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Sunday, November 05, 2006

क्यूं छोड़ तन्हा चले जाते हैं?


संजोये हुए दिल के अरमां,
क्यूं अश्क-धारा बन जाते हैं?

निगाहों से कर सबकुछ बयां,
क्यूं हलक-ए-झूठ कह जाते हैं?

जानकर भी खता हमसे हुई,
क्यूं सजा खुद ही पा जाते हैं?

जग-ए-वफ़ाई निभाने को,
क्यूं दिल-ए-सितम सह जाते हैं?

देखकर निगाहें आंसू भी,
क्यूं छोड़ तन्हा चले जाते हैं?

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

Pankaj Bengani का कहना है कि -

कविता अच्छी पर क्या कहें
समझ कुछ नही पाते हैं

हिन्दी मिश्रीत उर्दु कभी
उर्दु मिश्रीत हिन्दी कह जाते हैं

थोडे रूकिए जोशीजी पल दो पल
नीरज दिवान को लाते हैं

हम बेगानों के बीच वही तो,
उर्दु मंत्री कहलाते हैं

प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह का कहना है कि -

प्रश्‍नो की पहेली को, कविता रूप मे साकर किया।
दिलो के दर्द को, हिन्‍दी उर्दू मे बयान किया।।
दिल के दर्द को समझ पाना कितना कठिन होता है,
कविता रूप मे आपने उसे उदृगार किया।।

अच्‍छी कविता है। लिखते रहे कलम न रूके।

भुवनेश शर्मा का कहना है कि -

पढ़कर आपके अंदाजे-बयां
तारीफ़ के लिए शब्द नहीं मिल पाते हैं

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

जोशी जी,
इस गजल में कुछ शब्दों के अर्थ बतावें-
हलक-ए-झूठ
जग-ए-वफ़ाई
दिल-ए-सितम

हिन्दी में मैंने अरबी-फारसी के शब्दों का इस तरह का प्रयोग नहीं देखा।

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

मित्र शैलेशजी,

इस रचना में मैने बहुत से ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो ना तो हिन्दी है, ना उर्दू और ना ही अरबी-फारसी। यह एक नया प्रयोग था जिसमें मैने "जुगाड़" शब्दों का प्रयोग किया है। मन में कुछ भाव थे और प्रयोग करने कि इच्छा, बस उसी का परिणाम आपके सामने है। प्रयोग करने से पूर्व मैने इसे इस प्रकार लिखा था -

संजोये हुए दिल के अरमां,
क्यूं बन आंसू बह जाते हैं?

निगाहों से कर सबकुछ बयां,
क्यूं होंठो को सील जाते हैं?

जानकर भी खता हमसे हुई,
क्यूं सजा खुद ही पा जाते हैं?

इस जग से वफ़ाई निभाने को,
क्यूं खुद से बेवफाई कर जाते हैं?

देखकर निगाहें आंसू भी,
क्यूं छोड़ तन्हा चले जाते हैं?


असुविधा के लिए क्षमा करें।

संजय बेंगाणी का कहना है कि -

प्रयोगपुर्व की कविता (या शायद गज़ल) ज्यादा प्रभावि तथा सही लग रही है. क्या जरूरत है, 'ए' के साथ शब्द संयोजन की.

Udan Tashtari का कहना है कि -

सच है कि दोनों रचनाओं में प्रयोगपूर्व वाली ही बेहतर लग रही है.

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

धन्यवाद संजयजी एवं गुरूदेव,

प्रयोग असफल मगर शिक्षाप्रद रहा।

भविष्य में भी प्रयोग करता रहूँगा, कम से कम टिप्पणियों से कुछ ना कुछ सिखने को तो मिलेगा। :)

सागर चन्द नाहर का कहना है कि -

संजय भाई सही कहते हैं जो बात इस प्रयोग से पूर्व की कविता में है बाद की में नहीं।
वैसे आजकल छोटे तीर (पंकज जी) अच्छी कविता (?)करने लगे हैं।

jeje का कहना है कि -

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