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Tuesday, May 29, 2007

"तुम्हारी उपमा"


क्यों निहारते हो सुबह से मुझे दिन सारा
फिर कहते हो शाम हो गयी मगर दिल नहीं भरा

गम की शब में याद आता है वो सिरफिरा
जिसकी ज़िन्दगी थी एक सुरंग
मैं ही उसका ये सिरा
मैं ही उसका वो सिरा
तुम कहते हो चुप रहती हूँ मैं अकसर
बटोरती रहती हूँ तुम्हारी उपमा के टुकड़े
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर
मेरी ज़िद है उसे सम्पूर्ण देखने की
समूचा बना सकूँ, तुम्हारे सामने ला सकूँ
पानी को आँसू समझ लेते हो
तुम्हें धोखा होता है दरअसल
बारिश बहुत तेज हो जाती है
तुम्हारे घर के रास्तों पर
शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है

तुम्हें ये गुमान होता है
कि तुम्हें सोचती हूँ
मैं तो वादा याद करती हूँ तुम्हारा
कि तुम्हारे जाने के बाद रूह,
मेरी मोहब्बत के हवाले कर जाओगे
मगर रूह तुम्हारी जीती है मेरे निवाले खाकर
ले जाओ इसे तुम यहाँ आकर
तुम्हारी जान है इसी तोते में ये जान कर
आज भी डराते हैं मुझको दुनिया के पंजे
तुम्हारी संवेदनाओं की भूलभुलैया में
दम तोड़ गयी एक स्वप्न परी
तुम्हें मालूम नहीं फर्क मगर
जो तुमने खोया वो सिर्फ तुम्हारा हिस्सा था
जो उसने खोया वो सिर्फ उसका जीवन था

फूटा एक रोज ज्वालामुखी समन्दर में
लावा बहता-बहता ऐसा सख़्त हुआ
और देखते ही देखते टापू बन गया
कोई आता जाता नहीं वहाँ पर
बड़ा सन्नाटा है
मैं भी घबराती हूँ इसलिये नहीं जाती हूँ
युगों बीते, तुम्हारी उपमा का इन्तज़ार करती हूँ
कराहों में, दरख्तों में
आशाओं में, रास्तों में
नयनों में, आस्थाओं में
किताबों में, कविताओं में
कभी न कभी, कहीं न कहीं
मिलेगी ज़रूर, मुझे है यकीं
"तुम्हारी उपमा"
************अनुपमा चौहान***************

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18 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अनुपमा जी

आज यह कविता पढ कर एक ही बात हृदय से निकली है - आप अनुपमेय हैं।

प्रेम गीत/कवितायें हमेशा से लिखी जाती रही हैं किंतु अहसासों को जब गहरी उपमायें मिलें तो ये रचायें जीवित रहती हैं....आज आपने एसी ही रचना पढवायी है।

"गम की शब में याद आता है वो सिरफिरा
जिसकी ज़िन्दगी थी एक सुरंग
मैं ही उसका ये सिरा
मैं ही उसका वो सिरा"

"शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है"

"मगर रूह तुम्हारी जीती है मेरे निवाले खाकर
ले जाओ इसे तुम यहाँ आकर
तुम्हारी जान है इसी तोते में ये जान कर
आज भी डराते हैं मुझको दुनिया के पंजे"

"फूटा एक रोज ज्वालामुखी समन्दर में
लावा बहता-बहता ऐसा सख़्त हुआ
और देखते ही देखते टापू बन गया
कोई आता जाता नहीं वहाँ पर"

हार्दिक प्रसन्नता हुई आज आपकी यह रचना पढ कर।

*** राजीव रंजन प्रसाद

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

अनुपम कृति,

राजीवजी ने सही कहा है, आपने प्रेम का वर्णन बहुत ही सुन्दरता से किया है। बधाई स्वीकार करें।

सस्नेह,

गिरिराज जोशी "कविराज"

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

अनुपमा जी,
सुन्दर रचना है, ह्रदय के अनन्य छोर से निकली हुयी.

"फूटा एक रोज ज्वालामुखी समन्दर में
लावा बहता-बहता ऐसा सख़्त हुआ
और देखते ही देखते टापू बन गया
कोई आता जाता नहीं वहाँ पर"

कभी कोई आता नहीं और कभी कभी किसी को आने की इजाजत भी नही होती.

लीक से हट कर उपमायें इस रचना कि सुन्दरता को बढाती हैं.
एक और बात... यह चित्र किस का है ? अनुपमा ? या उपमा ?

रंजू का कहना है कि -

सुन्दर रचना अनुपमा जी,प्रेम का वर्णन बहुत ही
सुन्दर है।

मैं तो वादा याद करती हूँ तुम्हारा
कि तुम्हारे जाने के बाद रूह,
मेरी मोहब्बत के हवाले कर जाओगे
मगर रूह तुम्हारी जीती है मेरे निवाले खाकर


युगों बीते, तुम्हारी उपमा का इन्तज़ार करती हूँ

ajay का कहना है कि -

फूटा एक रोज ज्वालामुखी समन्दर में
लावा बहता-बहता ऐसा सख़्त हुआ
और देखते ही देखते टापू बन गया
कोई आता जाता नहीं वहाँ पर
बड़ा सन्नाटा है
मैं भी घबराती हूँ इसलिये नहीं जाती हूँ
युगों बीते, तुम्हारी उपमा का इन्तज़ार करती हूँ
कराहों में, दरख्तों में
आशाओं में, रास्तों में
नयनों में, आस्थाओं में
किताबों में, कविताओं में
कभी न कभी, कहीं न कहीं
मिलेगी ज़रूर, मुझे है यकीं
"तुम्हारी उपमा"


कविता पूरी तरह तो नहीं समझ पाया (१-२ बार फिर पढ़ूँगा, शायद समझ सकूँ।) पर जितनी समझा, वो भी भावों के सागर में आकंठ डुबा देने के लिये पर्याप्त थी। बेहद सुंदर। हार्दिक अभिनंदन।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

अजय जी की बात भी सही है। उपमाए इतनी गहरी हैं कि पूरी कविता हल्के में नहीं समझ में आती। लेकिन आती ज़रूर है। राजीव जी ने जो उपमाएँ कोट की है, वो सच में अद‌भुत हैं। अनुपमा जी आप प्रेम कविताओं की गरिमा को पुनर्स्थापित कर रही हैं।

इस कविता की दो लाइनों में से दूसरी लाइन में 'उस' क्या इस कविता का अतिरिक्त चरित्र है?

जो तुमने खोया वो सिर्फ तुम्हारा हिस्सा था
जो उसने खोया वो सिर्फ उसका जीवन था

राकेश खंडेलवाल का कहना है कि -

वैसे अगर में गलत नहीं हूँ तो यह दुष्यन्त से प्रेरित रचना है

""निहारता हूँ तुमको सुबह से ॠतंभरा
अब सांझ हो रही है मगर दिल नहीं भरा ""

anupama chauhan का कहना है कि -

@ Mohinder ji
yah chitra Upma ka hai.....sacchi anupama ka koi chitra nahi ho sakta...coz uski to upma hi nahi di jaa sakti ;)....

@Rakesh ji
Pata nahi.....maine dushyant kumar ko kabhi padha nahi....magar haan yeh do panktiyaan kisi aise hi sawaal ka jawaab hain.

@Ajay ji aur Shaileshji
aap ko jo na samajh aaya ho aap wo pankityaan mail kar ke pooch sakte hain.

@ Ranjuji aur Giriraj Ji
bahut bahut dhanyawaad

@ Rajeevji
Thanks for being my inspiration for writing...aapka aashirwaad hamesha bana rahe yahi iccha hai

परमजीत बाली का कहना है कि -

बहुत अच्छी रचना है।बधाई।

mahashakti का कहना है कि -

सुन्‍दर प्रेमाभिव्‍यक्ति

फोटो आपकी ही हे क्‍या :)

कुमार आशीष का कहना है कि -

राजीव जी ने बाजी मार ली, अब मैं कैसे कहूं दुबारा कि आप अनुपमेय हैं.. मगर कविता मुझे भी बहुत अच्‍छी लगी। विषय जब चारो तरफ से तराशा जाता है तब ऐसी कवितायें सामने आती हैं।

तुम कहते हो चुप रहती हूँ मैं अक्सर
बटोरती रहती हूँ तुम्हारी उपमा के टुकड़े
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर
मेरी ज़िद है उसे सम्पूर्ण देखने की
समूचा बना सकूँ, तुम्हारे सामने ला सकूँ
....
तुम्हारे घर के रास्तों पर
शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है
आपने अपनी कविता में जिस स्‍त्री का चरित्र जिया है, उसका आन्‍तरिक सौन्‍दर्य अद्वितीय है

Divine India का कहना है कि -

कहीं कोई सोचता है इसकदर बैठे राहों में कंकड़ों को भी उसी की मान मानता है…
मूंदते लोचन में वो तस्वीर ही है जिसे स्पर्श करके रोज नई उपमाएँ रचता है!!!


अच्छी कविता है…गहरी भी है और संवेदित हृदय की उत्सुकता भी…।
तस्वीर अच्छी है… :)

tanha kavi का कहना है कि -

अनुपमा जी वाकई आपकी लेखनी का कोई जवाब नहीं। राजीव जी तो मेरे पहले से हीं आदर्श थे , अब लगता है कि मुझे आपको गुरू मानकर खुद में दूसरा एकलव्य गढना होगा। प्रेम की कविता में आपने ऎसी-ऎसी उपमाओं का प्रयोंग किया है , जो कि हम जैसे कवियों के पास से गुजरने में भी गुरेज करती हैं।

गम की शब में याद आता है वो सिरफिरा
जिसकी ज़िन्दगी थी एक सुरंग
मैं ही उसका ये सिरा
मैं ही उसका वो सिरा।

शुरूआत हीं बड़ा मनमोहक है। उसके बाद तो कविता पूरे लय में हीं आ गई है।

एक अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकारें।

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है

जिसकी ज़िन्दगी थी एक सुरंग
मैं ही उसका ये सिरा
मैं ही उसका वो सिरा

तुम्हारी संवेदनाओं की भूलभुलैया में
दम तोड़ गयी एक स्वप्न परी

अनु , कविता अप्रितम रुप से सुंदर बन पडी है , मैं हमेशा ही सोचता हूं रुपक और उपमाओ का कोमल प्रयोग आप बहुत ही सुंदरता से करती है |
आप को बधाईयां |

Anonymous का कहना है कि -

Awesome sweetheart ... reminds me of the wonderful days we spent together ... its like taking back a leap in the time ... It's hard to believe that u still remember the crap i used to write in yesteryears ...

Waise ek baat to hai ... main kabhi Romance se upar nahi uth paya ... aur tumne pyaar nibhaya hai .. to tumhare aur mere likhne main fark lazmi hai ...

main tumhare lekhan ki tarref kar sakta hun ...lekin ise mehsoos karna usi ke bus ki baat hai jisne pyaar kiya ho ...

Luv,
Ashu ..

Gaurav Shukla का कहना है कि -

न जाने क्यों ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप लौट आयी हैं :-)


सरल भाषा,सहज अभिव्यक्ति, सुदृढ भाव कहीं भी कविता को भटकने नहीं देते, कविता कई जगह पर आश्चर्यजनक रूप से मोहक है
सुन्दर उपमाओं से सुसज्जित हो कर कविता का सौन्दर्य और बढ गया है
प्रारम्भ बहुत अच्छा है

"क्यों निहारते हो सुबह से मुझे दिन सारा
फिर कहते हो शाम हो गयी मगर दिल नहीं भरा"

"मैं ही उसका ये सिरा
मैं ही उसका वो सिरा"

"बटोरती रहती हूँ तुम्हारी उपमा के टुकड़े"

"पानी को आँसू समझ लेते हो
तुम्हें धोखा होता है दरअसल
बारिश बहुत तेज हो जाती है
तुम्हारे घर के रास्तों पर
शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है"

निःसंदेह अप्रतिम रचना

"रूह तुम्हारी जीती है मेरे निवाले खाकर"
"तुम्हारी संवेदनाओं की भूलभुलैया में
दम तोड़ गयी एक स्वप्न परी"

"लावा बहता-बहता ऐसा सख़्त हुआ
और देखते ही देखते टापू बन गया"

बहुत बहुत सुन्दर
हार्दिक धन्यवाद अनुपमा जी

सस्नेह
गौरव शुक्ल

sunita (shanoo) का कहना है कि -

अनुपमा जी,

अनुपम,बेहद सवेंदनशील रचना!
जैसा आपका नाम है आज वैसी ही आपकी रचना पढ़ने को मिली।
मेरे खयाल से सभी लोग सभी कुछ कह चुके है,...इतनी उपमाओं से अलंकृत हो चुकी है कि मेरे कहने को शब्द ही नही सूझ रहे है...
फ़िर भी मेरी शुभ-कामनाएँ आपके साथ है..आप हमेशा एसे ही सीड़ी दर सीडी़ चढ़ती जायें

सुनीता(शानू)

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

अनुपमा जी,
मैं आपकी पिछली रचनाओं पर टिप्पणी नहीं दे पाया. शायद मुझे जाने अनजाने में इसी कविता की प्रतीक्षा थी। मैं सौभाग्यशाली हूं कि इतनी खूबसूरत कविता पर आपको पहली टिप्पणी दे रहा हूं।पढ़ते समय ये सोचा कि अच्छी पंक्तियों के नाम पर क्या छांटूंगा? शायद पूरी कविता दोबारा लिखनी पड़े।
पहली दो पंक्तियां ही जैसे बहुत कुछ कह जाती हैं।
क्यों निहारते हो सुबह से मुझे दिन सारा
फिर कहते हो शाम हो गयी मगर दिल नहीं भरा

मगर रूह तुम्हारी जीती है मेरे निवाले खाकर
ले जाओ इसे तुम यहाँ आकर
तुम्हारी जान है इसी तोते में ये जान कर
आज भी डराते हैं मुझको दुनिया के पंजे
तुम्हारी संवेदनाओं की भूलभुलैया में
दम तोड़ गयी एक स्वप्न परी

पानी को आँसू समझ लेते हो
तुम्हें धोखा होता है दरअसल
बारिश बहुत तेज हो जाती है
तुम्हारे घर के रास्तों पर
शीशों को क्यों खरोचते हो
उसमें तो फ़क़त मेरा अक्स है

आपको उपमा देना वाकई मुश्किल है।
लिखती रहें। फिर से बहुत शुभकामना।

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