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Monday, November 27, 2006

गज़ल


ज़िन्दगी अब सही नहीं जाती
ए खुदा मौत भी नहीं आती..

उसके पंजों से इस कदर घायल
इस तरह चील भी नहीं खाती..

मन नें यूं साथ तन का छोडा है
आत्मा चीख भी नहीं पाती..

मेरे चेहरे में ढूंढता है अक्स
उसकी फितरत समझ नहीं आती..

मुझसे पूछे है "क्या किया तुमनें"
दिल का व्यापार किस लिये साथी

जीते जी मार कर हँसा हमदम
मुझको "राजीव" मौत क्या आती..

कवि- राजीव रंजन प्रसाद

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

ratna का कहना है कि -

नर हो न निराश करो मन को--

Pramendra Pratap Singh का कहना है कि -

अच्‍छा लिखा है।

Ravindra का कहना है कि -

Ek aur gajal nirasha bhari..

Anonymous का कहना है कि -

abhi ham waah waah bolenge to aap bolenge ki ham apne jakhm batate hain aur log waah waah bol kar chale jaate hain.

paar wakai zabardast likha hai aapne....
ज़िन्दगी अब सही नहीं जाती
ए खुदा मौत भी नहीं आती..

उसके पंजों से इस कदर घायल
इस तरह चील भी नहीं खाती..

मन नें यूं साथ तन का छोडा है
आत्मा चीख भी नहीं पाती..


wakai bahut sundar..........
swapnil>newdreams108@yahoo.co.in

alok kumar का कहना है कि -

Rajiv ji mubarakbad is bat ke liye ki apne JINDAGI aur MAUT ke tabe-bane ko itne saral rup me prastut kiya. ati sunder.............

jeje का कहना है कि -

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