Friday, February 01, 2008

आ की मात्रा के बाद हम बात करते हैं ई की मात्रा की जिसको भी काफिया में उपयोग किया जाता है और ये सुंदर तरीके से उपयोग की जाती है

मैं जानता हूं कि आज किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि वो कुछ सीखने के लिये काफी समय दे सके पर केवल इस ही बात के चलते उन चीजों की हंसी उड़ाना जो कि सदियों से चल रहीं हैं कहां की अच्‍छी बात है । जैसे किसी शाइर ने जिनकी ग़ज़ल हिंद युग्‍म पर आई थी अपनी टिप्‍पणी में मतले काफिये रदीफ जैसी चीजों की हंसी उड़ाई है । मैं नहीं जानात कि वे कौन हैं और उन्‍होंने ऐसा क्‍यों लिखा पर ये तो कहना ही चाहूंगा कि जो चीज जिंदा है खत्‍म नहीं हुई तो उसका मतलब ये ही है कि उस विधा में कुछ तो दम होगी ही ।

आज बात हो रही है की मात्रा के क़ाफियों की । ई की मात्रा को सबसे ज्‍़यादा उपयोग किया जाता है और कई बार जानकारी के अभाव में ग़लत तरीके से इस्‍तेमाल किया जाता है । ई की मात्रा की विशेषता ये है कि ये अक्षर के साथ और अकेले दोनों तरीकों से उपयोग में आ जाती है ।
गुलज़ार साहब की ग़ज़ल है
शाम से आंख में नमी सी है
आज फि़र आपकी कमी सी हे
ये एक तरह का उदाहरण है जिसमें गुलज़ार साहब ने मी क़ाफिया बना लिया है । मतलब ये कि की मात्रा तो है पर वो के साथ संयुक्‍त है नमी, कमी , थमी, जमी जैसे क़ाफिये ही यहां पर चलेंगें ।
अब एक और ग़ज़ल को देखें
सामने थे मय के प्‍याले तिश्‍नगी अच्छी लगी
रोशनी की आरज़ू में तीरगी अच्छी लगी
यहां पर गी क़ाफिया बन गया है की मात्रा तो है पर के साथ संयुक्‍त है अर्थात जिंदगी, दिल्‍लगी, ताज़गी जैसे क़ाफिये लाने होंगें।
अब बात करें कुछ ऐसी ग़ज़लों की जिनमें केवल की मात्रा की ही आवश्‍यकता है
किसी की दोस्ती का क्‍या भरोसा
ये दो पल की हंसी का क्या भरोसा
सफ़र पर आदमी घर से चला जो
सफ़र से वापसी का क्या भरोसा
अब यहां पर शाइर स्‍वतंत्र हो गया है क्‍योंकि उसने मतले में कोई दोहराव नही लिया है और केवल की मात्रा की ही बंदिश रखी है । अर्थात मतले के दोनों मिसरों में की मात्रा अलग अलग शब्‍दों पर संयुक्‍त होकर आ रही है । पहले दोस्ती में के साथ संयुक्‍त है तो दूसरे मिसरे में हंसी में के साथ मतलब कि शाइर अब स्‍वतंत्र है कुछ भी ऐसा क़ाफिया लेने को जो कि की मात्रा का हो । तो पहला निष्‍कर्ष तो यही निकलता है कि मतले के दोनों मिसरो में अगर की मात्रा किसी एक ही अक्षर के साथ संयुक्‍त होकर आ रही है तो फिर आप बंध गए हैं अब आगे आप की मात्रा के जो भी क़ाफिये लेंगें वो सब उसी अक्षर के साथ की मात्रा के होने चाहिये । अगर कमी और नमी ले लिया तो फिर अब मी आपका बंधन हो चुका है आपको इसका पूरी ग़ज़ल में निर्वाह करना होगा ।
की मात्रा अकेले भी आ जाती है
चांद में है कोई परी शायद
इसलिये है ये चांदनी शायद
अब इसमें केवल की मात्रा की ही बंदिश है
शाइर का एक शे'र देखिये जिसमें उसने केवल की मात्रा को ही क़ाफिया बना लिया है
खोल रक्खा है दिल का दरवाज़ा
यूं ही जाएगा कोई शायद
अब यहां कोई में की मात्रा स्‍वतंत्र होकर आई है । कोई के रूप में । ये बात की मात्रा के साथ हो जाती है ।
एक बात जो की मात्रा को क़ाफिया बनाते समय ध्‍यान रखनी है वो ये है कि की मात्रा के साथ अं की बिंदी का ख़ास ध्‍यान रखना है । अगर आ रही है तो सब में आए और अगर नहीं है तो किसी में भी नहीं आए । कुछ लोग कमी, नमी के साथ नहीं, कहीं का प्रयोग कर लेते हैं जो बिल्‍कुल ग़लत है ।
जैसे ऊपर के शे'र को कुछ यूं कहा जाए
खोल रक्खा है दिल का दरवाज़ा
पर कोई आएगा नहीं शायद
तो ग़ल़त हो गया नहीं में के साथ अं की बिंदी संयुक्‍त है जो ग़ल़त है इसलिये क्‍योंकि आपके मतले में चांद में है कोई परी शायद, इसलिये है ये चांदनी शायद में केवल की मात्रा ही है अं की बिंदी नहीं है । अगर हो तो फिर सब में ही हो ।
जैसे ऊपर की ग़ज़ल का मतला अगर यूं होता
चांद है खो गया कहीं शायद
रो रही इसलिये ज़मीं शायद
तो इसमें आपने अपने आप को स्‍वतंत्रता दे दी है कि आप की मात्रा को अं की बिंदी के साथ उपयोग कर सकते हैं । पर ध्‍यान रखें अब यहां पर वो क़फिये नहीं आएंगें जो अं की बिंदी के बिना वाले हैं जैसे चांदनी, शायरी, कमी, नमी । तो एक बात और भी सामने आती है कि अगर आपने अं की बिंदी को मतले में ले लिया हे तो पूरी ग़ज़ल में ही लें और जो अगर मतले में नहीं लिया हे तो पूरी ग़ज़ल में कहीं भी न लें ।
तो आज के पाठ में जो बातें सामने आती हैं वो ये कि ई की मात्रा प्रमुख रूप से तीन तरीकों से उपयोग में आती है
1 जब वो मतले के दोनों मिसरों में किसी एक ही खा़स अक्षर के साथ संयुक्‍त हो रही हो तो फिर पूरी ग़ज़ल में उसी खास अक्षर के साथ चलेगी । उदाहरण कमी, नमी, थमी, आदमी, ।
2 जब वो मतले के दोनों मिसरों में अलग अलग अक्षरों के साथ संयुक्‍त हो रही हो तो फिर पूरी ग़ज़ल में अलग अलग अक्षरों के साथ ही आएगी । उदाहरण आदमी, चांदनी, शायरी
3 जब वो मतले में अं की बिंदी के साथ संयुक्‍त हो तो पूरी ग़ज़ल में अं की बिंदी को निभाना पड़ेगा । जैसे कहीं, नहीं, यहीं, ज़मीं । अब इसमें भी अगर आपने मतले में नहीं और कहीं को क़ाफिया कर लिय तो तो आप और भी ज्‍़यादा फंस गए अब तो दो दो को निभाना है । की मात्रा को अं की बिंदी और अक्षर के साथ ही संयुक्‍त करना है ये थोड़ा और मुश्किल होगा । इसीलिये मतले में मैंने ऊपर
चांद है खो गया कहीं शायद
इसलिये रो रही ज़मीं शायद
कहा मिसरा सानी में  ज़मीं कहने से की बाध्‍यता ख़त्‍म हो गई

अगर दूसरे मिसरे में कहा जाता
चांद है खो गया कहीं शायद
इसलिये चांदनी नहीं शायद
तो उलझन हो जाती ।क्‍योंकि मिसरा उला में काफिया है कहीं  और मिसरा सानी में है नहीं  अब तो आपने ये कर लिया कि आगे भी आपको यहीं, रहीं, जैसे मुश्किल काफियों को ढूंढना है ।

प्रश्‍नोत्‍तर खंड

नीरज गोस्वामी का कहना है कि -

"मगर यदि मिसरा उला में काफिया आया है चलता और आपने सानी में ले लिया गिरता तो आपका काफिया हो गया 'ता' "
उस्तादों का कहना है की चलता से और गिरता से 'ता' हटा दे तो चल और गिर बचता है जो समान तुक के शब्द नहीं हैं इसलिए काफिये नहीं बन सकते, आप का क्या कहना है? गुरुदेव स्पष्ट करें.
नीरज

उत्‍तर

नीरज जी चलता और गिरता बिल्‍कुल काफिया बन सकते हैं बल्कि बने हैं मैं आपको एक दो दिन में कुछ उदाहरण दे दूंगा कि कहां इनका प्रयोग हुआ है । हम ता को हटाने की बात क्‍यों करें हम तो ध्‍वनि के खेल पर हैं । चलता उठता गिरता जलता कहता ये जो हैं ये सब उपयोग में आ सकते हैं बशर्ते आपने मतले में चलता और ढलता जैसी बंदिश न बांधी हो । उस्‍तादों का कहना है कि मतले में अगर बंदिश है चलता और ढलात की तो फिर आप आगे के शेर में गिरता को नहीं ले सकते हैं ।

mehek का कहना है कि -

aaj ke udharan ke taur par liye sher bahut achhe hai,samajh mein thoda aaya.koshih jari hai sikhane ki.

उत्‍तर

हिंदी में टाइप करने का प्रयास करें तो और भी आनंद आएगा ।

sahil का कहना है कि -

सर जी दिन पर दिन आपकी शिक्षा मजेदार होती जा रही है, सच कहूँ टू जब पहले दिन आपकी कक्षा में उपस्थित हुआ तो(बुरा मत मानिएगा) मैं बोर हो गया था,पर आज के दिन लगता है की मैं कितना बेवकूफ था,.
बहुत बहुत धन्यवाद सर जी
आलोक सिंह "साहिल"

उत्‍तर

साहिल जी हम तो मटका भी ठोंक बजा कर लेने वाले लोग हैं तो शिक्षक को बिना ठोंके कैसे ले सकते हैं ।

Alpana Verma का कहना है कि -

आज के अच्छे और सुलझे हुए पाठ के लिए शुक्रिया.
सारे पाठ प्रिंट कर के रखने योग्य हैं.

उत्‍तर

धन्‍यवाद

 
sunita (shanoo) का कहना है कि -

वक्‍़त की गोद से हर लम्‍हा चुराया जाए
इक नई तर्ज से दुनिया को बसाया जाए
गुरूदेव आज के इस शेर में काफ़िया है आया और रदीफ़ है जाए...क्या यह सही है?

उत्‍तर

बिल्‍कुल सही है सुनीता जी

tanha kavi का कहना है कि -

पंकज जी,
आपकी क्लास में अब खूब मन लगता है। इसी तरह हमें शिक्षा देते रहें।
गज़ल के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
-विश्व दीपक'तन्हा'

उत्‍तर

आपका धन्‍यवाद तन्‍हा जी

 
Shailesh Jamloki का कहना है कि -

गुरु जी मै आपकी बात से सहमत हू.. क्यों की कक्षा मै मेरे जैसे बच्चे भी है.. जो थोडा देर से समझ पाते है,..
गुरु जी मेरे सवाल है
१) काफिया बनाते समय किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए ?
२) आप क्या केवल कुछ काफियो को बताएँगे या सब पर थोडा थोडा कुछ कहेंगे.. मुझे सबसे अच्छा आं वाला काफिया लगा की कम प्रचलित है और ग़ज़ल तो बहुत ही खूबसूरत बन गयी उस से...
३) क्या मतला शब्द चयन का भी कानून बना देता है .. जैसे.. अगर मतले मै हमने हिंदी शब्दों का प्रयोग किया है तो. सारी ग़ज़ल मै इस तरह होना चाहिए.. ग़ज़ल की सुन्दरता की दृष्टि से...
४) क्या रस छन्द अलंकार यहाँ पर भी ग़ज़ल की सुन्दरता बड़ा सकते है?
५) जो कुछ भी मतले में दोहरा लिया जाता है वो फिर क़ाफिये का हिस्‍सा न रह कर रदीफ जैसा हो जाता है ।
६) मेरे ख्याल से ये अच्छा हो सकता है की आप हमे कुछ क्रियाकलाप दे करने को आज के विषय पर ताकि हम उसे कार्यान्वित कर पाएं...
शुक्रिया
शैलेश

उत्‍तर

1 काफिया बनाते समय किन चीजों का ध्‍यान रखना चाहिये ये तो मैंने काफी कुछ बताया है और अभी तो काफिये पर करीब दस बारह क्‍लास होनी हैं ।

2 मैं सभी के बारे में बताऊंगा केवल कुछ से क्‍या होता है आपने सुना नहीं नीम हकीम खतरा ए जान ।या तो बिलकुल ही नहीं आए या फिर पूरा ही आए।

3 शब्‍द चयन का कोई नियम तो नहीं है पर फिर भी अगर आपने हिंदी का काफिया मतले में लिया है तो आगे भी वैसा करें तो सुंदरता ही बढ़ेगी

4 देखिये यहां पर तो एक ही बात है कि बात बहर से बाहर न जाए उसके अलावा तो आप जो चाहें प्रयोग कर सकते हैं । और फिर अगर कोई मध्‍यप्रदेश की स्‍त्री कांजीवरम साड़ी पहनेगी तो क्‍या सुंदर न लगेगी । बहरें तो वैसे भी संस्‍कृत और रोमन पिंगल शास्‍त्र से ही बनीं हैं

5 होमवर्क देना तो प्रारंभ करूंगा पर अभी नर्सरी में नहीं अभी बच्‍चे केजी 1 में आ जाएं फिर तो इत्‍ता होमवर्क मिलेगा कि परेशान हो जाएंगें।  

hemjyotsana का कहना है कि -

aaj hi is kakshaa ko bhi GhonT liya..........
agli ke intjaar main....... aapke naye vidhayarthi
saadar....
hem

उत्‍तर

धन्‍यवाद आप भी हिंदी में लिखना प्रारंभ करें तो अच्‍छा लगेगा

12 टिप्पणी:

DR.ANURAG ARYA said...

bahut badhiya pryas,sarahiniye dherya aor achha udharan.

hemjyotsana said...

गुरु देव कहे हम ना माने कैसे सम्भव है :)
आप की कक्षा भी घोट ली.... अब तो बस वो बजन बहर रुकन (अर्कान )का गणित समझना है ,
उस का बेसब्ररी से इन्त्जार है :)

वैसे एक सलाह है इन कक्षाओं के सभई पत्ते (URL) किसी एक जगह मिलते..... तो और बेहत्तर होता ....
अब आज की कक्षा का तो हमे पता ही नही चलता और wordpress के आने वाले चिठ्ठो के topic पढ कर याद ना आता के कहीं ये हमारी कक्षा तो नहीं
अगली कक्षा के इन्तजार में .....
सादर

hemjyotsana said...

और एक बात गुरु देव .... हर कक्षा के साथ(topic ) क्रमाकं भी आये तो पता चलता रहेगा के बीच की कक्षा मे हम गोल तो नहीं मारा
अब तक की ६ कक्षा मे देर से आये पर आगे से समय पर उपस्थिती देते रहेगे
सादर

sumit said...

गुरू जी आप कक्षा मे पढने मे अच्छा लग रहा है
सुमित भारद्वाज

सजीव सारथी said...

गुरु जी मेरी एक ग़ज़ल का मतला है -
काफिर तो नही हूँ मैं मगर, हाँ अंदाजे -परश्तिश है जुदा ज़रा,
दरकार नही मंदिरों-मस्जिद, हर सिम्त मुझे दिखता है खुदा मेरा
मुझे रदीफ़ का इस्तेमाल न करना अच्छा लगता है, काफिये से शेर को खत्म करना भाता है, तो क्या इस ग़ज़ल में "जुदा जरा" या "खुदा मेरा" इस ध्वनी के काफिये इस्तेमाल कर सकता हूँ, या यह तरीका ग़लत है, कृपया बताएं

अवनीश एस तिवारी said...

बहुत अच्छा चल रहा है ग़ज़ल कार्यशाला |
हिंद युग्म इस कार्यशाला के हर पाढ़ को संभाल कर रखेगा ऐसी आशा है |
ये एक सम्पत्ती बन रही है |

गुरूजी का आभार और आगे के लिए तत्परता लिए...

अवनीश तिवारी

Alpana Verma said...

सादर धन्यवाद एक और उपयोगी पाठ के लिए.


**हेम्ज्योत्सना जी का सुझाव बहुत अच्छा है कि हर कक्षा [पाठ] के साथ(topic ) क्रमाकं भी आये तो पता चलता रहेगा--
ख़ास कर जो नए पाठक आते हैं उनको ज्ञान होगा कि कौन सी कक्षा चल रही है फ़िर वे अर्चिव से पहले के पाठ पढ़ सकते हैं.पुराने पाठ को क्रमांक हिन्दयुग्म admin दे सकता है-

Shailesh Jamloki said...

गुरु जी..आज का आपका पाठ सम्पूर्ण लगा क्यों की
- बहुत अच्छे उदाहरण ले कर समझाया गया है..
- सारांश और प्रश्नोत्तर खंड बहुत अच्छा है
- काफ्फिये भी उदाहरण दे कर सम्झ्ये है जैसे ...
"कहीं, नहीं, यहीं, ज़मीं "
प्रश्न :-
१) क्या इ की मात्र से भी कोई काफिया बना हुआ है?
२)अगर हमे एक तरह के काफिये चुने है जैसे "कहीं, नहीं, यहीं, ज़मीं ".. तो अगर हमारा शब्द कोष थोडा कम है, या कविता लिखते समय न मिल पायेई तो हमे कहाँ से मदत लेनी चाहिए..
सादर
शैलेश

anju said...

गुरु जी , मुझे यह बताइए क्या कोई ग़ज़ल कविता कहला सकती है ?
या कोई कविता ग़ज़ल हो सकती है
धन्यवाद

शैलेश भारतवासी said...

अंजु जी,

ग़ज़ल हिन्दी परम्परा नहीं है। अगर सूक्ष्मता के स्तर पर न जायें तो 'कविता, ग़ज़ल, नज़्म, गीत, पोएम आदि एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं, लेकिन सभी अपने देश, काल और परिस्थितिजन्य विशेषताओं को समाहित किये हुए हैं।

पंकज जी,

आपकी कक्षा के बाद विद्यार्थियों को बहुत कम ही शंकाएँ रह जाती होंगी।

हेमज्योत्सना जी,

हमने तो प्रथम दिवस से ही कक्षाओं को 'मुख्य पृष्ठ' ले साइडबार में एक जगह और इस पृष्ठ के साइडबार में एक जगह डिस्पले कर रहे हैं। आप ध्यान से देखें।

Anonymous said...

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"Arsh" said...

बहोत सारी जानकारी मिली काफिये ,मतला और रदीफ़ के बारे में ,अभी तो बच्चा हूँ धीरे धीरे सीखता चलूँगा आपके क्लास्सेस से ...
विनीत हूँ
अर्श