एसा न कहो
कि हमारे बीच कुछ नहीं बचा कहने सुनने को
ये सन्नाटा चुभता है कानों में,
क्यों हम मौन धरें?
चलो, कुछ बात करें..
बढती हुई मंहगाई
या कोई पुरानी फिल्म
जैसे दास्तान-ए-हातिमताई,
बेतुका सा शेयर बाजार
या कौन चला रहा है सरकार,
इनहीं पर कुछ बात करें
पर चलो कुछ बात करें..
तुम्हारी पडोसन की प्रेम कहानी
या मेरी माँ के हाथ की बनी बिरयानी
सोलह सोमवार के व्रत
या क्या सचिन मार पायेगा चालीस शतक?
कुछ भी कहें, पर कहते रहें
चलो कुछ बात करें
शहरों में हो रही चोरियाँ
या गावों से पलायन करते लोग,
एश्वर्या की शादी
या बाबा रामदेव का योग
बहुत कुछ है अब भी कहने सुनने को
क्यों मौन धरें?
चलो कुछ बात करें,
देश मे बढ रहे अपराध
कौन से बेटे ने किया चंदू के बाप का श्राद्ध,
क्या लडके लडकियाँ करते हैं कॉलेज में मटरगश्ती,
क्या सच में हो गयी हैं मारूति की कारें सस्ती?
तुम्हारी उम्मीदें और मेरे झूठ
छोडो अब,
कुछ और कहें,
चलो कुछ साथ चलें,
चलो कुछ बात करें...
# गौरव सोलंकी
(हमारे इस माह के पुरस्कृत कवि "श्री गौरव सौलंकी" अपने किसी पारिवारिक कार्यक्रम में व्यस्त हैं, हिन्द युग्म आभारी है उनके एक अनाम मित्र का जिनके सौजन्य से हमें गौरव सोलंकी जी की यह रचना प्राप्त हुई और प्रक्रिया के तहत आज श्री गौरव सोलंकी जी को हम पाठकों तक पहुचानें मे सफल हो सके..)
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कुछ कवितायें खजाने से
दिल्ली में कड़ाके की ठंड, पारा दो डिग्री से नीचे
एकतरफ़ा मोहब्बत
गैलीलियो निखिल आनंद गिरि की क्षणिकाएँ -
अक्टूबर माह के यूनिकवि अपूर्व शुक्ल की कविताएँ
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गुमशुदा चीजों के प्रति
समय की अदालत में
इक्कीसवीं सदी का भविष्य
मिलिए दिसम्बर 2009 के यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के विजेताओं से। इस बार बहुत उम्दा-उम्दा कविताएँ सम्मिलित हुई हैं।
क्या आप इस सप्ताहांत फिल्म देखने जाने की योजना बना रहे हैं तो सप्ताह की बड़ी रीलिज पर पढ़िए फिल्म समीक्षक प्रशेन ह. क्यावल की राय








आइएगा ज़रूर, आपकी प्रतीक्षा रहेगी
12 दिसम्बर को हिन्द-युग्म ने नई दिल्ली में हिन्द-युग्म पर ही प्रकाशित प्रेमचंद के आलेखों पर आधारित पुस्तक का विमचोन कार्यक्रम आयोजित किया और भगत सिंह पर एक विचार-गोष्ठी का भी आयोजन किया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।


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6 कविताप्रेमियों का कहना है :
तुम्हारी उम्मीदें और मेरे झूठ
छोडो अब,
कुछ और कहें,
चलो कुछ साथ चलें,
चलो कुछ बात करें...
एक सच है इन में
अच्छा लगा इसको पढ़ना ..
बहुत अच्छी बात कही है, गौरव जी। कम से कम कुछ तो बात होती ही रहनी चाहिये। प्रयास अच्छा है। और कोशिश करें ताकि पाठकों को कुछ अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलें।
सहज, सरल, सुन्दर और गहरी रचना है गौरव जी। मन प्रसन्न हुआ यह रचना पढ कर।
*** राजीव रंजन प्रसाद
उसके मुखर और उसकी "उस" का मौन(मेरी आयु कविता जिसे भी कही जा रही है उसे जाने क्यों "उसकी" ही मानने पर तुला है), कहने को तो इसके पास इस लिस्ट से भी बड़ी लिस्ट हो सकती है हो पर उसकी "वो" कविता के अंत मे कहे गये उसकी उम्मीदों और उसके झूठों को "छोंडो अब" कह पल्ला झाड़ने पर क्या कहती है, इसे पाठक जानने की इच्छा अवश्य करेंगे।
कभी कुछ भी नही बात करने मे भी इतना कुछ पीछे बचा सा रहता है (हमारे मन के उस भाग का विरोधी,(जो किसी का साथ नहीं चाहता, अकेला मौन रहना चाहता है))।
उस बचे खुचे की खुरचन पर ही बढ सकने की इच्छा, कविता की सीधी सरल भाषा, कुछ भी पाठक पर न लादने का आग्रह, आस पास के बिम्ब...कविता बस कविता भर है। बधाई गौरव..
acchaa likhaa hai. sabhi rachnaayein aap ki acchii hain.
aur behtar likhte rahiye.
kay kahene. yees cement mein jan hai.- chalo kuch bat kare-
holiday resort ya vruddhashram
kya ban rahi hai rajyasabha?
yees masale pe thodi bahes kare.
chalo kuch baat kare.
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