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Tuesday, April 10, 2007

कविता और युवा मन






मनीष वंदेमातरम्

‘लोक’ इधर हिंदी कविता में बड़ी सघनता से पैठ रहा है । एक तरह से वह समकालीन कविता का बैरोमीटर बन चुका है । वर्तमान समय के अधिकांश चर्चित युवा कवियों की पहचान इसी लोकराग से हो रही है और इसमें से अधिकांश वे हैं जो किसी महानगर से नहीं अपितु दूर जनपद से आ रहे हैं । दरअसल सच्चे साहित्य की आत्मा लोकधर्मिता में अपना कलेवर रचती है । सच्चा साहित्य न लोकजीवन से दूर भागता है और न ही लोकभाषा से । 'इस फागुन ज़रूर से ज़रूर आना' लोक की ओर लौटते मन की कविता है । लोक की ओर आमंत्रण की कविता है । मनीष वंदेमातरम् उस गाँव की बात करते हैं जहाँ लोक अपने ठेठ स्वरूप में है और शास्त्र भी । यह गाँव निहायत आदिम संस्कृति का गाँव नहीं है जैसे कि आदिवासी अंचल । यहाँ शास्त्र से उद्भूत काली माई की मनौती और दइत्रा बाबा जैसे स्थानीय लोक मान्य देव साथ साथ परंपरा पोषित हैं । कविता में या तो स्मृति होती है या कल्पना या यथार्थ । यथार्थ इन दोनों के साथ भी विन्यस्त होता है । मनीष के भीतर का मन यहाँ स्मृतियों की भावधारा में बह रहा है । यह प्रवाह मात्र नास्टेल्जिकता या विवेकहीनता बहाव नहीं । यदि ऐसा होता तो वह केवल ग्राम्यगंधी बिम्बों के सहारे अपनी कविता को रचता । वहाँ विवेक या बुद्धितत्व का या सीधे-सीधे कहें तो चेतना का परिष्कार कदाचित् नहीं होता । और ऐसा होता तो वह बारिश में नहाने का अस्तित्व बोध तबियत से नहीं आ पाता । यह जो बारिश में नहाने का बोध है, सुख है, वह मूलतः गाँव से शहर की ओर प्रस्थान मानसिकता का दिव्य अनुभव है । ठेठ गाँव में बारिश में नहाना सुख का अहसास नहीं अपितु वह जीवन का अनिवार्य हिस्सा की तरह है । लगभग लोक-साहित्य में भी बारिश स्मृति की भावभूमि रचती है । भारत की हर लोकभाषा में बारिश में राम का वनवास के दौरान भींगना याद आता है । परदेश गये पिया की याद आती है या पेट पालने गया परिवार का सदस्य याद आता है । चूँकि प्रकृति ही उसका जीवन है । उसका जीवन ही प्रकृति केंद्रित है, निर्देशित, संचालित है सो वह उसे अलग से एक सुख के रूप में नहीं लेता । गाँव में बारिश में नहाना पृथक आनंद का विषय से कहीं ज्यादा जर्जर घर के ढ़ह जाने की शंका की ओर भी ढ़केलता है । इसका मतलब यह नहीं कि बारिश में नहाने का वर्णन लोकगीत में नहीं हो सकता है । फिर भी यह जो बारिश में नहाने की स्मृति है मूलतः जीवन के आधुनिक होते जाने के समय से उपजा अहसास ज्यादा है । एक तरह से नागर जीवन की ओर बढते हुए उस मनुष्य का, जो लगातार अप्राकृतिकता का शिकार होता चला गया है । भारतीय फिल्मों में बारिश ऐंद्रिकता की ओर धकेलती है या यूं कहें कि बारिश के बहाने दर्शकों के प्रेम और प्रकारांतर से काम भाव को उद्दीप्त किया जाता है । बहरहाल मनीष की यह कविता उस गाँव की पक्षधरता में लिखी गई है जहाँ का मनुष्य निहायत सरल, सहज जीवन चाहता है । सरल इस रूप में भी कि
"मेरा घर जानता है
तुम आँख बन्द करके भी आओ
तुम्हें मेरे घर तक पहुँचा ही देगा "

सरल केवल कथ्य अर्थात् गाँव ही नहीं है यहाँ । समूची कविता भी निहायत सरल है । कहीं से भी भाव सिद्धि में कोई रोड़ा नहीं आता । मनीष की रचना के रूप में यह कविता निश्चित ही बेहतरीन कविता है, परन्तु अब तक लिखी गई हिंदी कविता यानी समग्र रूप से यह बार-बार अनेक कवियों द्वारा लिखी गई कविता का दोहराव है सो एक सामान्य कविता भी है । कथ्य के स्तर पर यह पुरानी कविता की ओर सरकती जान पड़ती है । इसके बाद भी कविता में प्रयुक्त शिल्प देखकर लगता है कि कवि भविष्य में लोक भाव पर ही केंद्रित रहे तो उत्कृष्ट कविता से पाठकों का मन लुभा सकता है । यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि कविता में शब्द-स्फीति से बचना चाहिए । खासकर अतिरिक्त कारक चिन्हों से । इस कविता को गाँव के बिंबों का कोलाज भी कह सकते हैं । इस रूप में कविता पूर्ण बिम्बात्मक है । इस छोटी-सी कविता के बहाने माँ, पिता, बहुरिया, दइत्रा बाबा, सोनवा के बाबू, कोयल, काली माई, आदि को जिस तरह पिरोया गया है वह मात्र कवि की सिद्धि भी कही जा सकती है। सिद्धि इस रूप में भी कि कविता का धर्म जोड़ना है तो निश्चय ही यह कविता केवल उस मैं के घर, परिवार, गाँव को ही नहीं जोड़ती अपितु चारों तरफ अंधाधुंध नागरीय जीवन और तथाकथित आधुनिकता से त्रस्त मनुष्य को अपने मूल संस्कारों से जोड़ती है, उस पुरातन संस्कृति से भी जोड़ती है ।
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युवा और आक्रोश दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं । आक्रोश को भारतीय जीवन पद्धति में मान्यता नहीं दी जाती है । इसे एक तरह से व्यक्तित्व के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है है । यद्यपि आक्रोश सामाजिक सरोकार जनित है तो वह वरेण्य है तथापि आक्रोश अति भावुकता की ही उपज होती है । 'नये रिश्ते की शुरूआत' जैसा शीर्षक पाठक के मन में पाठकीयता की जिज्ञासा तो बोता है । कदाचित् मन में प्रगतिशीलता के प्रति आग्रह या पुलक भी जागता है किन्तु कविता के अंत तक यह जिज्ञासा एक कल्पनाप्रसुत दुनिया में धँस जाता है जो लगभग असम्भव सा है । कहिए कैसे तो वह ऐसे कि आसमान को तार-तार करने की बात कविता में किस प्रतीक का इशारा है । पाताल कहकर कवि क्या कहना चाहता है । पाताल का मतलब आखिर यहाँ क्या है जिसके नीचे दबी हुई ये आत्माएं आखिर कौन है । कविता में यदि यह आसमान लक्षणात्मक है और उस ताकत के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसने स्वर्ग को रोक रखा है तो भी यह स्पष्ट नहीं होता कि आखिर वह है कौन । क्या नियति है । सूरज को बाँधने का काव्यार्थ या मतलब भी पाठक के मन में उस रूप में नहीं पहुँचता जो कविता को उद्देश्य है या कथ्य है । अद्यतन मुद्रित काव्य में सूरज किसी भी तरह उपेक्षणीय और घृणित तत्वों के लिए प्रयुक्त नहीं हुआ है । वह सदा से ही आलोक, परोपकार, उजियारा, सर्वसमभाव, विश्वदृष्टा के रूप में भारतीय काव्य में प्रयुक्त होता रहा है । एक प्रश्न मन में यहाँ यह भी उपजता है कि वह कौन सा रिश्ता है जो सूर्य के कारण मनुष्य और समय के बीच बाधित हो रहा है ।
कविता में सर्वांग एक गुस्सा का रंग बिखरा पड़ा है । कवि मारने, तोड़ने, फोडने, बाँधने की बात करता है । लगता है कविता कहीं न कहीं अंत तक जाकर मन में वीर भाव जागृत करेगी । जो लगभग आज की समकालीन जीवन में बर्फ की तरह पिघलते सामाजिक संबंधों को ठोस बनाना, देखना चाहता है । और सिर्फ इतना ही नहीं वह दरअसल उस नये रिश्ते की स्थापना के लिए उद्यमशील भी है जो कहीं पुरातनता के संकट से भावों का विषय बन चुका है ।
समय और मनुष्य के मध्य संबंध को लेकर प्रश्न नहीं उपजता उससे ज्यादा कन्फ्यूज़न पैदा हो जाता है कि धरती में स्वर्ग को आने से यह समय कैसे रोके रखा है । या यह भी कि धरती और आसमान किस रूप में परस्पर विपरीत ध्रुव हो गये हैं । यहाँ मेरा यह कहना नहीं है कि कविता निरर्थक या वायवी है उसका अपना अर्थ हो सकता है जो केवल कवि से उसकी व्याख्या या पाठ के समय टिप्पणियों से खुले । पर पाठक के लिए यह कशमकश क्योंकर पैदा करना? ऐसे जोखिम से कविता को बचाना कवि का धर्म भी है ।

मनीष की इस कविता का वाक्य-विन्यास कमजोर और हडबड़ी में लिखा गया लगता है । कुछ ऐसे शब्द भी है जिन्हें हटा देने पर भी कविता का मूल और केंद्रीय भाव कहीं भी विचलित नहीं होता । ये शब्द यूं तो शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते हैं पर निहायत शुष्क गद्य की तरह । यहाँ कहीं भी पद्यात्मकता का अहसास नहीं होता । चलिए आप ही ऐसा करके देखें हम आपको कुछ अनावश्यक शब्दों को छांटकर बता देते हैं ।

अनावश्यक शब्द –
पहली पंक्ति – कि
तीसरी पंक्ति – और
चौंथी पंक्ति – को
छठी पंक्ति – कि
नौंवी पंक्ति – जिससे
दसवीं पंक्ति – इस
बारहवीं पंक्ति – और
सत्रहवीं पंक्ति – और
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मनीष के यहाँ भाषा की विविधता है । कदाचित् उनकी कविताओं के आस्वाद में विविधता का मूल भी यही है । जो कवि कभी गाँव के बारे में सोचता है तो पूर्णतः लोकभाषा और लोकबिंबों से ओतप्रोत हो जाता है वही जब शहरी जीवन वाले बंद कमरों की घुटन से गुजरता है तो किसी उर्दू संस्कार वाले जीवन-शैली की रंगत में अपनी भावों को अभिव्यक्त करने लगता है । 'यह वीराना लगता है' नामक कविता इसकी गवाही में है । यहाँ केवल शब्द ही उर्दू के नहीं है । संपूर्ण अनुभूति भी उर्दू के तासीर में है । तभी उसे वह शहरी कमरा वीराना लगता है । उपमा का जाने-अनजाने में किया प्रयोग चमत्कृत कर देता है – है उजाला कहीं अंधेरा/ तक़दीर की तरह/ कहीं कोने में दुबकी । यह कविता में एक समूचा दृश्य भी पैदा करता है । कवि की अनुभूति ज्यों-ज्यों इसी तरह सघन होती जायेगी उसकी कविता में काव्य-कला का कौशल भी त्यों-त्यों विकसित होता चला जायेगा । कविता में भीतर-ही-भीतर एक छंदात्मकता भी है । यह बात अलग है कि वह खंडित अवस्था में है परन्तु अभी कवि लगातार कविता की अपनी समझ को पुष्टतर करने में संलग्न है सो भविष्य में यह निरंतर बढ़ेगी, विश्वास होता है ।
‘मेरे बगल वाली नदी’ पढ़ते वक्त इसी गोत्र की कई कविताएं मस्तिष्क में उभरने लगती है, जो हिंदी और उर्दू में इधर कभी ग़ज़लों में प्रकाशित हुई हैं या फिर विशुद्ध गद्यात्मक कविता में। तो क्या इसे हम कथ्य का दोहराव कहकर खारिज़ कर सकते हैं ? शायद नहीं । अनुभूति के स्तर पर आज की लगभग कविताएं और कवि समान परिस्थिति में जान पड़ते हैं । आज ही क्यों यह किसी भी कालखंड में सम्भव हो सकता है । यहाँ बूढ़ी नदी का चौंक कर जाग उठना, बुदबुदाना, ऐंठना, घिसटना, और चैन से नहीं सो पाने में जो मानवीकरण किया गया है वह भाषिक रम्यता के लिए पर्याप्त है ।

‘कब होगा ऐसा’ कवि के उन स्वप्नों का बयान है जो एक अच्छा कवि जीवन में एक न एक बार जरूर महसूसता है । सच कहें तो यही वे स्वप्न हैं जिससे युवा कविता की शुरूआत होती है । इस कविता में महानगरीय संस्कृति की कमजोरियाँ को रखा गया है जहाँ समय पर दोस्ती निभाने वाले चेहरे दिखाई नहीं देते । यह जो नामवर की तलाश है वह कोई दैवीय शक्ति नहीं अपितु उस इंसान की तलाश है जो प्यार, सहयोग, स्नेह, भातृत्व भाव से ओतप्रोत हो । यदि इतना नहीं तो मनुष्य के पास आखिर मनुष्य कहाने के लिए और क्या चाहिए ।

तुमको सकूँ मिले, मैं तो बस मौत चाहता हूँ
कुछ बात है जो हमपर ख़ुदा का क़हर नहीं आता।।

जैसे पंक्तियों में कविता कहने की शऊर का पता चलता है । यहाँ मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि कवि को ग़ज़ल या मुक्तक फार्म की सुधि लेनी चाहिए । और कुछ नहीं बस्स ।



गिरिराज जोशी

मेरे समक्ष कवि की दो कविताएं हैं – अनुपमा, तुम अनुपम हो और सपना। सपना कविता को पढ़ने के बाद जो विधा मेरे अंतस को घेरती है वह पद्य जैसा कम गद्य जैसा ज्यादा प्रतीत होता है । एक कथात्मक वृत्त बनने लगता है । यह भी कविता की एक शैली है । नई कविता में ऐसा प्रयोग काफ़ी हुआ है । इधर के एक खास कवि ज्ञानेन्द्र पति के यहाँ भी यह शिल्प दिखाई देता है, जो काशी के जीवन-संसार और उसके अनेक प्रसंगों को अपनी कविता में विन्यस्त कर रहे हैं । बहरहाल अनुपमा, तुम अनुपम हो रचना सिर्फ शुष्क कथन है । यहाँ कवि का अनुभव पचा नहीं है । कवि को चाहिए कि वह भावों को लगातार अंतरमन में पकने दे । कविता जल्दीबाजी में अपने उत्कर्ष में कभी नहीं पहुँचती । वह कवि में अभिव्यक्त होने के संपूर्ण धैर्य की मांग भी करती है । शायद यही कारण है कि हिंदी की अधिकांश प्रेम कविताएं चौंकाती नहीं है, पाठक को बाँधे रख नहीं पाती, निहायत निष्कलुश मन की बात जैसी लगती हैं । वहाँ कविता जैसी कोई बात नहीं दिखाई देती, खास कर वे जो शुरूआती दौर में युवा कवियों द्वारा रची गई हैं । इस सब के बावजूद मैं व्यक्तिगत तौर पर जोशी जैसे कवियों से आग्रह करना चाहूँगा कि जहाँ मन में कथा का कोई प्लाट जनमने लगता है तो उसे लघुकथा या कथा स्वरूप में गढ़ने का जोखिम भी लें । कभी-कभी हम अपनी विधा की जिद्दी में एक अच्छे भाव या अनुभूति के साथ न्याय भी नहीं कर पाते ।



मोहिन्दर कुमार

जिन्हें हिंदी साहित्य की विधागत विकास और उसकी दशा-दिशा का ज्ञान है वे भली-भाँति जानते हैं कि किस तरह नई कविता की बौद्धिक शुष्कता से पाठकों और साहित्य को उबारने के लिए गीत और फिर नवगीत परम्परा की शुरूआत हुई । विधात्मक संघर्ष इतना बढ़ गया कि नई कविता के झंडाबरदार गीत को परंपरा की वस्तु मानकर उसे हतोत्साहित करने लगे । कविता में आधुनिकता का तर्क देकर नये शिल्प और नये विषयों के साथ नई कविता को बढ़ावा देने लगे । उधर काव्य के मूल निहितार्थों की पक्षधरता के साथ गीत और नवगीत की प्रवृत्तियाँ विकसित और प्रखरता के साथ उसकी स्थापना होने लगी । यह एक तरह से काव्य में छंद की वापसी का दौर भी था, और पाठकों के लिए काव्यात्मक आस्वाद का एक रसात्मक अवसर भी ।
मोहिन्दर के काव्य में गीत तत्व के प्रारंभिक रूझान हैं । उन्हें चाहिए कि वे गीत के लक्षणों, वर्तमान स्वरूपों, छंद विधान, विषय वस्तु का अनुशीलन एक बार कर लें । हिंदी में यूं तो लगातार गीत लिखा जाता रहा है । आज भी वे ही कवि ज्यादा याद किये जाते हैं, पढ़े जाते हैं जिनके पास गीतात्मकता है, छंद का एक विशाल वितान है । चाहे हम तुलसी को लें या इधर के महत्वपूर्ण गीतकार नीरज आदि को लें । दरअसल छंद वह आकर्षण है जो पाठकों को बरबस अपने प्रभामंडल में ले लेता है । शायद यही कारण है कि हिंदी कविता के लिए पाठकों के लाख अभावों के बाद गीतकार और ग़ज़लगो को सुनने लाखों की संख्या में श्रोता कवि सम्मेलनों की ओर उमड़ पड़ते हैं । यहाँ यह बात बिलकुल अलग है कि वहाँ कविता का अकादमिक चरित्र विकृत रूप में होता है ।
मोहिन्दर में छंद का आग्रह है । वे फिलहाल केवल तुक भिड़ाकर अपनी अभिव्यक्ति को पाठकों के सम्मुख लाने लगे हैं पर केवल तुकबंदी ही कविता या गीत नहीं है । गीत में सुक्ष्मता, भावों की तीव्रता, बिम्बों, प्रतीकों और इस रूप में भाषायी जादू भी आवश्यक है । आवश्यक तो छंद, संगीतात्मकता, संप्रेषणीय सरसता भी हैं । इन्हें साधे बिना न गीत लिखा जा सकता है न ही एक अच्छा गीतकार बना जा सकता है । जो भी हो मोहिन्दर का अनुभव संसार विस्तारित हो रहा है । यह उनके विषय-वस्तु के चयन से प्रमाणित है । देश निकाला जैसी रचना में नारी विमर्श पाठकों का ध्यान खींचने में सक्षम है ।



राजीव रंजन प्रसाद

कहते हैं - दुल्हन वही जो पिया मन भाये । यह लोक-मान्य है, सच है । इस सच्चाई के पीछे पिया के उस आकांक्षा को नहीं भूलना चाहिए कि जिसमें वह परिजन, पड़ोस, मित्रगणों के वांछित आदर्य की अपेक्षा अपने प्रियतमा से रखता है । राजीव रंजन समकालीन कविता के उभरते हुए युवा कवि के रूप में दिखाई देते हैं । यह कम से कम अंतरजाल पर लिखी गई कविताओं को देखकर कहा जा सकता है । मैंने सृजनगाथा पर उनके मूल्याँकन करते हुए पहले भी लिखा है । कुछ ही महीने के भीतर गीत की ओर मुड़ना कदाचित् एक संभावना शील कवि के लिए जोखिम भरा माना जा सकता है । क्या यह कवि के लिए अपनी अनुभूति को कविता के शिल्प में नहीं पिरो पाने जैसा है ? या यह गीत विधा में स्वयं को आजमाने जैसा है ? जो भी हो, विधात्मक समर्पण भी आवश्यक है एक युवा कवि को अपनी स्पष्ट पहचान बनाने के लिए । दो-दो विधाओं में अपनी प्रतिभा को साधने के लिए वैसे तो कोई मनाही नहीं है फिर भी समानांतर हस्तक्षेप के लिए विधा के चरित्रगत वैशिष्ट्य को जानना-समझना भी अपरिहार्य है । यह अपरिहार्यता उन लोगों के लिए और भी वांछित हो जाता है जो अपनी पहचान किसी एक विधा में धमाकेदार कर चुके हैं और किसी दूसरे विधा की ओर उन्मुख हो रहे हैं । होता क्या है कि रचनाकार की अच्छी-खासी पहचान किसी दूसरे विधा में चले जाने के कारण और उसमें किसी संभावित कमजोरी के कारण कई बार धूमिल या कमजोर भी पड़ जाती है । इस जोखिम से बचना खासकर नवलेखन के दौर से गुजरने वाले रचनाकार के लिए जरूरी होता है । यह एक अच्छे पाठक की ओर से आनेवाला आग्रह जैसा भी है ।
यहाँ राजीव जी अपनी एक कविता और दो गीतनुमा रचना लेकर जब आते हैं तो ऐसा कुछ ही भाव मेरे मन में उपजता है । बहरहाल 'वो बात' नामक कविता में बात का 'नदी बन जाना' जैसा प्रयोग कवि-दृष्टि में विकास को रेखांकित करता है । कविता में छंद या संगीत जिसकी बात पूर्वात्य और पाश्चात्य काव्यशास्त्रियों ने बार-बार कही है, वह भी इस कविता में है । वह इसलिए नहीं है कि यहाँ तुक का निर्वाह है । बिना निर्वाह किये भी कविता में एक लयात्मकता है । ऐसे में
"जब उसकी पारी हो गयी
सरिता आरी हो गयी.."


या फिर –
"वो याद जो एक सदी बन गयी
वो बात जो एक नदी बन गयी..."
में तुक का मोह मेरी समझ में नहीं आती है ।
’मेरे दिल देख कर सूरज को, पछताया नहीं करते’ जैसे गीत में कवि-अनुभव बेहतर है पर प्रस्तुति में लगता है जरा असावधानी है । भाषा के स्तर पर । छंद विधान यानी कि शिल्प के स्तर पर भी । वाक्य-विन्यास ऐसा है कि वह बाधा जैसी लगता है । पूछिए कहाँ ? तो यहाँ –
"मेरे दिल देख कर सूरज को, पछताया नहीं करते
वो गोले आग के होंगे, कि लग जाया नहीं करते.. "


‘आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था’ कविता में कवि की लोक-स्मृति उस तरह घनीभूत नहीं हो सकी है जिस तरह मनीष वंदेमातरम की ‘इस फागुन ज़रूर से ज़रूर आना’ में हुई है । यहाँ बस्तर की छवियाँ मन को बरबस आकृष्ट कर लेती हैं । पर बस्तर का दर्द, पीड़ा और संघर्ष भी उस रूप में नहीं आ सका है जिस रूप में उसे आज जरूरी है । पर यह भी कवि की अपनी एक दृष्टि है जिसे एकाध बार पढने के आकर्षण से मुक्त नहीं माना जा सकता है । यहाँ आज के बस्तर की आवाज़ भी है पर वह कविता में जितना और जिस उत्कृष्टता के साथ लाया जा सकता है उसका प्रयास कवि के लिए अभी शेष है ।



पंकज तिवारी

मनुष्य का मूल चरित्र एक है । समय के साथ बहते हुए उसके मूल अनुभव, अनुभूति, बोध, विचार आदि में भी मानवीय समानता होती है । इसलिए वे सहजात प्रवृतियों की तरह हर कालखंड में एक समान होती हैं । जैसे प्रेम, जैसे घृणा, जैसे दया, जैसे कल्याणकारिता आदि । ऐसे में प्रश्न उठता है कि मनुष्य आखिर कैसे बदल जाता है ? मनुष्य के मूल गुणों में कम ही बदलाव होता है । या वह बदलाव इतना धीमा होता है कि लगभग हर काल की कविता या साहित्य या कला में उसके लिए स्पेस सुरक्षित रहता ही है । यथा प्रेम में श्रृंगार, वियोग । यथा भक्ति में समर्पण और देव उलाहना ।
मैं सीधे पंकज तिवारी की कविता(गीत) – गोरी – पर आता हूँ । इस कविता में जैसे-जैसे आप अग्रसर होते जायेगें वैसे-वैसे आपको रीतिकालीन नायिका का देह दिपदिपाने लगेगा । कदाचित् आपको घनानंद याद आयें या बोधा भी । अक्सर यह प्रश्न मुझे मथता रहता है कि भाषा में काल या समय कैसे समाया रहता है । हम किसी रचना की भाषा से कैसे उसके काल तक पहुँच जाया करते हैं । क्या यह कम बड़ा चमत्कार है भाषा का । दरअसल भाषा भी काल है । काल की एक पृथक भाषा होती है । वह काल उसी शब्दावली, उन शब्दों में विन्यस्त संस्कृति, संदर्भों, प्रतीकों, बिम्बों, इशारों आदि में हमारे सम्मुख जीवंत हो उठता है । कहने का आशय यही कि यह भाषा ही है जो वह काल की छवि मनीषा में दोहराने में सक्षम है । भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, वह काल की भी अभिव्यत्ति है, संस्कार और संस्कृति तो है ही । क्या यह गोरी पुराने जमाने की गोरी है ? नहीं, कवि के लिए भी यह आधुनिका नायिका है, नये प्रेमियों(पाठकों) के लिए तो है ही । ऐसे में कवि भाषा व वर्णन की रीतिकालीन शैली की ओर क्यों चला जाता है ? यह प्रश्न भी समकालीन कविता के रसिकों की ओर से उठ सकता है । तब हम ऐसे में कवि की ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क दे सकते हैं । गीतकार को प्रचलित भाषा मानकों की ओर लौटकर उसमें नवीनता की गुंजाइश निकालना होगा । जाहिर है आज जो हिंदी भारतीय साहित्य में प्रवहमान है वह अवधी, ब्रज, बघेली, बुंदेली, बांगरू और छत्तीसगढ़ी आदि लोकभाषाओं से ही समृद्ध हुई है इसके बावजूद मुख्यधारा की कविता में यह मान्य नहीं है । कवि को इस पर विचार करना चाहिए । खासकर तब जब कवि में - ‘तुझे चलना है तू चलता चल’ – जैसे प्रेरणात्मक और जनवादी तेवर के गीत लिखने का हौसला है और जहाँ उसकी छवि एक संभावनापूर्ण गीतकार जैसे झलक मारती भी है । ‘ऐ तथाकथित सर्वशक्तिमान’ जैसी कविता को फिर से लिखे जाने और फिर से उसे कविता के उदात्तता के साथ पढ़ने की बात यदि एक गंभीर पाठक करे तो इसमें कोई बुराई नहीं दिखाई देती ।



अनुपमा चौहान

पुरूष और प्रकृति या फिर परमात्मा और आत्मा के मध्य परस्पर खिंचाव, विरह तथा विरह जनित वेदना की बात करते ही महादेवी वर्मा बरबस उपस्थित हो जाती हैं । वहाँ अनेक उपमा और उपमानों के सहारे हिंदी कविता या यह स्वर मुखरित हो उठता है । महादेवी और उसी तरह की जितनी भी छायावादी कविताओं में पुरूष और प्रकृति का चित्र उभरा है वहाँ कविता बहुलार्थी होते हुए भी दैहिक नहीं होती । दरअसल वह श्रद्धा और समर्पण की कविता है । प्रकारांतर से सर्वोच्च प्रेम की कविता है । इस मायने में भी वह आध्यात्मिक बन पड़ी है । इतनी बात यदि याद आ जाये तो ‘नाता’ जैसी कविताएं पाठक को बासी भी लग सकती हैं । वैसे यह कहीं जरूरी नहीं कि किसी अति लोकप्रिय शैली और पूर्व स्थापित कथ्य को लेकर कविताएं लिखने के अधिकार से अनुपमा चौहान को वंचित कर दिया जाय ।
"मैं कच्ची प्रेम की गगरी हूँ
बावरी सत्य वचन ही कहती
मन मेरा भी तुम सा निश्चल है"

यह स्वीकारोक्ति मात्र कवि के रूप में अनुपमा की ही नहीं है । वह इसलिए कि यह जो अनुभूति है शायद अपरिपक्व नवयौवना की हो जो अभी प्रेम के वास्तविक संदर्भों और आशयों को आत्मसात नहीं कर सकी हो । और यदि ऐसा ही है तो यह उस मन की सच्ची कविता भी है । अनुपमा के लिए सिर्फ छोटा सा संदेश, वह यह कि कविता में भाव के साथ विचार का अनुशासन भी आवश्यक है । वह तब जब वह कृतसंकल्पित हों कि कविता सिर्फ अनुरंजन ही नहीं उसके कुछ सरोकार भी हो सकते हैं । ‘कुछ क्षणिकाएं’ और ‘तुम कब आते हो’ भी प्रेम भाव की रचना है । मन में उमड़ने-घुमड़ने वाली बात । दोनों रचना आकृष्ट नहीं कर पाती । मैं अनुपमा को लेकर निराश हो उठता हूँ पर तभी मेरी नज़र उनकी कविता – ‘पानी की आत्मकथा’ पर जा टिकती हैं । मन मुदित हो उठता है । आँखें प्रसन्न हो उठती हैं । अंतरजाल पर जिस परफेक्ट कविता की तलाश में मैं अकसर रहा करता हूं, लगता है वह कहीं इधर से ही तो नहीं आने वाली है । यह कथ्य और शिल्पगत दोनों ढंग से मौलिक कविता की श्रेणी में रखी जाने योग्य कविता है । यहाँ पानी का सांस्कृतिक चरित्र खुल-उठा है । यह केवल पानी का आत्मगीत नहीं अपितु उस पवित्र सरोकार की ओर भी पाठक को ले जाने का उद्यम है जहाँ पानी को जीवन कहा गया है । जहाँ पानी को सभ्यता के विकास की गवाह माना गया है । पानी का संकट आज का गंभीरतम संकट है । यह पर्यावरण की चिंता से भी मन-मानस को जोड़ देता है । कहने का आशय यह समकालीन कविता के समस्त तेवरों के साथ प्रस्तुत है । यह औद्योगिकीकरण से उत्पन्न खतरों से भी आगाह कराती कविता है,जो उत्तरआधुनिक दौर और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से और भी बढ़ने वाला है । कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य है-
"बहता-बहता रंगत में हुआ काला
अब पहचान मेरी गन्दा नाला"

शीर्षक, शिल्प (कुछ घुसपैठिये शब्दों को निकाल दें तो), शैली, बिंब, छंदात्मकता, प्रतीत, स्ट्रेस, कथ्य, आदि सभी तत्वों से यह एक पूर्ण कविता कहलाने के काबिल है । इस कविता की एक खासियत यह भी है कि वह प्रत्यक्षतः कहे बिना भारतीयता की प्रतिष्ठा की कविता भी बन पड़ी है । लगे रहिए....



विश्व दीपक ‘तन्हा’

तन्हा की दो कविताओं में पहले उस ग़ज़लनुमा रचना को लेते हैं जिसमें पारंपरिक ग़ज़लों की तरह उर्दू के शब्दों को खासतौर पर लाया गया है । यदि यह स्वाभाविक तौर पर आते तो कहन की स्वाभाविकता कहीं अधिक बढ़ जाती । लगता है इन शब्दों को जान-बूझकर ठूँसा गया है । जैसे ‘मनुहार करे मिट्टी मौसम से कब तलक यूँ’, में कब तलक । ‘नेत्रों से नीर टालने का वक़्त आ गया है’ भी ऊपर की पंक्ति अर्थात् शेर के पहले भाग की भाषा से अनमैच्ड है । दोहा, ग़ज़ल में भाषा के अनुशासन के साथ-साथ क्षिप्रता, प्रतीकात्मकता भी आवश्यक है । छंद विधान यानी कि मीटर तो जरूरी है ही । ग़ज़लगो जिन भावों को यहाँ शे’रों में पिरोना चाहा है वे महत्वपूर्ण हैं पर ग़ज़ल एक छांदस विधा है, जो वज़न माँगता है । यह वज़न तलाशना अभी तन्हा के लिए बाकी है । विश्वास है भविष्य में वे वज़नदार साबित होंगे ।



आलोक शंकर

‘दोष बस मेरा नहीं है’ से गुजरते वक़्त लगता है कि आलोक हारे हुए व्यक्ति के मनोभावों से पाठकों का ध्यान खिंचना चाहते हैं । यह आत्म-चेतस् कवि की बौद्धिकता के दबाब से उपजी कविता है । एक तरह से समाज के हारे-थके हुए व्यक्ति के प्रति करूणा उपजाने वाली अदा के साथ । कविता में उन समस्त ईमानदार प्रयासो, उद्यमों को भी प्रतीकात्मक ढंग से गिना दिया गया है जो एक कर्मठ इंसान कहलाने के लिए आवश्यक है । यहाँ नियति के उस अवधारणा का भी संकेत है जहाँ सफलता हरबार कतई जरूरी नहीं हुआ करती । कविता में भाव कम विचार ज्यादा है सो इस कविता को हम विचार कविता की श्रेणी में भी गिना सकते हैं । यहाँ ईश्वर के प्रति भी एक तल्ख है । उसके होने को लेकर नहीं बल्कि उसके होने के विश्वास को लेकर जिसके सहारे हम न्याय और अपने कर्मों का परिणाम की गारंटी की अपेक्षा करते हैं । कविता आज के युवा-समय की रचना बन पड़ी है । रचनाकार को बधाई कि यहाँ वह तनाव भी है जो एक सार्थक कविता में होना चाहिए । रचनाकार से प्रश्न भी कि आखिर इसका हल क्या हो सकता है । अगली किसी कविता में इसे आगे बढ़ायें ।
‘मैं, चांद!’ में कवि ने चांद का आत्मालाप के बहाने जो कहना चाहा है वह सामान्य पाठक के लिए एक नया विषय हो सकता है । इसलिए मौलिक कथ्य का भ्रम भी हो । चांद भारतीय कविता का मुख्य उपमान है । हजारों-हजार कवियों ने चांद को लेकर कुछ न कुछ लिखा है । 20 सदी के हिंदी के महान कवियों में एक मुक्तिबोध ने चांद का मुँह टेढ़ा है लिखा था । यह कविता विश्वप्रसिद्ध है । कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हो चुका है । विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी है । इस सबके बावजूद उसे समझने के लिए एक खास मानसिकता, खास बौद्धिकता भी पाठकों को जुटानी पड़ती है । यानी कि वह सर्वसामान्य की कविता नहीं है । मैं यहाँ कहना यह चाह रहा हूँ कि भाषा कविता का कलेवर ऐसा न हो कि हम कवि के द्वारा चाहे गये अर्थ तक पहुँच ही न पायें । वैसे मैं उस सरल कविता की बात कर रहा हूँ जिसे लिखना जरा कठिन है ।



गौरव सोलंकी

कवि को कुछ भी लिखने का अधिकार है । वह लिखता भी रहता है । गौरव ने लिखा है कि वह क्या-क्या चाहता है । यह हो सकता है कि आत्मालाप न हो । समाज का सार्वभौमिक अनुभव भी हो । पर जरा देखिए कवि का स्वर-
"ना ही सीखना चाहता
मुझे गुमनाम होना है
मुझे भगवान होना है
जरूरी दिल का होना है"


यह अलग बात है कि उसकी इच्छा या आंकाक्षा या स्वप्न से कितने पाठक सहमत हो सकते हैं । इस आजादी को युवा मन की अपरिपक्व आजादी कहना ज्यादा उचित होगा । ‘भगवान तुम्हारे लिए’ नामक कविता में भी निरंकुश प्रगतिशीलता का स्वर है । हिंदी की प्रगतिशील कविता में ईश्वर, अलौकिक शक्तियों के प्रति आस्था का नकार और मनुष्य का सर्वोपरि रूप में स्वीकार है । जो भी हो वह मनुष्य के यथार्थ और विकास की गाथा भी है जहाँ श्रम और श्रम के लिए संघर्ष का सौंदर्य भी बिखरा पड़ा है । इस सौंदर्य़ को यदि कवि अपने यहाँ देखना चाहते हैं तो कुछ साधना जरूरी है और वह साधना है मात्र कुछ अच्छी किताबों को पढने की । यहाँ रचना को ग़ज़ल के फ़ार्म में रखने का प्रयास हुआ है । निर्वाह कर पाने में रचनाकार सहज नहीं हो सका है । अच्छा होता ग़ज़ल के मीटरों को परख लिया जाता । फिर भी भाव अच्छे हैं भले ही मुझ जैसे कुछ पाठकों को वे न रूचें । ‘मैं अकेला ही रहा’ में भी लगभग यही कमियाँ हैं ।
‘चलो कुछ बात करें’ निहायत सरल गद्य होते हुए भी पद्यात्मकता की छवि के साथ लिखा गया है । आज जब चारों तरफ व्यक्तिवादिता का बोलबाला है । संवादहीनता के दौर से समाज गुजर रहा है । कहीं कोई बतकही नहीं है । जैसे कुछ कहना शेष नहीं रह गया हो । इस दौर से खीझ और उससे मुक्ति की छटपटाहट कवि में लबालब है और यह वेदना वसुधैवकुटुम्बकम् की खत्म होती परम्परा से उपजी वेदना है । कवि ने यहाँ जिस तरह जीवन की घटनाओं और प्रसंगों को उठाया है वह उसकी निरंतर विमर्श आकांक्षा का भी द्योतक है । मुझे बस इतना ही कहना है कि कुछ ऐसी घटनायें और प्रंसग भी इस कविता में स्थान बना ली हैं जिन्हें एक सांस्कृतिक पाठक कम से कम कविता में नहीं देखना चाहता । अच्छा होता कवि ऐसी घटनाओं को भूला देता । बहरहाल कविता बात करती है पाठक से । एक कवि की यह सफलता भी है कि उसकी कविता बात करने लगे ।



प्रमेन्द्र प्रताप सिंह

कृष्ण और राम भारतीय संस्कृति के उन्नायक हैं । वे भारतीयता के सर्वोच्च मिथक पुरूष भी हैं । भारतीय साहित्य उनके बिना लगभग सूना या अधूरा है । ये दो ऐसे पात्र और प्रेरणा पुरूष हैं जिन्हें लेकर न केवल हिंदी बल्कि हिंदीतर भाषा में विपुल साहित्य रचा जा चुका है । भविष्य में भी जब तक मन में भारतीयता बची रहेगी, राम और कृष्ण हमारी कविता में चुपके आते-जाते रहेंगे । प्रेमेन्द्र प्रताप का कृष्ण वही कृष्ण है जो गीता में विन्यस्त है । जो भारतीय कर्मवाद का नायक है । गीता उनकी वाणी है । यहाँ उसी कविता में वही बात दोहरायी गई है । एक तरह से यह गीतासार का अत्यंत संक्षिप्त भावानुवाद जैसा भी है जो पद्य की कुछ पंक्तियों में है । फिर भी ऐसे समय जब कर्म के प्रति आस्था घट रही हो, अकर्म की मान्यता खासकर महानगरीय जीवन में बढ़ रही हो। पक्षपात और आत्मद्वंद्व का शिकार सारा समाज हो रहा हो ऐसी कविताएं मन को संतोष प्रदान करती हैं ।



तुषार जोशी

तुषार की कविता है – तसल्ली

उडान भरने पर
गिर गया
मगर इतनी तसल्ली थी
बैठे बैठे गिरा नहीं
उडान मैने भरी थी

यह क्षणिका नहीं एक संपूर्ण कविता है । यह उद्यमिता की स्थापना करने में सक्षम है । कुछ नहीं कर पाने की मानसिकता में हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रह जाने से गिरना ही मनुष्य के विकास का मार्ग है । मैं शीर्षक चयन के लिए कवि की तारीफ करना चाहता हूँ । यह तसल्ली आत्मविश्वास का अजस्त्र स्त्रोत भी है। मानव सभ्यता का विकास इसी तसल्ली के कारण हुआ है । यहाँ ‘गिर गया’ आत्महताशा का भाव नहीं बल्कि नये जोश का भाव भी मन में भरता है । शब्दों की मितव्ययिता के बाद भी कविता में सोचने के लिए पाठक मजबूर हो जाता है । ऐसी कविताएं अक्सर पाठकों के द्वारा कोटेशन के रूप में याद रह जाते हैं ।



शैलेश भारतवासी

चित-परिचित या आत्मीय जनों की कविता पर कुछ भी लिखना जोखिम भरा होता है । यह जोखिम उसके व्यक्तित्व के पहलुओं के पूर्वाभास के कारण ज्यादा होता है । शैलेश मेरे परिचित और युवा कवि हैं । हिंदी को लेकर इनके मन में एक अजीब सा समर्पण और कुछ कर गुजरने का भाव है । शायद इसी का परिणाम है यह हिन्द-युग्म । हाल के वर्षों में अपने जिद्दीपन से हिंदी और हिंदी साहित्य की वैश्विक व्यापकता के लिए अंतरजाल पर जो लोग दिन-रात सक्रिय हैं उनमें एक नाम शैलेश का भी लिया जा सकता है । शैलेश हिंदी मुद्रण संसार के उस युवा कवि की तरह सामने आते हैं जो कभी स्थापित पत्र-पत्रिकाओं की राजनीति और अनुदारता के कारण संघर्ष की मुद्रा में आ गये थे । वे अंतरजाल में कम से कम इस रूप में दिखाई देते हैं । हिन्द-युग्म ठीक उन लघुपत्रिकाओं की भाँति नज़र आने लगा है जो व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में उठ खड़ी हुई थीं । इन्हीं लघुपत्रिकाओं के सहारे ही हिंदी कविता और साहित्य का सही रूप सम्मुख आ सका था और कदाचित् हिंदी का मूल लेखन इन्हीं पत्रिकाओं के सहारे ही विकसित हुआ है । होता रहेगा । अंतरजाल में यह हिन्द-युग्म इसी छवि से देखा जाय तो कतई कोई अतिशयोक्ति नहीं । वैसे अभी शैलेश के साथ कई युवा कवि इधर अंतरजाल पर कविता को स्थापित करने में लगे हैं पर भविष्य में इनकी संख्या बढेगी ऐसा कहा जा सकता है ।

-जयप्रकाश मानस

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

आलोक शंकर का कहना है कि -

यह मीमांसा बहुत आवश्यक है हिन्द युग्म के लिये … हिन्द युग्म पर मैने ऐसी टिप्पणियाँ बहुत कम देखीं हैं जो कवि की गलतियों और सुधार की संभावनाओं को दिखाये । इनके अभाव में मेरे जैसे नये कवियों को सुधार कि दिशा नहीं मिल पाती थी, अब थोड़ा हौसला बँधा है ।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

आदरणीय मानस जी..
अभिभूत हुआ आपकी समीक्षा से। मैंनें अपने लिये आपके मार्गदर्शन को आत्मसात किया है, प्रयत्न पूरा करूंगा कि जिस लेखन की अपेक्षा में आपनें मुझे दिशानिर्दिष्ट किया है वह मेरी रचनाओं में आ सके।

पिछले कुछ दिनों से गीत विधा पर मेरा ध्यान गया है और नयी शुरूआत पर लेखन का कच्चापन गीतों में रह गया है। लेकिन जहाँ इस बात की ललक हो कि आप जैसा मनीषी मेरे शब्दों के पीछे के अर्थ देख रहा है, वहाँ मुझे घुटनों के बल चलने का भी गर्व है चूंकि मन आशावादिता से भर उठा है कि आपने वह उंगली थमा दी है जिसे पकड कर खडा हुआ जा सकता है।

आपकी समालोचनाओं को पढते ही मैं अपनी कविताओं को फिर पढ्ने बैठा और इस बार जाने कौन सा वातायन खुला कह नहीं सकता। सच कह रहे हैं आप कि शिल्प और प्रस्तुति की असावधानी मेरी कविताओं में है। लेकिन निश्चित ही आपकी अपेक्षायें पूरा करूंगा, और गंभीर हो कर लिखूंगा, इस उत्साह को प्रदान करने के लिये मैं आपको नमन करता हूँ..

*** राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

आदरणीय मानस जी,
आप अपने अमुल्य समय में से जो समय हिन्द-युग्म के लिये निकाल कर मार्गदर्शन कर रहे है‍ उसके लिये हम सब आपके आभारी हैं.

जहां तक मेरी रचनाओं की बात है.. मै‍ साइंस का विद्यार्थी रहा हूं, हिन्दी मेरा मुख्य विषय कभी नही रहा.. न ही हिन्दी मेरी मात्र भाषा है, मेरी मात्र भाषा डोगरी है .

दूसरा मेरा प्रयोजन अपने आप को महान कवि के रूप मे‍ स्थापित करने का कदापि नही है.. मै‍ तो बस यू‍ही मनोभावो‍ को अपने सरल शब्दों में ढाल कर आम जनता तक पहुंचाना चाह्ता हूं जो मेरे जैसे है और जिन्हें मेरी तरह विधा, शिल्प, अलंकार व अन्य सुक्षमताओं की जानकारी नही‍ है.

फिर भी आपके दिशानिर्देश का सम्मान करते हुये मेरा पूरा प्रयत्न रहेगा की आगे कुछ बेहतर कर सकूं... वैसे ५१ वर्ष में पुन: पढाई शुरु करना काफ़ी कष्टप्रद होगा... वो भी समयाभाव के साथ...

आप से अनुरोध है कि आप मेरी बाकी की तुकबन्दी पर भी अपने एक नजर अवश्य डाले‍ जो
http://dilkadarpan.blogspot.com पर है

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मानस जी,

वैसे मैं पहले भी एक समीक्षक की अहमियत समझता था, मगर आपकी यह यूनीमीमांसा पढ़कर अपरिहार्य समझने लगा हूँ। आमतौर हम लोग कविता की कमज़ोरी नहीं देख पाते थे, या यह कहें कि कुछ वो भी, जो सुंदरता की श्रेणी में आते हों। मगर जब आप मिले तो लगा कि हिन्द-युग्म अब खूब विकास करेगा, क्योंकि हमारे कवि आपके दिशा-निर्देशन में राष्ट्रीय स्तर के कवि हो जायेंगे।

Gaurav Shukla का कहना है कि -

अभिनंदन मानस जी,

ऐसी सारगर्भित समीक्षा, अमूल्य दिशानिर्देशन के लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद|
यह बहुत आवश्यक था, आपका मार्गदर्शन निश्चित ही हमारे सभी कविमित्रों के लिये सहायक सिद्ध होगा
हार्दिक आभारा एवं युग्म को बधाई

सस्नेह
गौरव शुक्ल

mahashakti का कहना है कि -

मानस जी,
सच मे आप के द्वारा की गई समीक्षा हमें आगे कविताओं मे और पैनापन लाने की जज्‍बा पैदा करेगा। सच मे हम लिख दो देते हे और सभी लोग टिप्‍प्‍णी मे लिखते है कि अच्‍छा लिखा है पर कोई यह कहने का साहस नही जुटा पाता कि काव्‍य मे क्‍या त्रुटि रह गई है।

मैने तो एक ही कविता लिखी थी किन्‍तु आपने उसकी ही अच्‍छी व्‍याख्‍या किया है।

मुझे विश्‍वास हे कि आपके साथ हम विकासोन्‍मुख होगे।
धन्‍यवाद बधाई

Anupama Chauhan का कहना है कि -

बहुत बहुत धन्यवाद आपका.हम सबका सौभाग्य है जो हमें आप कि छत्रछाया मिली.आप के द्वरा दी गयी टिप्पणी हमें आगे बढने में मदद करेगी.मैं आपकी बातों का खयाल रखुँगी और उनपर अमल करुँगी.आप यूँ ही हमारा मार्गदर्शन करते रहिये.

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