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Wednesday, March 14, 2007

मेरी कुछ क्षणिकायें...


एक..

जहाँ जाती हूँ, मेरे कदमों के निशान
तुम्हारा ही बिखेरते हैं नूर
तुम्हारा खून ही अस्तित्व है मेरा
चाहे आल्ता कहो या सिंदूर...

दो..

तेरे अरमानों के गुलशन में
तबाही मचाती हूँ...
ढलानवाली पगडंडियों पर
पंछी हो जाती हूँ...
वो आखिरी झोपड़ी जिसके भीतर
रातभर दिया जलता है,जानती हूँ...
तेरा आशना है सो साँझ होते ही
वहीं बसेरा करने उड़ी चली आती हूँ...

तीन..

आपके बिना हम अधूरे हैं
कैसे कहें कि ख्वाब पूरे हैं
क्या हिसाब दें लम्हों का,
जो साथ गुजारे हैं.
बाकी तो सब था जीने को,
पास हमारे लेकिन
हम तो फ़क़त,
आपके प्यार के मारे हैं...

***अनुपमा चौहान***

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

ajay का कहना है कि -

आपके बिना हम अधूरे हैं
कैसे कहें कि ख्वाब पूरे हैं

सचमुच अनुपमा जी, आपके बिना हिन्द-युग्म के सौन्दर्य में कुछ कमी तो रह ही जाती। आपकी ये क्षणिकायें भी आपकी अन्य रचनाओं की ही तरह मोहक हैं।

जहाँ जाती हूँ मेरे कदमों के निशान
तुम्हरा ही बिखेरते हैं नूर
तुम्हारा खून ही अस्तित्व है मेरा
चाहें आल्ता कहो या सिंदूर

बहुत सुन्दर भाव हैं।

पंकज का कहना है कि -

जैसे छप चुकी किताबों की संख्या किसी रचनाकार की प्रतिभा के द्योतक नहीं हो सकती,
ठीक उसी तरह प्रभावशाली होने के लिये छोटी-छोटी क्षणिकायें ही काफी हैं।

इन पंक्तियों की क्या बात है?

बाकी तो सब था जीने को,
पास हमारे लेकिन
हम तो फ़क़त,
आपके प्यार के मारे हैं।

Kamlesh का कहना है कि -

तेरे अरमानों के गुलशन में
तबाही मचाती हूँ...
ढलानवाली पगडंडियों पर
पंछी हो जाती हूँ...
वो आखिरी झोपड़ी जिसके भीतर
रातभर दिया जलता है,जानती हूँ...
तेरा आशना है सो साँझ होते ही
वहीं बसेरा करने उड़ी चली आती हूँ...

Is kriti main chayawaad ke kann jhalaktain' hain . bahut pasand aayi. Buss ek nivedan/sujhav , urdu ka prayog kamm karen , aur ya fir agar urdu main likhna hi pasand hai to keval urdu main likhen ya fir keval hindi main .

aditinandan का कहना है कि -

very sweet hi,
highly appreciable!felt satisfied when reading it...no words to explain...good that ppl like u r here...
i dont know why ppl dont understand that it's ur work of art,let it b like that!u got balance of hindi n urdu..maintain it...will help u in future.
tc

Ripudaman का कहना है कि -

@aditinandan ji :-

bhai aisaa hai 'kamlesh' yaa aur kisi kee baatoon se aantit honaa sahi baat nahin hai. agar aap unn kee baataon se sahmatt nahin hain, to tark-vikark karein... naa kee yah aisaa.. "why people do not understand".


@anupama ji :-

man mein kuch shankaaYein hain, aap se niji patraa-chaar karke unn par charchaa kareinge.

manya का कहना है कि -

jus too gud to read.. kuchh aur bhi rachnaayen padhi hain.. all were gud .. comment pahli baar kar rahi hun.. sachmuch gahraai h bhaawon me..

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

क्षणिकायें अनोखी विधा हैं, कम शब्दों में गहरी गहरी बातें..बहुत सुन्दर बिम्बों का आपने प्रयोग किया है..

-एक-

"तुम्हारा खून ही अस्तित्व है मेरा
चाहे आल्ता कहो या सिंदूर..."

नूर के साथ "आलता" और "सिन्दूर" इस तरह का अनुपम प्रयोग स्पंदित करता है।

- दो -

"ढलानवाली पगडंडियों पर
पंछी हो जाती हूँ..."

एक एसा बिम्ब है जि इस क्षणिका को उँचाई पर ले जाता है.. चूंकि ढाल वाली पगडंडियों से

"....साँझ होते ही
वहीं बसेरा करने उड़ी चली आती हूँ..." तक बिम्ब को दो बिलकुल अलग रूप देना लेकिन पंछी के विचार को पकडे रह कर रचना के स्तर को उचाई देता है

- तीन -
अच्छी, सरल और सहज क्षणिका है..

*** राजीव रंजन प्रसाद एवं रितु रंजन..

mahashakti का कहना है कि -

अच्‍छी छणिकाऐ है, सरल शब्‍दो मे अच्‍छी रचना

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सुन्दर
कुछ क्षणिकायें लम्बी कविताओं से भी गहरी होती है... जैस आपकी.

"शाम होते ही चिरागों को बुझा देता हूं
दिल ही काफी है तेरी याद में जलने के लिये"

ranju का कहना है कि -

वो आखिरी झोपड़ी जिसके भीतर
रातभर दिया जलता है,जानती हूँ...
तेरा आशना है सो साँझ होते ही
वहीं बसेरा करने उड़ी चली आती हूँ...

बहुत सुंदर...

क्या हिसाब दें लम्हों का,
जो साथ गुजारे हैं.
बाकी तो सब था जीने को,
पास हमारे लेकिन
हम तो फ़क़त,
आपके प्यार के मारे हैं...


दिल को छू जाने वाले लफ्ज़ है आपके इन में अनुपमा
बहुत ही ख़ूबसूरत लिखा है ..

Upasthit का कहना है कि -

दो में, लेखक कह्ता है, कहना चाहता है, जैसी बातों से दूर एक पाठक की तरह मैं क्या समझता हूं...प्याज की पर्तों की तरह अर्थ खुलते से लगते हैं । उसका आशना है जान बसेरा करने तबाही मचाने वाली पंछी बन चली ही नहीं आती उडी चली आती है । शक्ति और प्रेम, नेह और विनाश, सब हैं उसी के पास तभी ये पंक्तियां पुल्लिग मे नहीं रची जा सकतीं ।
एक..वही बात पर कुछ ऐसे कि मानो तो बहुत कुछ ना मानो तो तुक भिड़ाना कवि जाने भूलेगा भी कि नहीं । पाठक यही चाहता है कि कवि कम से कम यह भूल ही जाये ।
तीन...ऊपर की गयी दोनो दुआओं पर आमीन के साथ, एक विश्वास कि कवि कहीं से कहीं चला जाये, लम्हों का हिसाब देते देते फ़कत प्यार का मारा घोषित करे पर प्रतिक्रिया का मतलब क्या यह बताने हेतु, प्रश्न अवश्य खडे़ कर सकता है, सगर्व ।

ऋषिकेश खोङके "रुह" का कहना है कि -

प्रथम २ भागो के लिये मेरी बधाई स्वीकार करो , अति उत्तम , शब्दो का सुन्दर उपयोग , मन की भावनाओं का कुशल चित्रण किन्तु भाग ३ प्रथम २ के सामने कहीं सामान्य दिखाई देता है और मे चाहूंगा की भाग ३ का वजन भी प्रथम २ जितना ही हो सो मेरी कामना यही है की इस पर तुम फिर से काम करो

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