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Friday, May 11, 2007

शब्दों की पहचान और कविता


हिन्द-युग्म के सभी युवाओं को इस बात की बधाई दी जा सकती है कि वे कविता के विविध प्रचलित रूपों से जुड़ रहे हैं और उसके करीब पहुँचने की ईमानदार कोशिश भी दिखाई देती है उनमें । लगभग कवियों का लेखन अभी प्रांरभिक दौर में है तथापि जिस तरह से ये कविता के प्रति आस्थावान हैं वह विश्वास जगाता है कि सतत् साधना और समझ को विकसित कर वे अपने अनुभव और अनुभूति से अपने जीवन की श्रेष्ठ कविता तक अवश्य पहुँचेंगे । फिलहाल यदि पिछले अंक की तुलना में इस अंक की कविताओं को परखें तो सभी युवा कवि स्वयं को अतिक्रमित करने की स्थिति में तो फिलहाल नहीं दिखाई देते । वहाँ चौंकने, आश्चर्चचकित हो जाने या भई वाह कह पाने की भी स्थिति निर्मित नहीं बन पाती फिर भी इन कवियों की कविताओं में शब्दों का विस्तार बढ़ा है । एक तरह से नये और रसीले शब्द जुटाने की ललक बढ़ी है । काव्य-शब्दों की पहचान कवितायी का पहला कदम है ।

कविता जो भी हो, आखिर वह शब्दों के काँधे पर सवार होकर ही गंतव्य तक पहुँचती है । उसका समग्र कलेवर शब्दों में ही विन्यस्त होता है । शब्द ही वह ताकत है जो उसके व्यवहारकर्ता को किसी वस्तु, समय, देशकाल और उसके स्वयं के होने को प्रमाणित करता है । शब्द वह दर्पण है जिसमें मनुष्य होने का चित्र दिखता है । वह शब्द ही है जो मनुष्य के इतिहास, कला, संस्कृति, सभ्यता का परिज्ञान कराते हैं। दरअसल शब्दों की(प्रकारांतर से भाषा) महान उपलब्धियों के साथ ही मनुष्य पृथ्वी में सबसे महान् और विशिष्ट जीव होने को सिद्ध करता है । वेद तो शब्द की सबसे छोटी इकाई अर्थात् अक्षर को साक्षात् ब्रह्म मानते हैं । शब्द रचता तो मनुष्य है पर शब्द ही मनुष्य को रचता है । मनुष्य शब्दों, प्रकारांतर से अभिव्यक्ति या भाषा या वाक् जैसी विराट शक्ति के सहारे ही मनुष्य है । जिनके पास शब्द नहीं होता वह या तो पशु होता है या फिर पशुतुल्य हो जाता है । मनुष्य का समस्त ज्ञान उसके द्वारा खोजा, ईजाद किया गया अद्यतन विज्ञान शब्दों के सहारे ही निरंतर भविष्य के लिए हस्तांतरित होता रहा है । शब्दों के बगैर कल्पना कीजिए मनुष्य आज कैसा होता ........... ।

शब्द न केवल अभिव्यक्ति के साधन हैं अपितु वे एक सामान्य भाषा से हटकर काव्य-भाषा के औजार भी हैं । शब्द ही वह इकाई है जो न केवल अभिधा बल्कि लक्षणात्मक और व्यंजनात्मक अर्थों तक पाठक को ले पहुँचाता है । यूं तो कोई भी शब्द अपने निंतात अकेलेपन में कुछ नहीं होता । निराकार पड़ा रहता है । वह तभी साकार होता है जब उपयोगकर्ता उसके नज़दीक जाता है । उसका बोध करता है । उसमें वह वांछित या प्रचलित अर्थ देखता है । कहने का आशय कि शब्द अपने अँधेरे में चुपचाप पड़े रहते हैं । वह व्यव्हृत होने पर जागते हैं । जगाते भी हैं । एकाएक वे न केवल अपने अंधेरे को चीरकर निकल पड़ते हैं, वे मनुष्य की दुनिया को भी रौशन कर देते हैं । शब्दों में ही अतीत, आगत और अनंत की व्याख्या के सूत्र होते हैं । वे ही सभ्यता और संस्कृति के संवाहक होते हैं । वे हमारी अंगुली थामकर कभी कल्पना लोक की सैर कराते हैं तो कभी यथार्थ की खुरदुरी ज़मीन में ले पटकते हैं । शब्द हमें गुदगुदाते हैं, शब्द हमारे नयन-कोरों को भींगा-भींगा देते हैं । वे शब्द ही हैं जो हमे वीरभाव से ओतप्रोत कर देते हैं और शब्द ही हैं जो हमें करूणा से विगलित करने में पूर्ण सक्षम हैं । शब्दों में ही शांति की निर्झरणी बहती है और शब्दों की ताकत से ही क्रांति का नगाड़ा गरजने लगता है । कविता के वैयाकरण जिस अनुभव या अनुभूति को कवि होने की पहली शर्त मानते हैं वह भी अपने मूल में शब्दों में ही आकार ग्रहण करता है । शब्दों के बगैर कैसा अनुभव, कैसी अनुभूति ! जिसे हम अर्थ कहते हैं वह भी आखिरकार शब्द या शब्दों की नौका में बैठकर ही हमारे मन-मस्तिष्क तक हबर पाता है । उसके बगैर कदापि नहीं । जिसे हम कविता में भाव या अनुभाव जानते हैं वह भी शब्दों के माध्यम से कवि के मस्तिष्क में जनम लेते हैं । विकसते हैं । पल्लवित होते हैं । मनुष्य होने के वास्तविक मायने के साथ मनुष्य का सारा कार्य व्यापार शब्दों की परिधि में ही सम्भव है । शब्दों के बगैर वह, सोचिए भला क्या है आखिर .......

दैनिक व्यवहार में शब्द सामान्यतः एक सपाट और सामान्य अर्थबोध कराता है । यानी कि एक प्रचलित मायने जिसे हम समाज, शिक्षा, संस्कार या देश-दुनिया से जानते-सीखते हैं । उसका बोध करते हैं और वही मायने हमारे मनीषा में पैठ जाता है । यूं तो कवि उन्हीं शब्दों के सहारे अपनी कविता की गंगा प्रवाहित करता है परंतु वहाँ शब्द ठीक उस तरह नहीं आते जिस तरह से सामान्य व्यवहार या दैनिक जीवन में । सच तो यह है कि कवि अपने शब्द दैनंदिन से ही लेता है परंतु वह उसे अपनी कला चातुर्य से एक नया अर्थ भरने की क्षमता भी रखता है । कवि को शब्द-शिल्पी भी कहा गया है । छायावाद नामक शब्द पं.मुकुटधर पांडेय जी गढ़ लेते हैं । यौनगंध शब्द का पहला प्रयोग डॉ. बलदेव कर सकते हैं । अव्यक्त की भी अभिव्यक्ति शब्द कराते हैं ।

एक ही शब्द से हम गाँव पहुँच जाते हैं और एक ही शब्द से शहर । मनीष वंदेमातरम् की सनीचरी कविता का ही उदाहण लेते हैं –‘सनीचरी’ शब्द कहते ही पाठक के मन-मस्तिष्क में चित्र उभरता है वह ठेठ गाँव का है । एक स्त्री की कहानी की संभावना एक ही शब्द में होने लगता है । पाठक एक ही शब्द से जिज्ञासु हो जाता है कि यह कविता स्त्री के मातृत्व संकट का बयान करेगी या फिर पुरुषवादी वर्चस्व की खिल्ली उडायेगी । यह जिज्ञासा ही वह तनाव है जो पाठक के लिए एक आग्रह रचता है कविता पढ़ने के लिए और किन्ही अर्थों में यही इस कविता की संप्रेषणीयता भी बन जाती है। यहाँ सयान, फुल्ली, खेलाड़ी, नरई, माहूर, बोर आदि शब्द भी हैं तो लोक-समाज के व्यवहृत और पुराने या घिसे हुए शब्द, पर ये हर शब्द यहाँ एक चमत्कार भी गढ़ते हैं । ये सब मिलकर कविता में पूरी तरह से एक भूगोल निर्मित करते हैं । सनीचरी नामक कविता की नायिका का इतिहास बताते हैं और उसके वर्तमान को भी हमारे भीतरी आँखों में उकेरने लगते हैं । और इस तरह से यह कविता पूरी तरह से लोक-बिंबों के सहारे सनीचरी की कथा-व्यथा को पाठकों के सहृदय तक ले पहुँचाती है । पाठक को एक लोकधर्मी कविता का पूरा आस्वाद मिलता है । इस कविता को पढ़ने वक्त पाठकों को न केवल सनीचरी नामक ग्रामीण कन्या दिखाई देने लगती है बल्कि सामाजिक स्थिति की तस्वीर के साथ-साथ समग्र परिवेश झिलमिलाने लगता है ।

चौका-बासन करते-करते
सनीचरी कब 'सयान' हो गई
पता ही नहीं चला
चलता भी कैसे
माई के आँख में 'फुल्ली' जो पड़ गई थी।

यहाँ सनीचरी व्यक्ति वाचक संज्ञा के साथ-साथ कविता में कथ्य के व्यंग्य को भी चरितार्थ करती है । दूसरा शब्द देखिए – सयान । यहाँ सयान होने का मतलब सिर्फ उम्रगत नहीं है अपितु उसमें उम्रवृद्धि के साथ उसके मनोभाव, आकांक्षा, दैहिक परिवर्तन और आवश्यकताओं की ओर भी इशारा है । कुछ और पंक्तियाँ देखते हैं -

ऐ सनीचरी!
अभागिन!
तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे बाबू अपनी नाक के नीचे डूब के मर गये
और तुम्हारी माई
अपने कोख को सरापते-सरापते मर गई।

यहाँ भी नाक के नीचे डूब के मर गये में मात्र ईज्जत के नाम पर मर मिटने की बात नहीं है । सच कहा जाय तो कवि ने यहाँ जाने-अनजाने शिल्प का नया चमत्कार पैदा कर दिया है । यही है कवि द्वारा नये शब्द गढ़ने या नयी भाषा या नया शिल्प गढ़ने की कला । आखिर कविता में कुछ न कुछ ऐसा होना चाहिए जो बोलचाल की भाषा से हटकर हो । यानी कि गद्य होते हुए भी गद्य न हो । उस गद्य में एक लय हो । एक छंद हो । नया शिल्प हो । आखिर इनके बिना क्योंकर कोई पाठक किसी कवि के पास जायेगा । और सच्चे अर्थों में यही कविता की मौलिकता भी है ।

इस कविता में प्रांसगिकता की दृष्टि से जब देखते हैं तो वह उस मामले में स्थायीत्व लिये हुए है । आप कल्पना करें कि आपका हमारा देश-परिवेश और उसमें रचा पचा हमारा गाँव आज से पचास पहले का है और मैं तो यहाँ तक भी कहूँगा कि आप आने वाले पचास साल के बाद के भारत और उसके गाँव की कल्पना करें तो यही सनीचरी आपको दिखाई देने लगेगी । तब यह कविता पुनः जी उठेगी । यह कविता की प्रांसगिकता का परिचायक है । कहा भी गया है कविता में भविष्य को देख लेने की एक तीक्ष्ण-दृष्टि भी होती है । जो यहाँ दिखाई देती है ।

मैं कोई लंबी-चौड़ी बात नहीं करूँगा । न ही हर कवि की कविता पर इसी अंदाज से कुछ कहना उचित समझता हूँ क्योंकि यहाँ सृजनरत सभी कवि सयाने हैं, लगातार लिख रहे हैं । उन्हें लिखने का शउर है । वे अपनी कविता को एक पाठक बनकर भी देखना जानते हैं । और वे ऐसा कर भी सकते हैं । यहाँ मैं उपर्युक्त कवि यानी मनीष को भी इसलिए अपने उदाहरण में नहीं लिया हूँ कि सिर्फ उनकी कविता ही बेहत्तरीन है बल्कि वह उदाहरण के तौर पर अनायास है । हर कवि के पास यह बातें है जो आपने इस माह लिखीं है ।

मैंने अपनी मति से कुछ संकेतों में कविता लिखने के पहले पायदान की बात कही है यानी कि शब्दों की पहचान । यदि आप सभी सिर्फ इतनी ही बातों में अपनी कविता को देख-परख सकें तो वह एक तरह से स्वयं की आलोचना भी होगी । कदाचित् ऐसे में हो सकता है कि आप में से कुछ कवि अपनी कविता में प्रयुक्त कुछ शब्दों को फिर से तराशने भी लगें । रेंदा, छैनी लेकर । कुछ निहायत अनावश्यक शब्दों को अपनी इन कविताओं से हटाना भी उचित समझें । कहा भी गया है कविता कुछ न हो तो न हो । अपने होने का आभास तो है ही और अपने होने के तरीके पर भी प्रकाश डालती है । मित्रों एक बार आप अपनी कविता को फिर से देखें । कुछ परिवर्तन होने की गुंजायश दिखे, तो सच्चे मन से उसे स्वयं सुधार लें । रिराइट कर लें । यही कवि की प्रारंभिक रचना प्रकिया होनी चाहिए । यदि नहीं तो आपको किसने रोका है कविता करने से । मैं भी कौन होता हूँ आपकी कविता पर कुछ कहने वाला । पर एक बात मैं यहाँ जरूर कहना चाहूँगा कि यहाँ जो भी कहा-लिखा हूँ सिर्फ एक सरस पाठक की हैसियत से । सहृदयता के साथ । वैसे मुझे मेरी हैसियत मालूम है और आपको अपनी । फिलहाल तो मेरी जो टिप्पणी है आपकी कविताओं के लिए यही है । और उसे मैं पूरी विनम्रता के साथ कह रहा हूँ।

फिलहाल सभी कवियों को फिर से एक बार गतिशील रहने के लिए इन्हीं आग्रहों के साथ-
जयप्रकाश मानस ।

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2 कविताप्रेमियों का कहना है :

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मानस जी,

मैं इसे युग्म की सफलता ही मानता हूँ जो हमारे नौसीखिये कवि भी आप जैसे बड़े साहित्याकारों का ध्यान आकृष्ट कर पा रहे हैं। नये लेखकों की शब्द-संरचना दूषित इसलिए भी है क्योंकि हमारी हिन्दी प्रचलित रूप में ऐसी ही हो चुकी है। परंतु आपकी भी बाद ग़ौर करने लायक है 'अनावश्यक शब्दों के चयन से बचाव, ज़रूरी शब्दों का समायोजन साहित्यकार का आचरण होना चाहिए'। आशा है आपकी यह यूनिमीमांसा हमारे कवियों को बहुत कुछ सीखाएगी।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय मानस जी.
आपकी समीक्षा का युग्म पर इस तरह इंतजार रहता है जैसे किसी परीक्षा का रिजल्ट निकलने वाला हो। शब्दों की पहचान पर आपका आलेख निस्संदेह पथप्रदर्शक है। प्रत्येक कवि की शैली, शब्दकोश और अनुभव अलग अलग होते है, यही उनकी रचनाओं से झलकता भी है। हमें अपेक्षा है कि आप कटुतम आलोचना करे जिससे हम सीख सकें...समूह में बात कहने पर अपने किये कहे गये वाक्य तलाशने कठिन हैं।

अनुग्रह के साथ।

*** राजीव रंजन प्रसाद

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