवन का सारा खालीपन भर जाए....

seema gupta का कहना है कि -

तुम शब्द का
इस में
शामिल होना ही
इसको
सार्थक बना
पाता है....
बहुत सुंदर कविता.

Alpana Verma का कहना है कि -

अच्छी रचना है

Udan Tashtari का कहना है कि -

बढ़िया है.

Unknown का कहना है कि -

बहुत सुंदर रंजू जी कितने सरल शब्दों में जीवन का दर्शन समझा दिया। वाकई 'मैं' से 'हम' तक आने में सारी उम्र बीत जाती है ।

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