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Tuesday, February 13, 2007

निठारी के मासूम भूतों नें पूछा..


वो चाकलेट
जब नाखून भरे हाथ बन जाती होगी
तो मासूम छौने सी, नन्ही सी, गुडिया सी
छोटी सी बिल्ली के बच्चे सी बच्ची
सहसा सहम कर, रो कर, दुबक कर
कहती तो होगी 'बुरे वाले अंकल'
मेरे पास है और भी एसी टॉफी
मुझे दो ना माफी, जाने भी दो ना..
मुझे छोड दो, मेरी गुडिया भी लो ना
तितली भी है, मोर का पंख भी है
सभी तुमको दूंगी, कभी फिर न लूंगी
मुझे छोड दो, मुझको एसे न मारो
ये कपडे नये हैं, इन्हें मत उतारो
मैं मम्मी से, पापा से सबसे कहूँगी
मगर छोड दोगे तो चुप ही रहूंगी..

क्या आसमा तब भी पत्थर ही होगा
क्यों इस धरा के न टुकडे हुए फिर?
पिशाचों नें जब उस गिलहरी को नोचा
तो क्यों शेष का फन न काँपा?
न फूटे कहीं ज्वाल के मुख भला क्यों?
गर्दन के, हाँथों के, पैरों के टुकडे
नाले में जब वो बहा कर हटा था
तो ए नीली छतरी लगा कर खुदा बन
बैठा है तू, तेरा कुछ भी घटा था
तू मेरी दृष्टि में सबसे भिखारी
दिया क्या धरा को ये तूनें 'निठारी'?

ये कैसी है दुनियाँ, कहाँ आ गये हम?
कहाँ बढ गये हम, कि क्या पा गये हम?
न आशा की बातें करो कामचोरों
'लुक्क्ड', 'उचक्को', 'युवा', तुम पे थू है
तुम्ही से तो उठती हर ओर बू है
अरे 'कर्णधारो' मरो, चुल्लुओं भर पानीं में डूबो
वेलेंटाईनों के पहलू में दुबको, तरक्की करो तुम
शरम को छुपा दो, बहनों को अमरीकी कपडे दिला दो
बढो शान से, चाँद पर घर बनाओ
नहीं कोई तुमसे ये पूछेगा कायर
कि चेहरे में इतना सफेदा लगा कर
अपना ही चेहरा छुपा क्यों रहे हो
उठा कर के बाईक 'पतुरिया' घुमाओ
समाचार देखो तो चैनल बदल दो
मगर एक दिन पाँव के नीचे धरती
अगर साथ छोडेगी तो क्या करोगे?
इतिहास पूछेगा तो क्या गडोगे?
तुम्हारी ही पहचान है ये पिटारी
उसी देश के हो है जिसमें निठारी...

भैया थे, पापा थे, नाना थे, चाचा थे
कुछ भी नहीं थे तो क्या कुछ नहीं थे
बदले हुए दौर में हर तरफ हम
पिसे हैं तो क्या आपको अजनबी थे?
नहीं सुन सके क्यों 'बचाओ' 'बचाओ'
निठारी के मासूम भूतों नें पूछा
अरे बेशरम कर्णधारों बताओ..

*** राजीव रंजन प्रसाद
१३.०२.२००७

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29 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anupama Chauhan का कहना है कि -

You made me cry....once again

अभिषेक का कहना है कि -

its so hearttouching......
i like it the most...
thanks for that
abhishek

Gaurav का कहना है कि -

मार्मिक चित्रण राजीव जी,
आँखें भीग गईं,उद्वेलित कर गयी यह कविता तो
कितनी वेदना है इस कविता में,जो आक्रोशित भी करती है

"गर्दन के, हाँथों के, पैरों के टुकडे
नाले में जब वो बहा कर हटा था
तो ए नीली छतरी लगा कर खुदा बन
बैठा है तू, तेरा कुछ भी घटा था
तू मेरी दृष्टि में सबसे भिखारी
दिया क्या धरा को ये तूनें 'निठारी'?"
.
.
बिल्कुल सही प्रश्न है|
.
.
.
मगर एक दिन पाँव के नीचे धरती
अगर साथ छोडेगी तो क्या करोगे?
इतिहास पूछेगा तो क्या गडोगे?

अत्यन्त अद्भुत
उत्कृष्ट, बहुत धन्यवाद आपको
सजल श्रद्धा इस कविता को

आलोक शंकर का कहना है कि -

मार्मिक

तुम्हारी ही पहचान है ये पिटारी
उसी देश के हो है जिसमें निठारी...
सत्य

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

"ये कैसी है दुनियाँ, कहाँ आ गये हम?
कहाँ बढ गये हम, कि क्या पा गये हम?
न आशा की बातें करो कामचोरों
'लुक्क्ड', 'उचक्को', 'युवा', तुम पे थू है
तुम्ही से तो उठती हर ओर बू है"

"तुम्हारी ही पहचान है ये पिटारी
उसी देश के हो है जिसमें निठारी..."

सजीव चित्रण किया है आप ने राजीव जी एव इस के लिये आप प्रशंसा के पात्र हैं
हमारी और इस समाज की कमजोर मानसिकता ही इन घटनाओं का कारण बनती है

मेरी कविता पर आप के सुन्दर विचारों के लिये धन्यवाद

ranju का कहना है कि -

ufff sach mein bahut hi dardnaak lafazo mein aapne sach ko bayaan kiya hai .....

na jaane kaise dil rahe honge un ke jo khud ko insaan kehte hain

kar ke wheshat ka nanga naach
shayad woh khud ko bhagwaan samjahte hain

nahi pacheeja dil jinaka un masoom avaazo se
woh insaan kya sach mein aaj is duniya mein basate hain !!

ranju

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

इस कविता में घटना का अच्छा चित्रण किया है आपने, वेदना और आक्रोश से परिपूर्ण।

"गर्दन के, हाँथों के, पैरों के टुकडे
नाले में जब वो बहा कर हटा था
तो ए नीली छतरी लगा कर खुदा बन
बैठा है तू, तेरा कुछ भी घटा था
तू मेरी दृष्टि में सबसे भिखारी
दिया क्या धरा को ये तूनें 'निठारी'?"

पंक्तियों में छुपा आक्रोश जायज है, आपकी कविताएँ सामाजिक विषयों का संजीव चित्रण करती है. बधाई स्वीकार करें।

Anonymous का कहना है कि -

रिपुदमन पचौरी said....


मान्यवर रंजन जी,

कविता बहुत ही भावुक है। सत्याता को दरशाती हुई, और, और भी बहुत से प्रशन पूछती हुई ( सरलता से)।

हाँ सही है, की, युवा कुछ नही कर सका, पर युवा के उपर यह कटाक्ष क्यों ? इस के उत्तरदाई का सता के आमात्य नहीं ?

वीर रस आवश्यक नहीं की रुद्र भाव में पड़ा जाये, अपितु जो कविता, मन में आक्रोश पैदा कर उतेजना लायें, भले ही शब्द सरल हों उस को वीर रस कहना सही होगा। सो मैं मानता हूँ, कि यह कविता वीर और करुण रस का मिश्रण है।

मंगल कामना सहित।
रिपुदमन पचौरी

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

"बढ़ो शान से, चाँद पर घर बनाओ

नहीं कोई तुमसे ये पूछेगा कायर

कि चेहरे में इतना सफेदा लगा कर

अपना ही चेहरा छुपा क्यों रहे हो"

जिस देश की आधी से अधिक आबादी युवाओं की है। जहाँ की जनता जन-जन में कृष्ण और राम जैसा वीर देखती है वहाँ पर निठारी के नरपिशाच इन्हें ताक पर रखकर इनकी बहन-बेटियों के साथ ये कुकृत्य करते हैं तो कवि विप्लवित नहीं होगा!

राजीव जी का क्षोभ ठीक ही है। कवि एक तरह से समाधान ही प्रस्तुत करता है कि यदि भारत का युवा भौतिकता में अत्यधिक संलग्न रहेगा तो इस तरह के कांड भूतों को भी भतभीत करते रहेंगे। युवाओं को अपनी आँखें खुली रखनी होगी, यह छद्‌म आचरण अधिक दूर नहीं ले पायेगा।

miredmirage का कहना है कि -

रचना बहुत अच्छी व मार्मिक है । यहाँ पर बधाई देना कुछ विचित्र सा लग रहा है । भावनाओं का बहुत सटीक व हृदयविदारक वर्णन किया है आपने ।
किन्तु एक बात समझ नहीं आई कि इस सबमें वेलेन्टाइन आदि कैसे आ गए । बुराई कोई आज के युग या आधुनिकों की देन नहीं है । यह सदा थी व सदा रहेगी । क्या कंस ने नवजात शिशुओं का वध नहीं किया था । जब जब राजा या राज्य ने अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ा यह सब हुआ । समाज केवल युवाओं से नहीं बनता । पुरानी पीढ़ी ने ही युवाओं को बनाया है । वैसे ऐसा कुकृत्य करने वाले कोई युवा नहीं थे, स्वयं पिता थे ।
हाँ ,युवा इतना अवश्य कर सकते हैं कि ऐसे शासकों को , जिनके राज्य में यह सब हुआ पदच्युत कर दें । हर नेता को मत देने से पहले बता दें कि वह अत्याचार या बुरे शासन के लिए जिम्मेदार होगा ।
हम सबकी आत्मा को जगाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com

mahashakti का कहना है कि -

अच्‍छा ममस्‍पर्शी वर्णन

ये पक्तिंयॉं अच्‍छी लगी

वेलेंटाईनों के पहलू में दुबको, तरक्की करो तुम
शरम को छुपा दो, बहनों को अमरीकी कपडे दिला दो

ajay का कहना है कि -

राजीव जी की यह कविता पाठक के सम्मुख न केवल निठारी में हुई शर्मनाक घटना का मार्मिक चित्र उकेरती है वरन् आज विदेशी सभ्यता के अनुकरण के प्रयास में अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे युवाओं का ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले दुराचारियों तथा उनका शमन करने में अक्षम रहने वाले शाषन तंत्र का प्रतिकार करने हेतु आह्वान भी करती है। कविता किसी भी भावुक पाठक की आँखों में आँसू ला सकती है जो इसके प्रभाव का जीवंत प्रमाण है। कविता में किसी विशेष पंक्ति का उल्लेख मैं नहीं करूँगा क्योंकि ऐसा करना बाकियों के महत्व को कम करने के समान होगा। राजीव जी की यह कविता, उन्हें एक उच्चकोति का कवि सिद्ध करती है। इसके लिये राजीव जी की प्रतिभा को मैं नमन करता हूँ।

Gambhir का कहना है कि -

pooree tarah samajh nahi aayee,ek baar aur padhungaa.Maarmik varnan thaa aur criticism bhi thaa,subject dobaaraa samajhnaa chahungaa.Waqt chahiye.

Anonymous का कहना है कि -

Shailesh, tumko sambothit ker raha hun kyun ki tumhari tippnii mein merii teppni ko ley kar shaayad kuch vichaar shaamil hain.

"युवाओं को अपनी आँखें खुली रखनी होगी" iss se aap kaa kyaa matlab hai ?

yuvaa varg kee apni maryaadyaayein hain, aur raajnitik varg kee apni. per ye baat samajh lijiye kee binaa raajniti ke kuch nahin hotaa... Kaan mein bhi raajnitig log shaamil the, unn kukarmiyon ko bachaane walon mein bhi aur jo aisaa hone rok saktaa hai vo prashaan kee asafaltaa bhi.


घुघूती jee ne jo likhaa uss per zaraa dhyaan dein, aavesh aur adhik samvedan sheeltaa hee se kaam nahin chaltaa. har ceez ko dhekhne kee apni frame of references hote hain. kavitaa mein valentines day kee baat kuch theek nahin hai, per kavitaa kee mool satt ko nikalaa jaaye to vo nirarthak hai.

masle neeche se hal nahin hote, unn ko hal kerne kee liye samajh kee shaashaan vyvasthaa mein shaamil ho jana padtaa, hai. "mandal commission" kee tarhaa nahin .. kee apne aap ko yodhyaa/pratikaarii maan kar khud mein hee aag lagaa lee jaye. mein aag laga lee jaaye...

haan ek chotaa deepak timir ko chunautee de saktaa hai. par raatri khatamm hone key liye ravi kee hee aavashyaktaa hai.

kavitaa ko acchaa kahaa jaa saktaa hai, kee jo baat kavi kahhnaa chaataa hai sahi dhang se kahh paa raha hai, apne vishay ko saarthak kar raha hai, bhinn prakaar key ras bhi hain ( Bhayanak ras- Veebhatya ras ) bhi hain.

Ripudaman Pachauri
( angrezi mein likh rahaa hun, kyunki iss samay hindi mein nahin likh saktaa, aur likhe bhinaa rah nahin saktaa, so kripyaa kshmaa karein. )

Gaurav का कहना है कि -

मैं व्यक्तिगत रूप से यह मानता हूँ कि यह कविता नहीं है अपितु एक आंदोलन है
निश्चित ही यह कविता हमें झकझोरती है,कुछ स्नेही बंधुओं की यह आपत्ति है कि युवाओं को क्यों निशाना बनाया गया है

क्यों नहीं?

समाज के लिये जो हमारा दायित्व है उसे हम वास्तव में समय नहीं देते
ठीक है, कंस ने नवजात शिशुओं को मारा और वह युवा नहीं था, किन्तु ऐसे कंस का वध जिसने किया वह कृष्ण "युवा" ही थे
राजा या शासन-व्यवस्था को ही दोष दे कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड सकते |

वैलेन्टाइन की बात यहाँ कहने से लेखक का आशय यही रहा होगा, कि हमारे पास हर नकारात्मकता या मौज-मजे के लिये पर्याप्त समय है
किन्तु ऐसी हृदयविदारक घटना या समाज में सर्वत्र फैले ऐसे किसी भी दुराचार के लिये हम कितना समय देते हैं|
"समाचार देखो तो चैनल बदल दो"

ऐसी रचनायें अति-आवश्यक हैं,कविताओं या लेखों के माध्यम से भी हम (युवा) अपना विरोध समाज में अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रख सकते हैं
जैसे कि इस कविता ने मुझे बहुत उद्वेलित किया है|


आदर सहित
गौरव शुक्ल

Medha Purandare का कहना है कि -

Jwalant kavita,hamesha ki tarah !
Your kavita often make readers (including me)to think over certain social issues with heavy hearts.

tanha kavi का कहना है कि -

देर से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूँ , इसके लिए माफी चाहता हूँ।
राजीव जी आपकी हरेक कविता कोई न कोई ज्वलंत मुद्दा उठाती है, यह आपकी सबसे बड़ी खूबी है।
यह कविता एक साथ कई रसों का अद्भुत मिश्रण है।

क्यों इस धरा के न टुकडे हुए फिर?
पिशाचों नें जब उस गिलहरी को नोचा
तो क्यों शेष का फन न काँपा?
न फूटे कहीं ज्वाल के मुख भला क्यों?
गर्दन के, हाँथों के, पैरों के टुकडे
नाले में जब वो बहा कर हटा था
तो ए नीली छतरी लगा कर खुदा बन
बैठा है तू, तेरा कुछ भी घटा था
तू मेरी दृष्टि में सबसे भिखारी
दिया क्या धरा को ये तूनें 'निठारी'?

उपरोक्त पंक्तियों में आपने दर्द को जीया है। आक्रोश में ईश्वर पर आक्षेप अवश्यंभावी है। क्या सोच कर उसने ऎसा जहां बनाया है, जहाँ मासूमियत का कोई मोल नहीं।

मगर एक दिन पाँव के नीचे धरती
अगर साथ छोडेगी तो क्या करोगे?
इतिहास पूछेगा तो क्या गडोगे?


नहीं सुन सके क्यों 'बचाओ' 'बचाओ'
निठारी के मासूम भूतों नें पूछा
अरे बेशरम कर्णधारों बताओ..

समाज के कथित भविष्यों और कर्णधारों पर आपने अच्छा सवाल दागा है।
सोई इंसानियत के कान पर आपने नगाड़ा डालने का काम किया है। बहुत हीं सराहनीय प्रयास है यह।
बधाई स्वीकारें।

Rishikesh Khodke का कहना है कि -

rajjev ji , din par din aapki lekhni sona hoti ja rahi hai , mujhe puri aasha hai ki aane vale dino me aap bhartiy kavita me shirsh kaviyo me honge.

adit का कहना है कि -

masoomo ke dard ko shabdo men sakar karne ka jo kartab rajeev bhaiya ne dikhaya hai, wah vastav men hriday sparshi tatha vicharo se paripurn hai. samaj ko is vishaya ki or akrisht karne ke liye, yah ek uttam madhayam hai. jo bheed ko ek nayi soch dene men samarth hai.
hum asha karte hai, ki rajeev bhaiya isi prakar age bhi apana karya nirantar nihswarth bhaw se karte rahenge. dhanyavaad.

Manmohan का कहना है कि -

Rajiv Ji,
Bahut hi marmik chitran kiya hai aapne aur bahut saare gambir prashan bhi uthaye hain. Aise karuna bahvon se likhna aap ki chir-parichit shaily hai. Ek baar phir se aap ke lekhan aur bhaavon ko naman hai.

Anupama का कहना है कि -

Rajeevji,keep walking....don't shake....whatever you are doing is right.The choice is ours eiher we can sit watch,hear the gudy gudy stories on TV....or we can take initiative to put first steps in those darken worlds....

I believe in Actions.....youths only can bring revolution on planet...we have courage, strength,brains what we lack is in proper guidance.Generally elders say not to come in limelight..n nations future is bright if we have guides like you.im very delighted to say that here those first steps are yours.....it will be your footprints that youths will step into to sooth,to heal,to love,to take responsibilities,to accept affected baby girls in our Society.
You are our INSPIRATION....

Archana का कहना है कि -

Really mind blowing.
Thanks a lot for such a social description.

Archana का कहना है कि -

Really mind blowing !!
Thanks a lot for such a social description of today's world.

Upasthit का कहना है कि -

बाबू इतने दिनों बाद आपकी इतनी मर्मिक और मन को तोडती, झक्झोरती ही नहीं अपने समय अपने आस पास और खुद अपने आप घिन आती है, इसे पढ कर ।
सामाजिक कवितायें कम ही लिखी जा रही हैं खास कर यहां ब्लोग्स की दुनिया मे, आपसे आशा बंधी है । हर तबके हर मानसिकता वाले कान को सुना सकने की क्षमता है आपकी इस प्रकार की कविताओं मे...एक अक्रोश एक गुससा किसी और पर नहीं अपने आप पर भी, सफ़ल हैं ऐसी कवितायें जो अपने आप को भी नहीं बक्शतीं....

raman का कहना है कि -

itni marmik abhivyakti thi ki apne aassoon nahi rok saki

vishakha का कहना है कि -

adbhoot,,,,,
sharmsaar kar gayi,

Shikha का कहना है कि -

िजत्नी भी तरीफ़ की जाये वो कम है...
इत्ना भयान्क सच!! मेरी आँखों में आंसू है.. मगर िजन्की आँखों मे ये आंसू होने चिहये... उन्मे तो शरम भी नही....
मेरी शुभकाम्नाये आप्के साथ है... यूँही आईना िदखाते रिह्ये... इस्मे सच नज़र आता है...

Anonymous का कहना है कि -

very nyc its hrt tching

Anonymous का कहना है कि -

very nyc its hrt tching

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