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Sunday, October 07, 2007

हिंद युग्म साप्ताहिक समीक्षा - ११


07 अक्टूबर 2007 (रविवार)
हिंद-युग्म साप्ताहिक समीक्षा : 11
(24 सितम्बर 2007 से 30 सितम्बर 2007 तक की कविताओं की समीक्षा)

मित्रो!

बात बहुत पुरानी है। एक था कवि। और एक था आलोचक। दोनों दोस्त थे। और दुश्मन भी। दोनों में आम तौर पर मीठी तकरार चलती रहती थी। एक दिन कवि ने कविता रची - "सूरज ढल रहा था/ शाम हो रही थी/ एक खिली कली मुन्दने मुन्दने को थी/ भंवरा आ गया/ गुन गुनाकर विनती करने लगा / रात भर के लिए / मुझे अपने कोष में शरण दे दो ,प्रिये!/ कली ने कहा - नहीं , नही , नही !!!' आलोचक ने कविता सुनी। कवि से पूछा - 'तीन बार 'नहीं' क्यों ? ' कवि का उत्तर था- 'इनकार पर बल देने के लिए ।' उसने आलोचक का मज़ाक भी उड़ाया - 'इतना भी नहीं समझते , यार?' आलोचक गम्भीर हो गया, बोला - 'मेरे कविमित्र! समझते तो तुम नहीं हो। बस लिख जाते हो कुछ भी....आयं-बायं -शायं। व्याख्या हमें करनी पड़ती है।' कवि भौंचक -'इसमें कौन सी व्याख्या की बात है?' अथ आलोचक उवाच - 'बल तो एक बार में भी उतना ही पड़ जाता। दर असल यहाँ कली ने उस समय चल रहे 'उन' तीन दिनों भर के लिए इनकार किया है!' कवि सचमुच चकरा गया। उसने तो सपने में भी 'उन' तीन दिनों के बारे में सोचा न था। कवि माथा पीटता रह गया। और आलोचक की व्याख्या आगे भी चलती रही - 'इस तीन बार नहीं का शैली वैज्ञानिक अर्थ यह भी है कि 'नहीं' तो है , पर ज्यादा इसरार करोगे तो 'नहीं' 'नहीं' भी है !' अंततः कवि चीख पड़ा - ' नहीं !नहीं !! नहीं !!!'

इस बार साप्ताहिक समीक्षा में देरी हुई क्योंकि स्तम्भकार को यात्रा पर जाना पड़ा। वहीं कुछ साहित्यिकों- शिक्षाविदों की अंतरंग गोष्ठी में यह सत्यकथा हाथ लग गई। और मैंने आपको सुना डाली। खैर, जैसे उनके दिन बीते ,वैसे आप सबके बीतें ! इसी शुभकामना के साथ आइए इस बार की दर्जन भर कविताओं पर तनिक दृष्टिपात कर लें।

१. 'श्यामली (राहुल पाठक)' में भारतीय समाज में काली रंग वाली लड़की के अभिशप्त जीवन की पीड़ा को व्यक्त किया गया है। अविवाहित रह जाने को वैधव्य से बड़ा दुःख निरुपित किया गया है। यद्यपि कविता विवरणात्मक अधिक है परन्तु पांचवाँ अंश (पृथ्वी की...... ऊपर वाला) अत्यन्त मार्मिक कव्यांश है। इसी प्रकार अन्तिम अंश में श्यामल काया और काले दिल को लेकर उठाया गया सवाल भी पाठक को झकझोरता है।

२. 'राम सेतु पर मेरी बात॰॰॰॰(राजीव रंजन प्रसाद)' अच्छा गीत है। व्यंग्य की धार धीरे धीरे गला रेतती है। सियारों का जमघट अच्छा बन पड़ा है। वामपंथी नेताओं और बुद्धिजीवियों पर चोट साफ है। अन्तिम अंश में व्यवस्था पर निशाना साधा गया है। खैरियत यह है कि कवि ने किसी विचारधारा का भाषण नही पिलाया है। इसीलिये कवित्व की रक्षा हो सकी है। लक्ष्मण के लिए उर्मिल के प्रयोग पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

३. 'कद (मोहिंदर कुमार)' का विषय बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन उसे वक्तव्य की भाँति प्रस्तुत कर दिया गया है। हाँ, पृथ्वी और पर्वत तथा आकाश की विशालता के रूपक से कवित्व का समावेश हुआ है कविता में।

४. 'राम नाम सत्य है (अवनीश गौतम)' को दलित विमर्श के सन्दर्भ में देखना वांछित है। अन्यथा तो इसे इतिहास और मिथक के साथ स्वैराचार और सामाजिक घृणा फैलानी वाली तथा चौंकाकर ध्यान खींचने का प्रयास करने वाली रचना कहा जा सकता है। लेकिन दलितवादी दृष्टिकोण से देखें तो इसमें भारतीय परम्परा की व्याख्या दलित विरोधी, स्त्री विरोधी, पुरूष सत्ताक और सामंतवादी शोषण व्यवस्था के रूप में की गई है। यदि घृणा उपजाना ही कविता का उद्देश्य है तो इस कार्य में इस कविता को सफलता मिली है। कविता के इतिहास में इस तरह की अभिव्यक्ति के दौर पहले भी आये हैं और गुजर गए हैं।

५. 'तेरी याद (गौरव सोलंकी)' के मीठे सपने, पागल, छूटते हाथ और उर्मिला वाले अंश अच्छे बन पड़े हैं। मच्छर, मिस्सड कॉल, कैलेंडर और होम वर्क वाले अंश इनकी तुलना में हलके प्रतीत होते हैं।

६. 'आज का सच (रंजू)' में जन्म और बुढ़ापे वाले अंशों की तुलना में किशोर और युवा वाले अंश साधारण लगते है।

'एक और अंत (सजीव सारथी)' दो खंडों वाली विचार पूर्ण कविता है। पूरब और पश्चिम को दो भाइयों के रूपक में सफलता से बाँधा गया है। पूर्व और पश्चिम का परिचय देने वाले अंश थोड़े से मोटापे का शिकार हो गए हैं। अगर इन्हें कुछ तराश लिया जाए तो वज़न में कमी आएगी ही फिगर भी निखर जायेगी। गति बढ़ेगी सो अलग। प्रथम खण्ड का अन्तिम अंश कारुणिक त्रासदी का प्रभाव उत्पन करने में समर्थ है। दूसरा खण्ड रचनाकार के द्वंद्व को भी उभारता है और आशावाद को भी। निश्चय ही सूरज लपटों और धुएँ से घिरा हो सकता है आप चाहें तो उसमें दुर्गध भी खोज सकते हैं। पर अभी तक तो धरती पर जीवन और प्रकाश का नियंता वही है। कल जब यह सूरज ब्लैक होल बन जायेगा तब शायद कोई अन्य तारा ऐसी ही यातना झेल कर पृथ्वी के लिए प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत बने।

८. 'तहजीब.... (अजय यादव)' सांप्रदायिक राजनीति पर मीठी चोट है। गति और यति का निर्वाह उत्तम है। नेताओं के चरित्र के दोगलेपन के साथ ही ,इस संक्रमण काल में जनता की आत्महंता प्रवृत्ति की ओर भी अन्तिम अंश में इशारा किया गया है।

९.'छोटी सी बुधिया (विपुल)' में बच्चों और स्त्रियों के मानवाधिकारों के प्रति चिन्ता की सटीक अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। कथात्मकता और घटना चित्रण की तकनीक का अच्छा निर्वाह हुआ है। सीताफल ,बताशे और कंडे के प्रयोग कवि की लोक सम्प्रिक्ती के सूचक तो हैं ही, कथन को कवित्व प्रदान कराने वाले उपादान भी हैं।

१०. 'राधा (तुषार जोशी)' में कथ्य तो सटीक चुना गया है, लेकिन अभिव्यक्ति में उलझाव आ गया है। पहले तो कविता को आनंद का डसना विरल प्रयोग है ,ऊपर से उत्प्रेक्षा द्वारा इसे अंधेरे में दिया जलने से जोड़ा गया है। आनंद दिया है; ठीक। पर कविता को घोरतम नहीं कहा जा सकता न! अन्तिम अंश में लीं होने के भाव को व्यक्त कराने के लिए राधा का चयन सार्थक है - यही मिथक की शक्ति है कि एक शब्द ही चमक पैदा कर देता है क्योंकि उसके साथ कोई आदि बिम्ब जुड़ा होता है। इसीलिये मिथकों को दूषित कराने के सारे प्रयास आसमान पर थूकने जैसे बचकाने सिद्ध होते हैं।

११. 'बड़े लोगों से (निखिल आनंद गिरि)' छोटी बहर में गहरी मार है। द्वंद्वात्मक शब्दों ने ग़ज़ल को व्यंजना शक्ति प्रदान की है। छठी पंक्ति में वज़न बढ़ गया लगता है। इसी प्रकार मुद्दा और जिंदा - पर भी पुनर्विचार अपेक्षित है।

१२. 'सात क्षणिकाएं (विश्व दीपक तन्हा)' काफी ध्वनि पूर्ण हैं - खासतौर पर मुखौटे और खानाबदोश दर्द। पोलिथिन यद्यपि कविता कम और वक्तव्य ज़्यादा है तथापि 'बेईमानी एक पोलिथिन है' -में सूक्ति बनने का सामर्थ्य है।

.......और इस बार अंत में पाठकों के विमर्श हेतु हम कुमार लव(360.yahoo.com/kummarluv) की दो छोटी कविताएँ उद्धृत कर रहे हैं -

राम सेतु-1

उस रात
सब ठंडा पड़ रहा था
चंदन की मूर्ति
जैसे लाश बन गई थी।

मैंने,
प्रकाश के लिए
मूर्ति को जला दिया।

सुबह,
पूजा में लग गया.


राम सेतु-2
(सितंबर २००७ में राम सेतु की रक्षा के लिए हो रहे प्रदर्शन के कारण बीच राह में फंसी एक माँ के सड़क पर प्रसव का समाचार पढ़ कर)

आज
राम सेतु के सहारे
एक बच्चा आ गया
बीच सड़क पर।

शायद
इस बच्चे में
आ जाएँ राम के गुण
और वह भी
बनाये कुछ ऐसा
जो रोके राह
सदियों बाद भी।

शायद
वह बता सके -
पहले धर्म आया था
या फ़िर पाप।
शायद
वह समझा सके -
प्रार्थना और प्रार्थना में
क्या अन्तर है,
जो विधर्मी बना सकता है।


तो, आज इतना ही।

इति विदा पुनर्मिलनाय !

आपका - ऋषभदेव शर्मा ७ अक्तूबर ,२००७

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

"राज" का कहना है कि -

ऋषभदेव जी!!!
बहुत ही चर्चा वाला शिर्षक चुना है आपने....और खुबशूरती के साथ लिखा भी है...
आपने सही कहा है...ऐसे ही पीढी की जरूरत है "जो बता सके -पहले धर्म आया था या फ़िर पाप."
**************************
शायद
इस बच्चे में
आ जाएँ राम के गुण
और वह भी
बनाये कुछ ऐसा
जो रोके राह
सदियों बाद भी.

वह बता सके -
पहले धर्म आया था
या फ़िर पाप.

वह समझा सके -
प्रार्थना और प्रार्थना में
क्या अन्तर है,
जो विधर्मी बना सकता है.
************************
शुभकामनायें!!!

cmpershad का कहना है कि -

नहीं, नहीं, नहीं ... कहीं ये तलाक की बात तो नहीं कर रहे हैं,, बस तीन बार कह दिया और...
कुमार ल्व की कवितायें अच्छी और सामायिक हैं. युवा कवि की पैनी नज़र दिन-दैन की खबरों पर भी रहती है और उससे उन्हें कविता की प्रेरणा भी मेलती है। समीक्षा और कविताओं के लिए साधुवाद।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी,

बहुत आभार कि राम सेतु पर मेरी रचना की आपनें सराहना की। इस कविता को जिस तरह गलत प्रसंग में समझा गया था उसने मुझे व्यथित कर रखा था किंतु आपकी विवेचना से पुन: उर्जावत हो उठा हूँ।

आपनें कवि के सही कान उमेठे हैं अपनी सत्यकथा में..और आलोचक को भी नहीं बक्शा।

***राजीव रंजन प्रसाद

सजीव सारथी का कहना है कि -

आदरणीय ऋषभ देव जी
धन्येवाद कविताओं के मर्म को समझने और समझाने का, राम सेतु विषय पर जो पंक्तियाँ आपने प्रस्तुत करी, वह गम्भीर और विचारणीय है

Avanish Gautam का कहना है कि -

...गटर का ढक्कन खोले जाने से बडी सडांध आती है. मेहतर यह काम किया करते हैं..और पवित्र ऋषि जन दूर खडे छी थू किया करते हैं.. जैसी उम्मीद थी वैसी ही समीक्षा.

धन्यवाद!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

ऋषभ जी,

इधर आपने आलोचक व कवि की कहानी सुनाई नहीं और उधर अवनीश जी ने उसकी पुनरावृत्ति भी कर दी।

आपने पाठकों को समीक्षा के लिए दो दिन का इंतज़ार कराया, कैसे काटे, हम ही जानते हैं।

रितु रंजन का कहना है कि -

हिन्द युग्म का यह बेहद सार्थक स्तंभ है। यह पैमाना है कि कविता और कवि की दिशा क्या है।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

ऋषभदेव जी,

आपकी आरंभिक कथा सुन कर समीक्षा का डर जाता रहा... खुल कर लिख सकते हैं..हा हा.

मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं कि एक ही वातावरण में दो या अधिक मनुष्य एक विषय पर एक समय में जो सोचते है वह उनकी मानसिकता, उनके अनुभव व सोचने की दिशा पर निर्भर होता है.. और सम्भव है कि वह सोच सामने वाले से बिल्कुल भिन्न हो.

सारगर्भित समीक्षा के लिये आभार.

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