पिछली बार टिप्पणियों की कम होती संख्या पर भी हमने चिंता जताई थी, गिरिराज जोशी को 'टिप्पणी (कमेंट) कैसे करें?' पर एक सरल लेख लिखने को कहा गया था, मगर उसे ब्लॉग-पंडित श्रीश शर्मा की सलाह मानकर (श्रीश शर्मा ने 'टिप्पणी करें' को अंग्रेज़ी में 'Post your comment' भी लिखने को कहा था ) कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया था। मगर इससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। हाँ, कवियों के व्यक्तिगत प्रयास से टिप्पणियों की संख्या को ३३ तक खींचा जा सका। हमारे पास ऐसे कई पोस्ट हैं जिसपर २० से अधिक टिप्पणियाँ हैं। हम इसे बहुत जल्द ५० तक ले जाना चाहते हैं। इससे हमारे कवियों का हौसला बढ़ेगा।
मुझसे कई पाठकों ने व्यक्तिगत रूप से (मेल, चैट, स्क्रैप द्वारा) यह पूछा कि टिप्पणी कैसे किया जाता है? मैंने उन्हें बताया। मगर स्थाई समाधान हेतु इस पर एक पाठ तैयार करना आवश्यक हो गया है। जल्द ही 'टिप्पणी कैसे करें?' पर एक लेख हिन्द-युग्म के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित किया जायेगा।
अब प्रतियोगिता पर आते हैं। अप्रैल माह की 'यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' में कुल १७ कवियों ने भाग लिया। कोई कविता किसी भी दूसरी कविता से कम नहीं थी। यूनिकवि का निर्णय चार चरणों में सम्पादित हुआ। पहले और दूसरे चरण में अंकीय प्रणाली का सहारा लिया गया। पहले चरण में सभी कविताओं को चार अलग-अलग ज़ज़ों को भेजा गया और उनसे कहा गया कि वे १० में से अंक दें, मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ आईं। पहले चरण से ११ कविताओं को लेकर दूसरे चरण के ज़ज़ को भेजा गया और वहाँ से ७ कविताएँ चुनी गईं, उन ७ कविताओं को तृतीय चरण के निर्णयकर्ता को भेजा गया और कहा गया कि आप श्रेष्ठ ४ चुनें। फ़िर अंतिम निर्णयकर्ता के समक्ष वो श्रेष्ठ ४ कविताएँ रखी गईं। हमेशा की तरह उन्होंने यूनिकवि के निर्णय में काफ़ी वक़्त लगाया। किसी भी ज़ज़ को दूसरे ज़ज़ का निर्णय या कविताओं का वरियता क्रम नहीं बताया गया। परंतु सुखद आश्चर्य कि अजय यादव की कविता 'बादल का घिरना देखा था' को सभी ज़ज़ों ने टॉप ३ में रखा।
मतलब साफ़ है कि अजय यादव इस बार के यूनिकवि हैं। ग़ौरतलब है कि पिछली बार भी अजय यादव की 'ग़ज़ल' अंतिम चार कविताओं में ज़गह बनाई थी। श्री अजय यादव हिन्द-युग्म के फ़रवरी माह के यूनिपाठक भी रह चुके हैं। अजय यादव हिन्द-युग्म के लिए वरदान हैं, कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा।
यूनिकवि- अजय यादव
परिचय
काव्य या यूँ कहें कि साहित्य से इनका लगाव बचपन से ही रहा। इनके पिता जी को हिन्दी काव्य में गहरी रूचि थी। अकसर उनसे कविताएँ सुनते-सुनते कब खुद भी साहित्य-प्रेमी बन गये, पता ही नहीं चला। घर में महाभारत, गीता आदि कुछ धार्मिक किताबें थीं, उनसे स्वाध्याय की जो शुरूआत हुई, वह वक़्त गुजरने के साथ-साथ शौक से ज़रूरत बन गयी। परन्तु अब तक पढ़ने का ये शौक सिर्फ पढ़ने तक ही सीमित रहा था, कभी स्वयं कुछ लिखने का प्रयास नहीं किये। कुछ समय पूर्व बज़रिये अंतरजाल शैलेश भारतवासी के संपर्क में आए तो पढ़ने के इस सिलसिले को एक नयी दिशा मिली। जिनके कहने पर पहली बार कुछ लिखने का प्रयास किये। हालाँकि अजय यादव के विचार में काव्य में कुछ कहने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, पाठक को स्वयं किसी विषय पर विचार करने के लिये प्रेरित करना और इस लिहाज से अभी ये खुद को कवि नहीं कह सकते। पर फ़िर भी मन में उठने वाले विचारों को काग़ज़ पर उतार देने का प्रयास करते हैं। यदि इनके इस प्रयास से किसी को एक पल की खुशी मिल सके, किसी को अपने दुख में सांत्वना मिल सके या किसी विषय विशेष की तरफ पल भर को ही सही पाठक का ध्यान आकर्षित हो सके तो ये अपने प्रयास को सार्थक समझेंगे।संपर्क-
मकान न॰- ११६१
गली न॰- ५४
संजय कॉलोनी
एन॰आई॰टी॰ फरीदाबाद
हरियाणा (१२१००५)
चिट्ठा- मानस के हंस
ई-मेल- ajayyadavace@gmail.com
पुरस्कृत कविता -'बादल का घिरना देखा था'
चारों ओर खुले खेतों की, आकर्षित करती हरियाली
देख-देख मन हर्षित होते, आने वाली है खुशहाली
सूरज की किरणें थीं मानो, सोना बरसाती खेतों में
तभी तिरोहित होते मैंने, कृषकों का सपना देखा था।
बादल का घिरना देखा था।
घिर आईं थीं घोर घटाएँ, विस्तृत अंबर के आँगन में
धूप के साथ ही खुशी छिप गई, संशय था हरइक के मन में
बारिश जो इस वक्त हुई तो, फसलों को नुकसान करेगी
भावी अमंगल से बचने को, ईश्वर का जपना देखा था।
बादल का घिरना देखा था।
बारिश की बूँदें थी आईं, पीछे ओला-वृष्टि हुई थी
आधे घंटे से भी कम में, श्वेत-खेत की सृष्टि हुई थी
जहाँ कहीं भी नज़र घुमाएँ, या जल था या जलते ओले
वर्षा के पानी का मैंने, आँखों में तिरना देखा था।
बादल का घिरना देखा था।
हरी भरी फसलों की प्यारी, आकर्षित करती हरियाली
ओलों की चोटों के आगे, बची नहीं थी एक भी बाली
बाहर बारिश बंद हुई थी, लेकिन आँखों से जारी थी
हर्ष-आरोही मानव मन का, गहन शोक गिरना देखा था।
बादल का घिरना देखा था।
जैसाकि हमने अपनी इस बार की उद्घोषणा में यह वादा किया था कि यूनिकवि की कविता के साथ पेंटर स्मिता तिवारी की पेंटिंग भी प्रकाशित करेंगे तो स्मिता तिवारी ने 'बादल का घिरना देखा था' पर यह पेंटिंग बनाई है।

अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
संपूर्ण कविता है यह। शिल्प और भाव दोनों ही उत्तम। आने वाले सुख की कल्पना, अनिष्ट की आशंका और विषाद तीनों ही भावों को कवि ने बखूबी निभाया है। कविता में बनावटीपन नहीं है, कविता की सहजता पाठक को स्वत: डुबाती जाती है।
कला पक्ष : ८/१०
भाव पक्ष : ९/१०
कुल योग १७/२०
पुरस्कार व सम्मान- रु ३००/- (यूनिकविता के लिए) + रु ३००/- ( प्रति सोमवार, मई माह के तीन अन्य सोमवारों के लिए) + रु १०० की कविताओं की पुस्तकें + प्रशस्ति-पत्र।
अभी हम अंतिम दौर में पहुँची तीन अन्य कविताओं का भी ज़िक्र करेंगे मगर उससे पहले हम पाठको से गुफ़्तगू कर लें।
पिछली बार की भाँति इस बार भी हमें यूनिपाठिका मिली हैं। इन्होंने तो हमारे कवियों का उत्साह, मात्र 'बहुत अच्छा', 'बहुत खूब', 'बहुत बढ़िया' लिखकर ही नहीं बढ़ाया बल्कि कविताओं की पूरी समीक्षा की। अपनी बात बेधड़क कही, कविता न समझ आने पर लिखा कि समझ में नहीं आई। कवियों से सवाल किए। इतना ही नहीं अप्रैल माह की हर पोस्ट पर इन्होंने टिप्पणी की यानी ४५ से अधिक टिप्पणियाँ।
हमारी यूनिपाठिका हैं कवयित्री सुनीता चोटिया (शानू), आइए मिलते हैं इनसे-
यूनिपाठिका - सुनीता चोटिया (शानू)
परिचय
जन्म- तिथि- ६ अगस्त, १९७०
शिक्षा- होम-साईंस में स्नातकोत्तर
सुनीता चोटिया का जन्म राजस्थान के एक शहर पिलानी में हुआ। स्कूल के समय से ही इन्हें लिखने व पढने में रूचि रही है,...विवाहोपरान्त ये दिल्ली में आकर अपने पति के साथ व्यवसाय में कार्यरत हो गईं। मगर समय-समय पर एक अधूरापन इन्हें सालता रहा कि ज़िन्दगी को कविता मानने वाली आज कविता लिखना तो दूर पढ़ने के लिये भी तरस गई। आखिर एक दिन इनके पति को इनकी इच्छा का पता चल गया और वे इन्हें कविता लिखने-पढने को कहने लगे, और उसके बाद इनके कई लेख व कविताएँ राजस्थान पत्रिका, मरूपन्ना, पंजाब केसरी, मेरी दिल्ली में प्रकाशित हुए। और लिखने-पढने में रुचि बढ़ती चली गई।सम्पर्क-
एम-५०, प्रताप नगर,
दिल्ली-११०००७
चिट्ठा- मन पखेरू फ़िर उड़ चला
ई-मेल- shanoo03@yahoo.com
पुरस्कार व सम्मान- रु ३००/- का नकद इनाम+ रु २००/- की कविताओं की किताबें + प्रशस्ति-पत्र।
सुनीता जी के अलावा हम डिवाइन इंडिया, रीतेश गुप्ता, कमलेश आदि पाठकों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे जिन्होंने ने हमें गम्भीरता से पढ़ा।
पुनः कविताओं की तरफ़ बढ़ते हैं।
दूसरे स्थान पर रही कवि दिनेश पारते की कविता 'प्रणय निवेदन'। यदि पहले चरण का निर्णय अंतिम माना जाता तो दिनेश पारते ही हमारे यूनिकवि होते, परंतु अंतिम निर्णयकर्ता ने इन्हें दूसरे स्थान पर रखा। खैर इस बार न सही, अगली बार इनका स्थान प्रथम अवश्य होगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
कविता- प्रणय निवेदन
कवि- दिनेश पारते, बंगलुरू
हे छंद नज़्म हे चौपाई, सुन लो मेरा उद्गार प्रिये
तुम गीत ग़ज़ल हो या कविता, तुम ही हो मेरा प्यार प्रिये
मैं काव्यचंद्र का हूँ चकोर, मैं काव्यस्वाति का चातक हूँ
यह प्रणय निवेदन तुम मेरा, अब तो कर लो स्वीकार प्रिये
तुम मुक्तक हो उन्मुक्त कोई, या स्वरसंयोजित कोई छंद
उद्दाम लहर हो सागर की, या ठहरी-ठहरी जलप्रबंध
गाती बहलाती मन अपना, हो पिंजरबद्ध कोई पाखी
या फिर सीमाहीन गगन में, नभक्रीड़ा रत विहग वृंद
आखेट करूँ या फुसला लूँ, बोलो, क्योंकि अब तुम ही हो
मुझ जैसे आखेटक प्रेमी के, जीवन का आधार प्रिये
लिये प्रेम की पाती नभ में, 'मेघदूत' की कृष्ण घटा सी
मयख़ारों के मन को भाई, 'मधुशाला' की मस्त हला सी
गीतसुसज्जित कानन वन में, स्वरसुरभित चंदन के तनपर
नवकुसुमित कलियों को लेकर, लिपटी सहमी छंद लता सी
नव पाँखुरियों की मधुर गंध, छाई काव्यों के उपवन में
निज श्वास सुवासित करने का, दे दो मुझको अधिकार प्रिये
दिन में उजियारा फैलाया, बनकर संतों की सतबानी
संध्याकाल क्षितिज पर छाई, चौपाई की चुनरी धानी
प्रथम प्रहर लोरी बनकर, तुमने ही साथ सुलाया था
द्वितीय प्रहर तुम स्वप्नलोक में, विचरित मुक्तक मनमानी
तृतीय प्रहर चुपके से आकर, जो तुमने था छितराया
धवल-धवल शाश्वत शीतल, बिखरा तृण-तृण में तुषार प्रिये
कल तक इठलाती मुक्तक थी, अब काव्यखंड बनकर आई
अब चंचल बचपन बीत गया, यौवन ने ली है अंगड़ाई
चिरप्रेमी हूँ मिलना ही था, है शाश्वत प्रेम अमर अपना
पहना जब मौर मुकुट मैंने, दुलहन बनकर तुम इतराई
अक्षर, शब्दों, रस, भावों के, लाया आभूषण मैं कितने
उनमें से चुनकर कर लेना, तुम नित नूतन श्रंगार प्रिये
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
गीत की रवानगी मन मोह लेती है, कवि के शब्द चयन और प्रयोग प्रभावित करते हैं। गीत इतना नपा तुला है कि प्रत्येक शब्द कवि की प्रतिभा दर्शाते हैं। कवि की भावनायें खुल कर तो बाहर आयीं हैं खिल कर नहीं आयीं...
कला पक्ष : ८.५/१०
भाव पक्ष : ७.५/१०
कुल योग: १६/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३००/- तक की कविताओं की पुस्तक(पुस्तकें)।
तीसरे स्थान की दावेदार दो-दो कविताएँ रहीं और एक सुंदर संयोग भी रहा कि इन दोनों कवियों की कविताएँ पिछली बार भी अंतिम चार में थीं। स्थाई पाठक समझ गये होंगे कि वे दोनों कौन-कौन हैं। एक तो हैं इंदौर के विपुल शुक्ला जिनका सपना ही हिन्द-युग्म का सबसे कम उम्र का यूनिकवि बनना है। इनकी कविता 'परित्यक्त' को भी सभी ज़ज़ों ने अपनी टॉप लिस्ट में रखा, परंतु अंतिम दौर के निर्णयकर्ता शायद कुछ और तलाश रहे थे।
कविता- परित्यक्त
कवि- विपुल शुक्ला, इंदौर (म॰प्र॰)
परित्यक्त सा "वह"....
मंदिर के बाहर पड़े हुए जूतों सा ,
या आदमियों के कचरे के विशाल ढेर में दबा ,
सरकारी चिकित्सालय में ,
यूँ ही पड़ा.......
"वह".....
जैसे कोई गंदा सा ,
फेंका हुआ बिछोना.. ..
आम के पेड़ से टपकी ,
पकी हुई निबोली..
निबोली..जिसे कोई नहीं ख़ाता..
जिसकी कड़वाहट सीमित है ,
बस ख़ुद में ही...
रक्त...
अच्छा या गंदा..सशंकित "वह" ,
उसकी चिपचिपाहट ,
उंगलियों में महसूस करता है .
जो कम्बख़्त ..
अपने जैसे लोगों की बू ही पसंद करता है ..
रक्त.. जिसका होना
एक विवशता..
व्यर्थ ही चिपका है उससे ,
यह रक्त...
अनचाही लाली से मुक्ति पाने की कोशिश,
अपनी ही बू से निज़ात पाने का प्रयास..
अशक्त है "वह"..
जन्मदाता..
जकड़ा है दुनिया की रीतों में ,
जैसे सपेरे के पिटारे में नाग..
भावनाओं के साथ ही ,
हल्का कर लिया कोख को भी..
सशक्त वो भी नहीं..
उसकी बग़ावत..
जैसे कुएँ की दीवार पर ,
किसी ख़ाली बर्तन की टकराहट...
क्या करे ?
होने दो जो हो....
पैदा होने बाद ,
अब इंतज़ार में..
कि उसके माँ-बाप भी पैदा हो ......
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कविता गंभीर है, बड़े सवाल भी उठाती है। कई बिम्ब सुन्दर बन पड़े हैं। कविता मध्य में भटकती है और पाठक को भ्रमित भी करती है किंतु कविता की अंतिम पंक्तियाँ झकझोर देती हैं।
कला पक्ष : ७/१०
भाव पक्ष : ७.५/१०
कुल योग: १४.५/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३००/- तक की कविताओं की पुस्तक(पुस्तकें)।
तीसरे स्थान की दूसरी कविता के रचयिता श्री कमलेश नाहता 'नीरव' ने हिन्द-युग्म को मेल करके पूछा था कि प्रतियोगिता में क्षणिकाएँ भेज सकते हैं? , हमने उत्तर दिया कि आप किसी भी प्रकार की कविता भेज सकते हैं, और उन्होंने क्षणिकाएँ भेजकर ज़ज़ों को कन्फ़्यूज़्ड कर दिया। किसी ज़ज़ ने कम अंक दिए तो किसी ने सर्वाधिक। लेकिन इतना होने पर भी इनकी क्षणिकाएँ अंतिम दौर में पहुँच गईं।
कविता- क्षणिकाएँ
कवि- कमलेश नाहता 'नीरव' , चेन्नई
विकीर्ण प्रकाश सागर में,
विप्रलब्ध रश्मि एक मतवाली।
मेरे विरंजित हृदय में,
ढूंढे प्राणों की होली ।।
……………….
समय अब न एक चला चल ।
मोड़ पर रुक-रुक कर,
आशा दीप जल-जल कर,
मग पर पग- पग बने पदचिन्ह -
थक गए हैं ।
बुझ गए हैं ।
मिट गए हैं ।
………………………
प्रपंच विषम ,
गूढ़ प्रण मानव का एक ।
क्षण - क्षण प्रयास,
बदलने विधि का लेख ।।
………………..
देख अवनी का नभ से वारित अभिसार,
जाने क्यों हो जता हृदय का,
छिन्न तार-तार ।
है मध्य शून्य ही दोनों के , फिर भी
कुल दो और समुद्र अपार ।
..................
प्रात: प्रथम रश्मि आती
बन मंजुल प्रणय- निवेदन ।
आवृत्त इंकार धरती का
चिर सुलगित दिनकर का अंत:मन ।
………………
हृदय में फैली कालिमा का बन यामिनी
आँखों में यूँ उतरना ।
इस घन तम में स्वप्न रंजित तारों का
पुलकित हो चमकना ।
बीतते पहरों में क्षणभंगुर बन
समय का खो जाना ।
प्रात: कुसुम सज्जित शयन पट का फिर
क्षण - रेत हो बह जाना ।
..........................
उसकी राख ही थी वह
मेरा अस्तित्त्व जो मिटा गयी ।
खुद जल-जल कर, मेरे द्रगों में
मुझे कुछ बुझा-सी गयी ।
..............
वह हाथ की रेखाएँ ही थीं ,
जो नियति पाश मेरा कसती ।
यह समय की चाल ही है ,
जो विधि को सच कर ; मुझे डसती ।
..............
अञ्जुली भर कर उस अनंत का,
होता विलय उसी अनंत में ।
कर समर्पित कण- कण स्व का
शून्य होता मैं उसी शून्य में ।
अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
कवि ने विधा के साथ पूरा न्याय किया है, सुन्दर क्षणिकायें हैं। बहुत ही स्तरीय लेखन। इस शैली में क्षणिकायें पढ़ने को नहीं मिलतीं। प्रकृति से जुड़े बिम्ब गंभीर भावों का सुन्दर शब्द-चित्र खींच रहे हैं। कहीं-कहीं कवि ने अनावश्यक रचना को दुरूह किया है, जिससे भावों की संप्रेषणीयता घटी है।
कला पक्ष : ७.५/१०
भाव पक्ष : ७/१०
कुल योग: १४.५/२०
पुरस्कार- सृजनगाथा की ओर से रु ३००/- तक की कविताओं की पुस्तक(पुस्तकें)।
जैसाकि १ मई २००७ को हमने उद्घोषणा की थी कि हम प्रति शुक्रवार को और उन वारों को जिस दिन हमारे नियमित कवि अनुपस्थित रहते हैं, अंतिम १० में पहुँची कविताओं को प्रकाशित करेंगे (ज़ज़ों के निर्णय/कमेंट के साथ) । अतः हम उन कवियों के नाम दे रहे हैं जिनकी-जिनकी कविता आप आने वाले दिनों में हिन्द-युग्म पर पढ़ेंगे-
- श्यामल किशोर झा
- कवि कुलवंत सिंह
- देवेश वशिष्ठ 'ख़बरी'
- वरुण कुमार
- स्वर्ण ज्योति
- श्रद्धा जैन
- सुनीता चोटिया
(उपर्युक्त कवियों से अनुरोध है कि हिन्द-युग्म में भेजी गई अपनी कविता को ३१ मई तक प्रकाशनार्थ कहीं न भेजें।)
कवियों की सूची बहुत लम्बी है। यह जितनी लम्बी होगी, हमारा उत्साह वैसे ही संगुणित होता जायेगा। इनके अतिरिक्त जिन कवियों ने भाग लिया उनके नाम हैं-
- स्मिता तिवारी
- विशाखा
- गौरव कौशिक
- अमन महाजन
- श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
- निखिल आनन्द गिरि
आप सभी ने प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर हमारा हौसला बढ़ाया, हम आप सभी के बहुत शुक्रगुज़ार है। चूँकि यूनिकवि एक ही होता है, अतः परिणाम को सकारात्मक लें, प्रतियोगिता में पुनः-पुनः भागे लें। इस बार प्रतियोगिता में अपनी कविता भेजने की अंतिम तारीख हमेशा की तरह १५ मई २००७ है। अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें।





























31 टिप्पणी:
विजेताओं को हार्दिक शुभ कामनाऐं।
अजय भाई बहुत ही अच्छी कविता है। बधाई
विजेताओ को मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई।
अजय यादव एवं सुनीता चोटिया जी को बधाई
बहुत बहुत बधाई दोनो विजताओ को मेरी तरफ़ से
बारिश की बूँदें थी आईं, पीछे ओला-वृष्टि हुई थी
आधे घंटे से भी कम में, श्वेत-खेत की सृष्टि हुई थी
जहाँ कहीं भी नज़र घुमाएँ, या जल था या जलते ओले
वर्षा के पानी का मैंने, आँखों में तिरना देखा था।
बादल का घिरना देखा था।
बहुत ही सुंदर भाव हैं ...
लिये प्रेम की पाती नभ में, 'मेघदूत' की कृष्ण घटा सी
मयख़ारों के मन को भाई, 'मधुशाला' की मस्त हला सी
गीतसुसज्जित कानन वन में, स्वरसुरभित चंदन के तनपर
नवकुसुमित कलियों को लेकर, लिपटी सहमी छंद लता सी
दिनेश पारते, जी बहुत ख़ूब लिखा आपने
बाक़ी सबका लिखा भी बहुत अच्छा लगा ...सबको पुन: बधाई
अजय यादव एवं सुनीता जी को शुभकामनाओं के साथ बधाई
अजय यादव जी आपको बहुत-बहुत बधाई!
सुनीता चोटिया(शानू)
अजय जी और सुनीता जी को बहुत बधाई।
विजेताओ को मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई।
अजय यादव जी एवं सुनीता चोटिया जी को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई।
दिनेश पारते - ki kavita 'प्रणय निवेदन' bahut acchi lagi .
kamlesh
अजय जी की प्रतिक्रियायें देखकर मुझे लगता था कि आप अच्छा लिख सकते हैं।
मेरी सोच को आप ने सही साबित किया।
शानू जी से भी मेरी काफी उम्मीदें हैं।
आप दोनों को मेरी तरफ से बहुत-२ बधाई और धन्यवाद कि आप ने आप लोग हिन्द-युग्म के ज़रिये हिन्दी को समृद्ध कर रहे हैं ; जोकि हिन्द-युग्म का उद्देश्य है।
विजेताओ को मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई।
अजय जी, विपुल जी और कमलेश जी,
आप लोगों की कवितायें पढ़ी ।
कितनी भिन्न-भिन्न सोच है, भिन्न-भिन्न शिल्प है, भिन्न-भिन्न अभिव्यक्ति है हम चारों की । उद्देश्य फिर भी एक ही है....सृजन...अनन्त सृजन ! और हम इस उद्देश्य में सतत् प्रयत्नशील रहेंगे ।
आप सभी को बधाइयाँ एवं ढेरों हार्दिक शुभकामनायें !
अजय यादव जी और सुनीता चोटिया जी को बहुत-बहुत बधाई!!!
दिनेश पारते जी, आपकी कविता "प्रणय-निवेदन" ख़ास तौर पर मुझे बहुत अच्छी लगी। भावों को बहुत ही खूबसूरत स्वरूप दिया है आपने। बधाई!!!
स्मिताजी, आपकी पेंटिग्स लगातार "हिन्द-युग्म" पर कवियों की कल्पना को संजीव कर रही है, आभार।
विपूलजी, सरल शब्दों आपने बहुत कुछ कह दिया है, काश इसे सभी समझ सके।
कमलेशजी, आपकी क्षणिकाएँ कमाल की है, संभवतया मैं इस प्रकार की क्षणिकाएँ पहली बार देख रहा हूँ, मन मोह लिया है आपकी क्षणिकाओं ने।
प्रतियोगिता में भाग लेने वाले अन्य कवि/कवयित्रियों, एवं समस्त पाठको को भी हार्दिक धन्यवाद।
विजेताओ को
मेरी तरफ से
ढेर सारी बधाई।
सभी विजताओं को मेरी ओर से बहुत बहुत बधाइयाँ....
दिनेश जी के शिल्प का तो मे कायल हो गया हूँ इनके गीत ने सचमुच मन मोह लिया
अजय जी के भाव भी सचमुच तारीफ़ के काबिल थे
और कमलेश जी के तो क्या कहने...ऐसी क्षणिकाओं को सचमुच मैने पहली बार ही देखा है
सभी कवियॊं को मेरी तरफ़ से शुभकामनाऎं
विजेताओं को बहुत बहुत बधाई।
एक बात कहना चाहता था कि जो बात विपुल जी की कविता में है वह और किसी की कविता में मुझे नजर नहीं आई, और हाँ नाहटा जी क्षणिकाय़ें भी अच्छी रही।
वैसे कविता के मामले में अपना हाथ जरा तंग है फिर भी शुक्ल जी कविता ने प्रभावित किया।
अन्य कवियों को निराश करना मेरा उद्धेश्य नहीं है, बस मैने अपने मन की कही है सो किसी को बुरा लगा हो तो क्षमायाचना।
यह बहुत अजीब बात है कि प्रतियोगी कवि ही प्रतियोगिता के लिए अपनी कविता भेजकर हिन्द-युग्म को भूल जाते हैं। कम से कम विजेता कवियों और यूनिपाठिका को बधाइयाँ तो देनी चाहिए। खैर मैं काफ़ी इंतज़ार के बाद टिप्पणी कर रहा हूँ। लोगों की प्रतिक्रियाएँ देखकर तो यही लगता है कि हमारे निर्णय से ९५ फ़ीसदी लोगों को एतराज़ नहीं है। यह हमारे लिए अच्छी बात है। सर्वप्रथम इसके लिए आप सभी का धन्यवाद। सबसे अधिक धन्यवाद मैं करना चाहूँगा सागर चंद्र नाहर का जिन्होंने बेझिझक अपना निर्णय बताया। यहाँ हर पाठक अपने आप में एक निर्णयकर्ता है, आपके विचारों का हमेशा स्वागत रहता है।
मैंने कभी सोचा नहीं था कि कोई अपनी प्रथम दौर की कविताएँ लिखे, प्रतियोगिता में भाग ले और यूनिकवि बन जाये। हालाँकि प्रतिभागियों की संख्या १७ ही थी, फ़िर भी यह एक बड़ी बात है। सर्वप्रथम उन्हें ढ़ेरों बधाई। हमारे अंतिम निर्णयकर्ता सच ही कहते हैं कि इनकी कविता 'बादल का घिरना देखा था' एक समपूर्ण कविता है। कविता का शिल्प बहुत अधिक भले ही न प्रभावित करता हो मगर कविता में निहित भाव अत्यधिक स्वभाविक या प्राकृतिक है। कवि को बनावट से बचना चाहिए। केवल सुंदर शब्द हों, इससे काम नहीं चलेगा, ऐसी कविताएँ बहुत दिनों तक प्रासंगिक नहीं बनी रहतीं। मगर यूनिकवि की कविता दीर्घकालिक है।
दिनेश पारते की कविता 'प्रणय निवेदन' की प्रथम चार लाइनें जैसे ही मैंने पढ़ी, मुझे युवा कवि सुनील जोगी की कविता याद आ गई-
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, यह प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम एमए फ़स्ट डिवीज़न हो, मैं हुआ मैट्रिक फ़ेल प्रिये।
सुनील कविता की यह कविता प्रवाह और लयबद्धता में 'प्रणय निवेदन' से शत-प्रतिशत मिलती है। अब कौन सी कविता किससे प्रभावित है यह तो सुनील जाने या दिनेश। यह भी सम्भव है कि दोनों कविताएँ एक-दूसरे से प्रभावित न हों। मगर दिनेश पारते की कविता शिल्प, शब्द-संयोजन अद्भुत है। सुनील की कविता के शब्द बहुत अधिक चालू हैं जबकि दिनेश की कविता के शब्द अत्यधिक सुंदर और उपयुक्त भी।
अंतिम निर्णयकर्ता ने लिखा है कि विपुल शुक्ला की कविता 'परित्यक्त' बीच में भटकती है, मेरे हिसाब से भटकती कहीं नहीं है लेकिन कविता को तुरंत ही पाठकमन तक हस्तांतरित नहीं कर पाती। दिमाग पर अधिक ज़ोर भी देना पड़ता है कि मध्य की पंक्तियाँ क्या कहना चाह रही है? कविता को जासूसी टाइप का लिखने से बचना चाहिए। कविता के भावपक्ष को ९ या १० अंक तक दिये जा सकते हैं। हमारे बीच निराला, महादेवी जैसे ज़ज़ नहीं है, सम्भव है यदि वे लोग ज़ज़ होते तो विपुल शुक्ला यूनिकवि होते।
कमलेश नाहता अपने आप में पहुँचे हुए कवि हैं, कविता की क्षणिका विधा पर भी इनकी पकड़ अनूठी है। सभी क्षणिकाएँ यदि एक ही विषय-वस्तु पर होतीं तो अधिक मज़ा आता। खैर क्षणिकाओं का तो कविताओं में वहीं स्थान है जो कहानिओं में लघुकथाओं का। देखते हैं इस बार नीरव क्या लेकर आते हैं?
यह बात उल्लेखनीय है कि श्रीमती सुनीता चोटिया जैसा नियमित पाठक हमें कोई नहीं मिला। हमारे शुरूआती यूनिपाठक भी पहले तो बहुत सक्रिय थे मगर बहुत ज़ल्द ही बिजी हो गये। सुनीता जी चाहें जितनी व्यस्त रहें, हिन्द-युग्म की कविताओं का आस्वाद लेने अवश्य आती हैं। हम उन्हें केवल धन्यवाद कहें तो भी शर्म की बात होगी।
सभी प्रतिभागियों का पनश्चः धन्यवाद। उनसे पुनर्भागीदारी की उम्मीद है।
अजय जी आप गहरे पाठक तो हैं ही साथ में आपकी लेखनी भी असाधारण रूप से सशक्त है
प्रतियोगिता में विजयी होने के लिये हार्दिक बधाई
विश्वास है भविष्य में भी आपसे ऐसा ही अनुपम कव्य पढ्ने को मिलता रहेगा|
सुनीता जी,एक गंभीर पाठक किसी लेखक के लिये कितना महत्वपूर्ण है आप स्वयं परिचित है इस बात से
आपकी अमूल्य टिप्पणियाँ हमारे कविमित्रों के लिये निश्चित ही मार्गदर्शक हैं|
बहुत बहुत बधाई
सभी प्रतियोगियों ने बहुत ही सुन्दर रचनायें लिखी हैं
भविष्य के लिये मेरी हार्दिक शुभकामनायें
सस्नेह
गौरव शुक्ल
इंटरनेट पर पठन-पाठन की संस्क्रिति को आगे बढाने के लिए हिन्द-युग्म का प्रयास सराहनीय है। दिनेश पारते की कविता "प्रणय-निवेदन" अच्छी लगी। पढ़ते समय प्रेम-आनंद की अनुभूति हुई।
मेरी कविता को पसंद करने के लिये हिन्द-युग्म, निर्णायकों तथा पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद और सुनीता जी को बधाई, यूनिपाठिका चुने जाने पर। बाकी सभी प्रतियोगी साथियों की अब तक जो कविताएं पढ़ी हैं,उन्हें देखते हुए, विश्वास नहीं होता कि निर्णायकों को मेरी कविता सबसे ज्यादा पसंद आ गई। आगे भी मैं कोशिश करूँगा कि पाठकों की आशाओं पर खरा उतर सकूँ। अपनी व्यस्तता के चलते युग्म पर कम समय दे पाने के लिये में क्षमाप्रार्थी हूँ।
sabse pahle vijetaao ko badhaai...
khas kar badal ka ghirna dekha tha...kavita bahot achchi lagi.....mujhe kavita likhna to achchi tarah nahi aata...is liye koi tippani karne se darti hoon.....haan parhna bahot pasand hai.....par bhasha agar bahot klisht ho jaye to.....janmanas ke hriday ko nahi choo pati...mujhe asa lagta hai.....jitni sahaj aur saral bhasha ho..utna hi hriday sparsh karti hai.....
अजय यादव जी और सुनीता चोटिया जी को बहुत-बहुत बधाई...
*** राजीव रंजन प्रसाद
हिन्द युग्म प्रगति पथ पर अग्रसर है, शैलेश बाबू जैसे नायक के रहते कुछ भी असम्भव नहीं ।
हर बार की भांति इस बार भी क्रमशः बढता अविश्वास और दृढ हुआ है, कि चुक रहे हैं कवि शायद, जमे हुये हिन्द युग्म के महारथियों पर क्या ही कुछ कहूंगा, पर नये कवि इस विचारधारा को बल दे रहे हैं ।
प्रतियोगिता है, हां एक मजबूरी भी होगी कि कोई तो प्रथम होगा, द्वितीय और त्रतीय भी कोई ना कोई तो आना ही चाहिये । भले ही बाबा नागर्जुन की "बादल को घिरते देखा है" को "बादल का घिरना देखा था" बनना पड़े या सुनील जोगी के कांधे पर धरकर बन्दूक चलायी जाये । ऊपर से तुर्रा ये कि कवि नहीं हैं, नये हैं, साहब डाक्टरों ने दवा के साथ नुस्खों मे अब कविता पेलना भी लिखना शुरु कर दिया है क्या ?
विपुल की कविता गम्भीरता की कविता है, सवाल खड़े करती है, जवाब टीपती नहीं । निःसन्देह त्रतीय स्थान योग्य है, ऊपर वालियों के लिये कुछ कहना बचा है क्या ?
खैर जय हिन्द, जय हिन्दी, जय हिन्दुस्तान..(लोकतंत्र है बाबू....क्या सही ?)
उपस्थित जी,
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हम कवियों/प्रतिभागियों से भी अधिक नौसीखिए हैं। और शायद हमारे पास प्रतिभागी भी कम हैं। लेकिन मैं आपको बस आश्वस्त ही कर सकता हूँ कि एक दिन अवश्य आयेगा जब आप प्रतियोगिता की सभी कविताएँ पढ़कर वाह-वाह कर उठेंगे। मैं आपको यह बता नहीं सकता कि आपकी इस टिप्पणी से मैं कितना खुश हुआ, आपकी टिप्पणी से साफ़-साफ़ लगता है हिन्द-युग्म के पाठक हमारी कविताओं को कितना ध्यान से पढ़ते हैं। हम हमेशा जी आपके ही मार्गदर्शन और दिशानिर्देशों पर चलते आए हैं और चलते रहेंगे।
एक बात और बता दूँ, हमारे यूनिकवि ने यह बात छिपाई नहीं थी कि उनकी कविता नागार्जुन की कविता 'बादल को घिरते देखा है' से प्रभावित है। मगर जब मैंने उनकी पूरी कविता पढ़ी तो देखा कि शीर्षक भले ही प्रभावित लगता हो, मगर भाव बिलकुल अलग हैं, मौलिक कविता कहने में झिझक नहीं हुई क्योंकि मैंने भी यूपी बोर्ड में नागार्जुन की यह कविता पढी थी। फ़िर भी हम आगे से इसका भी ख़्याल रखेंगे। पोस्ट में देना इसलिए भी कम ऊचित था क्योंकि पाठक की सोच दिग्भ्रमित होती। आज आपने प्रश्न किया है तो अजय जी का भेजे हुए मेल के कुछ अंश प्रकाशित कर रहा हूँ-
"महोदय,
हिन्द-युग्म द्वारा संचालित 'यूनिकवि प्रतियोगिता' के लिये मैं अपनी अधोलिखित कविता भेज रहा हूँ। यह कविता, मैंने कुछ समय पहले हुई बेमौसम बरसात तथा ओला-वृष्टि को देखकर लिखी थी। दरअसल मेरे कार्यस्थल के आसपास अभी काफी खेत हैं और इस सबसे इनमें खड़ी लहलहाती फसलों को खासा नुकसान हुआ था। यह दृश्य और किसानों के मनोभाव जानने के बाद, मेरे मन में आरम्भ में बादलों को घिरते देखकर कविवर नागार्जुन जी की कविता की जो पँक्ति उपजी थी (अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है,) उसी ने इस कविता का रूप धारण कर लिया। अतः इसके लिये मैं श्रद्धेय नागार्जुन जी का अत्यंत आभारी हूँ। मैंने इस कविता द्वारा कविवर की पँक्ति का मान रखने का अपनी ओर से पूरा प्रयास किया है ;पर कितना सफल हुआ हूँ, यह निश्चय पाठकों और निर्णायकों को करना है।"
अजय यादव और सुनीता चोटिया को बधाई।
अजय यादव की कविता में कई कमियां लगीं। शब्दों की उपयुक्तता, भावों का प्रवाह एवं लय में कमी।
दिनेश पारते की कविता अच्छी बन पड़ी है। हालांकि शब्दोम का संयोजन अच्छा किया है, फ़िर भी शब्द-शिल्प कहीं कहीं भटकता है।
कवि कुलवंत सिंह
उपस्थित जी ,
बाक़ी कवियों और प्रतियोगियों का तो नही पता पर मैं निस्संदेह रूप से नौसीख़िया हूँ |अभी-अभी कविता लिखने की शुरुआत की है और इसे मेरा सौभाग्य ही कहा जाएगा कि हिंदी युग्म का साथ मुझे प्राप्त हुआ । जिस पर आप जैसे पाठकों की पूर्वाग्रहों से अप्रभावित और निष्पक्ष टिप्पणियाँ पढ़ने को मिलती हैं ।
सबसे पहले तो आपको टिप्पणी करने के लिए बधाई देना चाहूँगा परंतु साथ में कुछ बातों पर आपकी कही गई बातों से इत्तेफ़ाक ना रखने के लिए क्षमा भी ।
चलिए.. अजय जी के कविता के बारे मे मान लेते हैं कि किसी अन्य कविता के शीर्षक से इस का शीर्षक मेल ख़ाता है । परंतू आप यदि दोनो कविताओं के भावों को समझने का प्रयास करेंगे तो आपको सहज ही विदित हो जाएगा कि दोनो मे कितनी भिन्नता है .. सरल-सहज भाषा शैली, भावों की सम्प्रेषणीयता के चलते यह कविता निस्संदेह रूप से प्रथम स्थान की उत्तराधिकारी है...
अब दिनेश जी के गीत पर आते हैं । आपका कहना है कि उन्होने सुनील जी के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है । तो इस बारे मैं शैलेश जी ने अपनी टिप्पणी में कहा ही है कि यह तय करना मुश्किल है कि कौन सी कविता किससे प्रभावित है और फिर भी अगर देखा जाए तो अपने शब्द-संयोजन और शिल्प की उत्क्रषटता के चलते दिनेश जी की कविता कही बेहतर प्रतीत होती है ......
अपनी कविता के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा..आपने सही कहा है कि यह सिर्फ सवाल उठाती है उनके जवाब नही देती...इस बात पर मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं ।
हो सकता है कि मेरी राय अन्य लोगों से मेल न खाती हो परंतू इसके लिये मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं नौसीख़िया हूँ |अभी-अभी कविता लिखने की शुरुआत की है ।
नमस्कार
हिन्दी युग्म द्वारा प्रारंभ की गई इस कोशिश के लिए ढेरों बधाईयां..अजय और सुनीता जी को बधाई, शैलेश जी के प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं शुभकामनाएं-
-रेणू आहूजा.
इस ब्लॉग ने मेरे अंदर के कवि को फिर उतपरेरित किया है जो विश्वविद्यालय मे आने के कारण और थोड़ा समयाभाव के करना कहीं विश्राम कर रहा था....विपुल जी ,सुनीता जी और अजय जी को हार्दिक बधाइयाँ......विपुल जी की कविताएँ कठोर है और एक नंगा सच सामने लाती है कि हम किस जग मे जी रहे है कवियों को उज्जवल भविष्य की कामनाएँ.......
आप लोग टिप्पणियों की सँख्या को लोकप्रियता का पैमाना न मानें। आप चाहें तो कुछ टॉप के भारतीय अंग्रेजी ब्लॉगों पर टिप्पणियों की सँख्या देख सकते हैं।
असल चीज है पेज लोड्स। आपकी पाठक सँख्या कितनी है, गूगल से कितने लोग आते हैं? आपके पास जितना ज्यादा तथा क्वालिटी युक्त कंटेंट होगा, गूगल सर्च से उतने ही लोग आएँगे।
लिंक भेज-भेज कर पाठकों को जबरन नहीं लाया जा सकता। ऐसे में बल्कि लोग तंग आ जाते हैं और आना बिल्कुल ही बंद कर देते हैं।
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