फटाफट (25 नई पोस्ट):

Sunday, November 11, 2007

मैं मीडिया का एक छात्र....


मीडिया की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था और अपने कुछ अलग ही अनुभव रहे इस चकाचौंध भरी दुनिया के.... आप भी मज़ा लीजिये मेरे इन अनुभवों का.....


माँ की बासी रोटी से भी फीका खाकर
खुश होने का अभिनय कर 'टिप' देकर जाना..
घर का चौका छूटा, होटलों की मेज़ों पर,
सीख रहा हूँ, मुँह के भीतर, चम्मच से चावल सरकाना
बाबूजी का आधा वेतन कार्ड घुसाकर जेब में भरना,
गर्लफ्रेंड के साथ ज़रा सी दूरी पर भी ऑटो करना,
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ....

सीख रहा हूँ नया ककहरा, जादू-मंतर,
सीख रहा हूँ, "माँ की गाली" का अंग्रेज़ी रूपांतर,
सीख रहा हूँ, बिस्तर की सिलवट को कैसे ख़बर बनायें,
सीख रहा हूँ, माँ कैसे बाज़ार में आए,
टोन-टोटके, सांप-भूत मेरे अध्याय...
नया दौर है, भूख-गरीबी भांड में जाए..
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ.....

सस्ती चप्पल, सीधी-सादी कद-काठी क्या काम आएगी,
सीख रहा हूँ "सबसे तेज़" दिव्य नरों संग उठाना-चलना..
माँ हैं "ममी", पिता "डेड" हैं समझ चुका हूँ,
सीख रहा हूँ, हाक़ीम की अँगुली दबते ही रंग बदलना..
सास-बहू के गढ़ विज्ञापन, हिट हो जाना, माल कमाना..
नटनागर आसा बापू को किसी "तेज़" चैनल का ब्रांड बनाना....
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ....

अंग्रेज़ी में गिटपिट करना, बातें गढ़ना, जीन्स पहनना,
सीख रहा हूँ, सिगरेट के धुएँ जैसी लहराती बोली,
तन कर चलना, बिना बात इतराते रहना..
"टैटू कल्चर' सीखा, भूला चंदन-रोली...
पेशेवर बनने की ज़िद है, सब चलता है..
किसे पड़ी है, पूरब में सूरत ढलता है.....

मैं मीडिया का एक छात्र
बनने आया था ख़बरनवीस
बन कर रह गया
एक बाज़ारू ख़बर मात्र....

(गत २ नवम्बर २००७ को अशोक चक्रधर के अखाड़े में इसी कविता के लिए मुझे तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था।)

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

22 कविताप्रेमियों का कहना है :

"राज" का कहना है कि -

निखिल जी !!!!
बहुत ही सुंदर रचना है..... मन के अवसाद को बहुत ही बेहतर रूप देकर प्रस्तुत किया है .....दरअसल आपने जो भी लिखा है वो काफी हद तक शहरी जीवन की सच्चाई को दर्शाती है .....
**********************************************************************

अंग्रेज़ी में गिटपिट करना, बातें गढ़ना, जीन्स पहनना,
सीख रहा हूँ, सिगरेट के धुएँ जैसी लहराती बोली,
तन कर चलना, बिना बात इतराते रहना..
"टैटू कल्चर' सीखा, भूला चंदन-रोली...
पेशेवर बनने की ज़िद है, सब चलता है..
किसे पड़ी है, पूरब में सूरत ढलता है.....
*************************************************
बधाई !!!!!

neeraj rajput का कहना है कि -

मैं आप की बात से सहमत हूं। खासतौर से जब आपको इस रचना के लिये अवार्ड भी मिल गया है। लेकिन बंधु आज भी इस दुनिया में--और मैट्रोपोलिटन शहर में भी-- ऐसे लोग है जो लहरो के खिलाफ चलते है। ना केवल चलते है बल्कि नदी को पार भी कर जाते है।

नितिन व्यास का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर रचना है. पुरस्कार की बधाई।

RAVI KANT का कहना है कि -

निखिल जी,
साधारण शब्दों में भी आपने बहुत कुछ कह डाला।
खासकर शहर की बनावटी जीवन-शैली.....
सच को मुखरित करती रचना के लिए बधाई।

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

निखिल
अच्छा व्यंग्य है परन्तु यह भी सत्य है, बहती धारा के विरूद्ध चलने का भी अपना ही मजा है

स्नेह

परमजीत बाली का कहना है कि -

बहुत बढिआ व्यंग्य है।बधाई।

सजीव सारथी का कहना है कि -

भाई सचमुच ही पुरस्कार योग्य व्याग है, मज़ा आया.... बहुत बहुत बधाई

सजीव सारथी का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
sidheshwer का कहना है कि -

कविता अच्छी है । ऐसे ही उन चीजों के बारे में लिखते रहिए जो हमारे जीवन में बनावटी पन पैदा कर रही हैं और हम उन्हीं को उपलब्धिमानकर भ्रम में लिप्त है ।

नमस्कार .... का कहना है कि -

निखिल जी ..
आपकी इस कविता ने मुझे भाव-विह्वल कर दिया ..दिल से कहू तो इस कविता की जितनी भी प्रशंशा की जाये कम है ...मैं भी एक मीडिया का विधार्थी हूँ ..अतः आपकी भावना की सच्चाई को समझते हुए उसकी कद्र करता हूँ ...यह कविता पता नहीं क्यों ..मुझे अपने से जुड़ती हुई लगी ....बहुत खूब ..

माँ की बासी रोटी से भी फीका खाकर
खुश होने का अभिनय कर 'टिप' देकर जाना..
घर का चौका छूटा, होटलों की मेज़ों पर,
सीख रहा हूँ, मुँह के भीतर, चम्मच से चावल सरकाना
बाबूजी का आधा वेतन कार्ड घुसाकर जेब में भरना,
गर्लफ्रेंड के साथ ज़रा सी दूरी पर भी ऑटो करना,
और बहुत कुछ सीख रहा हूँ....

सब कुछ सच है ...

हर्षवर्धन का कहना है कि -

जितना जल्दी सीख जाओगे, उतना सुखी रहोगे।

Anish का कहना है कि -

अच्छा चित्रण है.

माँ की बासी रोटी से भी फीका खाकर
खुश होने का अभिनय कर 'टिप' देकर जाना..
घर का चौका छूटा, होटलों की मेज़ों पर,
सीख रहा हूँ, मुँह के भीतर, चम्मच से चावल सरकाना

अच्छी है.
बधाई.
अवनीश tiwaree

रंजू का कहना है कि -

:) वहाँ सुनी थी तब भी बहुत बहुत पसंद आई थी और यहाँ पढ़ के इसको बहुत ही अच्छा लगा
सच में ही इनाम के हकदार है यह कविता ..निखिल आपकी ..बधाई आपको एक बार फ़िर से :)

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत सही निखिल जी बहुत सही..
गजब का कटाक्ष
उतर गयी दिल में आपकी ये रचना..
अब तो मुश्किल है हमारा बचना...
मर गये हम तो..
अब आप भी कातिल कहलाओगे..
हाँ मेरी शुभ-कामनाये लेते जाओ.
इन्हीं कातिलाना हमलों से..
पुरस्कार पाओगे..

Avanish Gautam का कहना है कि -

सीखिये- सीखिये...सीखना ज़रूरी है.

shobha का कहना है कि -

निखिल
बहुत खूब । अच्छा लिखा है। लिखते रहो ।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

निखिल जी सुन्दर लिखा है आपने और कल इसे सस्वर सुनने में और भी आनन्द आया.

tanha kavi का कहना है कि -

सीख रहा हूँ नया ककहरा, जादू-मंतर,
सीख रहा हूँ, "माँ की गाली" का अंग्रेज़ी रूपांतर,
सीख रहा हूँ, बिस्तर की सिलवट को कैसे ख़बर बनायें,
सीख रहा हूँ, माँ कैसे बाज़ार में आए,

निखिल जी,
दर्द को व्यंग्य में आपने बखूबी उतारा है। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आप व्यंग्य की कार्यशाला आयोजित करें, पहला प्रशिक्षु मैं होना चाहूँगा। बहुत खूब!

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

सभी का धन्यवाद........
शैलेश जी, आप प्रशिक्षु हों तो कार्यशाला उच्चस्तरीय हो जायेगी....कैसे संभालेंगे हम.........

निखिल

allahabadi andaaz का कहना है कि -

हर काव्य देह की पीड़ा है ! विचलित विचार है केवल मन !! ना जाने क्यों मुझे मेरी अधूरी कविता याद आ गई आपकी अभिवक्ति में . रचना सराहनीय है .

आशीष कुमार 'अंशु' का कहना है कि -

Bahoot Khoob Nikhil Bhai...

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)