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Sunday, December 24, 2006

स्मृतियाँ


स्मृतियाँ कहती हम आए आए
मैं कहती रुक जाना रे तुम

आयेंगी वह हसती गाती
चेहरे से खुशियाँ टपकाती
जबरन सुख की चादर ओढे
खुदको जैसे हो भरमाती
ले आयेंगी रहस्य लपेटे
चुभती सी खुशियों के पीछे
उस चुभन को अनदेखा कर
झुठलाकर हँस पाऊँ?
मैं कहती रुक जाना रे तुम

डरती मैं कहीं उनसे मिलकर
भावुक ना हो जाँऊ
लगता मैं शायद ही उनकी
विवस्त्रता सह पाँऊ
आ जाये गर आग लपेटे
जाने कैसा सत्य पचाके
क्या मैं भी उनसा ही विदारक
सत्य पचा पाँऊ?
मैं कहती रुक जाना रे तुम

-- मनिषा साधू

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

SHUAIB का कहना है कि -

बहुत ख़ूब

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

आयेंगी वह हसती गाती
चेहरे से खुशियाँ टपकाती
जबरन सुख की चादर ओढे
खुदको जैसे हो भरमाती

बहुत खुब. भावों का सुन्दर चित्रण.

SaMaR(lna@rediffmail.com) का कहना है कि -

अति सुन्दर।
जितना अच्छी भावनाओं की समझ, उतना ही सुन्दर शब्द संयोजन।
शुभकामनाएं।

Anonymous का कहना है कि -

good colection of words....
looking foreward for ur next poem.

sahil का कहना है कि -

मनीषा जी आपकी स्मृतियाँ तो काफी अच्छी हैं.
आपकी smritiyon को bantkar acchjha लगा.
आलोक सिंह "साहिल"

jeje का कहना है कि -

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