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Sunday, August 19, 2007

...एक अधूरा सच


मित्रों,

नमस्कार....मीडिया की पढ़ाई के दौरान कई बार आपका सीधा सामना होता है एक ऐसे समाज से जिसके बारे में आप पूर्वाग्रहों से घिरे होते हैं..........उस समाज के साथ चंद घड़ियाँ बिताने पर आपको यह अहसास होता है कि हम-आप जिस समाज में जीते हैं, ठीक वैसे ही कई समाज और भी हैं, जिन्हे हमारी थोथी सभ्यता स्वीकारने से हिचकती है....अफ़सोस कि हम कभी उतने उन्मुक्त नहीं हो सकते.....




जब कभी लिखी जायेगी शून्य की कथा,

सभ्यताएं मुँह बाए हमें निहारेंगीं......

क्या उत्पत्ति का सच दोगला भी हो सकता है???



निरुत्तर होगा समय,

देखकर एक समानांतर दुनिया,

एक विभाजन रेखा,

पौरुष और नारीत्व के बीच!!!



हम!!

जो खेंचते हैं लकीर,

होने और ना होने के बीच....


हम!!

जो हैं साधना, प्रीति या राधा...


हम!!

जिनका अस्तित्त्व सिर्फ आधा......



तुम!!


जो पूरा होने का गुमान भरते हो,

कभी ना सुन पाए टीस एक ताली की,

तुम्हारी सारी पूर्णता समझ ना सकी,

व्यथा एक सवाली की...



हम!!

जो बन ना सके कभी;
भाई, बहन, दूल्हा या दुल्हन....

रिश्तों की देहरी लांघकर,

हमने गढी है एक नयी परिभाषा,

नए अर्थ..धर्म के जात-पात के.......


मस्ती भरी बोली,
मन यायावर...

हाँ!! हम वही हैं...

जिन्हे तुम कहते हो,

छक्के, हिजडे या किन्नर!!!



तुम!! जो पौरुष का दंभ भरते हो,

झूठ की नींव पर सच की जुगाली करते हो...


याद रखना........

एक अधूरा सच हैं हम....

पौरुष का कवच हैं हम.......



निखिल आनंद गिरि
9868062333

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

amit का कहना है कि -

badhiya kavitaaa hai nikhil jee,
hindyugm par nayaa hoo....aapko padhkar acchaa laga.......

shobha का कहना है कि -

निखिल
समाज में यदि कुछ कमियाँ हैं तो उसके लिए समाज को कोसना कोई
सही समाधान नहीं है । कवि का स्वर आशावादी होना चाहिए । स्वयं को
अपनी परंपरा को दोष देने से केवल आप अपनी झुँझलाहट ही प्रकट कर सकते
हो । मुझै ऐसा लगता है कि अभी और विचार और अभ्यास की आवश्यकता
है । दुष्यन्त कुमार जी की पंक्तियाँ हैं -
ग़म नहीं उपलब्धियों के नाम पर
आकाश सी छाती तो है ।
इस नदी की धार में ठंडी हवा
आती तो है ।

RAVI KANT का कहना है कि -

निखिल जी,
कवि तो सृजनधर्मा होता है अतः उसका काम सिर्फ समस्याएँ देखना नही वरन समाधान सुझाना भी है। विषय-चयन प्रसंगिक है पर आपने जो अंतिम सत्य मान रखा है-
जब कभी लिखी जायेगी शून्य की कथा,
.....मै इससे सहमत नही हुँ। कोइ भी आशावादी यह नही मान सकता कि हमेंशा ऐसा ही होगा।

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

निखिलजी,

समाज का चेहरा समाज के सामने लाना, उसकी कमियों को इंगित करना भी एक सृजनधर्मी का ही कार्य है, ऐसे में मैं आपकी इस कविता की प्रशंसा करता हूँ।

कमियों को दूर करने का सुझाव देना और कमियों को उजागर करना दोनों अपने आप में सम्पूर्ण कार्य है, इसलिये एक काम भी किया जाना महत्वपूर्ण है।

बधाई स्वीकार करें।

विपुल का कहना है कि -

एक बात कहना चाहूँगा !
बचपन मे किसी किताब मे उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी के बारे में पढ़ा था और बाद में उनकी रचनाओं को पढ़ कर महसूस भी किया| वो यह की उनका
मानना था की अगर दुख का एहसास करा दिया जाए, पीड़ा के सागर में अगर डूबा दिया जाए तो उससे बचने का रास्ता भी अपने आप सूझ जाता है !
जहा तक मैने समझा है उनकी रचनाओ के सारे पात्र बड़े दुखी हैं , जीवन से संघर्ष करते हुए ,अपनी ज़िंदगी से वीरतापूर्वक लड़ते हुए पर फिर भी दुखी है सब ! और उनके दुख का एहसास करवाना ही शायद लेखक का उद्देश्य भी रहा| जिसमें वो पूरी तरह सफल भी हुए और यही शायद उनकी महानता का राज है |
ख़ैर अगर प्रसाद जी की कहानियों को देखें तो अलग बात दिखाई पड़ती है |वो हमे हमारी शक्ति, हमारे ग़ौरवशाली इतिहास का आभास करवाकर मुश्किलों से निपटते दिखाई देते है |उनके अनुसार शायद किसी को उसकी शक्ति का एहसास करवा देना ही समस्या का हल था| इसीलिए उनकी रचनाओ में हमे ओज का सागर दिखाई देता है |
जो भी हो हर सृजनकर्ता का उद्देश्य एक ही होता है बस उस तक पहुँचने के माध्यम अलग-अलग |
अगर ऐसा कहा जाए की कवि के स्वर में हमेशा आशावादीता झलकनी चाहिए तो शायद यह ग़लत होगा |
निखिलज़ी आपकी कविता निस्संदेह उच्च कोटि की है इसमें कोई दो राय नही !
मैं हमेशा से कहता हू की अगर कवि अपनी बात को कहने में सफल हो गया है तो यहाँ कविता सफल हो जाती है |अब कवि क्या कहना चाहता था यह बहस का मुद्दा हो सकता है क्योंकि हर व्यक्ति का चीज़ों को देखने का अपना नज़रिया होता है तो कुछ को वह सही लगता है कुछ को ग़लत |

शायद कुछ ज़्यादा बोल गया मैं !
सुंदर रचना के लिए बधाई .....

रंजू का कहना है कि -

अच्छी रचना है निखिल जी....
.विपुल ज़ी की टिपणी बहुत कुछ कह गयी
बहुत अच्छा लगा उनके विचारों को पढ़ना!!

विपिन चौहान "मन" का कहना है कि -

निखिल जी..
बहुत अच्छी रचना है अपने आप में..
मैं गिरिराज जी से पूर्णरूप से सहमत हूँ..
विचार सम्माननीय हैं..
हम सब को इस विषय पर ध्यान देना चाहिये..
प्रयास जो आप ने किया है उसको मेरा नमन है

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

शोभा जीं,
आपकी पारंपरिक आलोचना के लिए शुक्रिया.....आपसे किसने कह दिया कि मैं समाज को कोस रहा हूँ....मैं तो खुद से एक सवाल कर रहा हूँ, जिसमें झुंझलाहट स्वाभाविक है....ये झुंझलाहट ना होगी तो कवि का दाना-पानी उठ जाएगा....हम केवल मीठे-मीठे शब्दों का व्यूह रच कर वाहवाही लूटें, इस से बेहतर कि आइना उठा लें और आप जैसे सुधी पाठक को थोड़ी ठेस पहुंचे...और हाँ, कवि आशावादी हो, ना हो ये पाठक तय करने लगे तो फिर काव्य "आर्टिफिसिअल" हो जाएगा.........
गिरिराज जीं और विपुल ने पहले ही मेरी बात कह दीं है,इसीलिये चुपचाप अपना काम करता हूँ, नाराज होने वाले भी सर आंखों पर और कविता पसंद करने वाले भी............
ग़ालिब का एक शेर कहना चाहूँगा..............

"न सताइश कि तमन्ना, ना सिले कि परवाह
ग़र नहीं हैं मेरे अशआर में मानी ना सही..... "

और प्रतिक्रियाओं कि प्रतीक्षा में...........

निखिल आनंद गिरि.........

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

इस कविता से यह स्पष्ट नहीं होता कि कवि समाज की कमियाँ गिना रहा है। शायद कवि ने तत्कालीन पुरूषवादी या स्त्री-पुरूषवादी समाज को किन्नरों के नज़रिये से देखा है। वरन किन्नरों का सोचना भी सही है। दुनिया ने आधे अस्तित्व को अंतिम सत्य मानकर केवल अहम को बल दिया है। कविता अपने आप में सुंदर है।

जहाँ तक शोभा जी की सलाह है कि साहित्यकार का काम केवल कमियाँ बतलाना नहीं होना चाहिए। यह सही है। लेकिन साहित्यकारों ने साहित्य की पंचलाइन 'साहित्य समाज का दर्पण होता है' पर चलते हुए अपनी कृतियों में समाज को आइना दिखाया है। अपने आप में यह भी एक समाधान है। बेवकूफ को बस इतना पता चल जाय कि वो बेवकूफ है, तो फ़िर उसकी उन्नति से उसे कोई नहीं रोक सकता।

फ़िर भी हो सकता है कि यह बातें किताबी हों। प्रेमचंद ने समाज में गरीबों, शोषितों के दुःख और अत्याचारों का ही चित्रण किया है। शायद तभी प्रसिद्ध साहित्यकार मुद्राराक्षस ने उन्हें दलित विरोधी कहा था, क्योंकि प्रेमचंद की कृतियों में सुधार का दृष्टिकोण लुप्त-सा है। लेकिन मैं तो यही मानता हूँ कि आइना ही पर्याप्त है।

परन्तु, सुधारवादी दृष्टिकोण, समाधाननिहित कृति हो तो सोने पर सुहागा है। दृष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल देखिए-

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिनले लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

शायद निखिल भी ऐसा की कुछ चाहते हैं।

shobha का कहना है कि -

शैलेश जी
साहित्यकार किसी को बेवकूफ नहीं कहता और मुझे लगता है कि किसी को बेवकूफ कहने से बड़ी बेवकूफी
हो ही नहीं सकती । साहित्यकार आइना दिखाता है किन्तु वह मात्र जैसे का तैसा नहीं दिखाता। यदि वह ऐसा
करेगा तो उसे सृष्टा कौन कहेगा ।
आपने प्रेम चन्द जी का उदाहरण दिया । प्रेमचन्द सदा आदर्श और यथार्थ साथ लेकर चलते थे । तभी तो
अपने उपन्यास निर्मला में नायिका से कहलवाते हैं- ऐसे सधवा होने से वैधव्य को मैं बुरा नहीं मानती । सोचिए
कोई यथार्थ वादी ऐसा कहने की हिम्मत कर सकता है ?
मैं निखिल जी को मात्र इतना समझाना चाहती हूँ कि कवि की सोच हमेशा नकारात्मक नहीं होनी चाहिए ।
आपने दुष्यन्त कुमार जी का उदाहरण दिया। मैं उन्ही के शब्दों में कह रही हूँ ---
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है ।
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है ।
ग़म नहीं उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या ना हो आकाश सी छाती तो है ?
सस्नेह

anuradha srivastav का कहना है कि -

जो बन ना सके कभी;
भाई, बहन, दूल्हा या दुल्हन....

रिश्तों की देहरी लांघकर,

हमने गढी है एक नयी परिभाषा,

नए अर्थ..धर्म के जात-पात के.......
बहुत-बहुत साधुवाद की आपने इनके बारे में सोचा । बहुत पहले शिवानी जी का एक उपन्यास पढा था ।
कथावस्तु में ये लोग ही थे ।शुरु से ही इनके लिये हमारी सोच पूर्वाग्रही रही है । जरुरत है मानसिकता में बदलाव की
साथ ही उन्हें मुख्यधारा में लाने की पहल की ।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -
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गौरव सोलंकी का कहना है कि -

कविता अच्छी और सच्ची है निखिल जी।
लेकिन मैं शोभा जी से सहमत हूँ कि सिर्फ़ समस्याएँ दिखानी हों तो वह ज्यादा मुश्किल नहीं। मुश्किल है समाधान ढूंढ़ना।
बात प्रेमचन्द की हो रही है तो जहाँ उन्होंने समस्या दिखाई है, लगभग हर जगह उसका समाधान लेकर खड़ा हुआ एक नायक भी दिखाया है। अब उसके सामने मुश्किल तो आती ही हैं।
शैलेश जी, आप यह क्यों कह रहे हैं कि प्रेमचन्द के साहित्य में सुधार का दृष्टिकोण लुप्त सा है?
उन्होंने दलित-उत्थान, विधवा उद्धार, सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई, आज़ादी की लड़ाई के लिए अपने असंख्य नायक खड़े किए। फिर आप यह बात किस आधार पर कह रहे हैं?
साहित्य समाज का आईना है और निखिल जी, कमी आपकी नहीं है। समस्या को दिखाना भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है।
हम बस यह चाहते हैं कि समाधान की तरफ भी हल्का सा इशारा कर दिया होता तो रचना लाजवाब हो जाती।
सच दिखाने के लिये बधाई।

tanha kavi का कहना है कि -

निखिल जी मुझे आपकी रचना बेहद पसंद आई। आपने एक निकृष्ठ माने जाने वाले समाज के बारे में लिखा है। यह विषय लगभग अछूता है। इस नाते आपने एक बड़े हीं साहस का कार्य किया है।
आशावादी और निराशावादी , समस्या और समाधान इन मसलों में पड़ने के बजाए यदि हम सत्य दर्शाने की कोशिश करें तो ज्यादा अच्छा होगा। हर एक व्यक्ति जो संज्ञाशून्य नहीं है , हर समस्या का समाधान जानता है , लेकिन कुछ बातें theoretical होती हैं और कुछ practical. कवि समाधान बताने के लिए और तथाकथित आशावादी बनने के लिए समाज की सच्चाईयों को झूठला तो नहीं सकता। अगर समाज निराशावादी है तो कविता आशावादी होगी , इसकी कल्पना हम कैसे कर सकते हैं। शायद कुछ ज्यादा कह गया मैं। अगर बुरा लगे तो माफ कीजियेगा।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

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