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Wednesday, June 28, 2006

कवि-परिचय


विश्व दीपक


इनका जन्म बिहार के सोनपुर जिसे हरिहरक्षेत्र भी कह्ते हैं, में २२ फरवरी १९८६ को हुआ था। बचपन से ही हिंदी कविताओं में इनकी रूचि थी । जब उच्च विद्यालय में इनका दाखिला हुआ, तो अपने परम मित्र मनीष सिंह के साथ मिलकर कवितायें रचने का इन्होंने विचार किया । इस तरह आठवीं कक्षा से इन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया । इनके परम मित्र ने बाद में लेखन से सन्यास ले लिया । परंतु इनका लेखन अबाध गति से चलता रहा । इन्होंने अपनी कविताओं और अपनी कला को बारहवीं कक्षा तक गोपनीय ही रखा । तत्पश्चात मित्रों के सहयोग के कारण अपने क्षेत्र में ये कवि के रूप में जाने गये । बारहवीं के बाद इनका नामांकन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के संगणक विज्ञान शाखा में हो गया । कुछ दिनों तक इनकी लेखनी मौन रही,परंतु अंतरजाल पर कुछ सुधि पाठकगण और कुछ प्रेरणास्रोतक मित्रों को पाकर वह फिर चल पड़ी । ये अभी भी क्रियाशील है। इनकी सबसे बड़ी खामी यह रही है कि इन्होंने अभी तक अपनी कविताओं को प्रकाशित होने के लिये कहीं भी प्रेषित नहीं किया।


अवनीश गौतम


एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कला निर्देशक कवि अवनीश गौतम का मानना है कि कवि का नाम नहीं कवि का काम बड़ा होना चाहिए। इसलिए उनकी इच्छानुसार उनका परिचय पृष्ठ यहाँ से हटा लिया गया है। यदि कोई उनके बारे में विस्तार से जानना चाहता हो तो वो उन्हें avanish_gautam@yahoo.com या avanishgautam@gmail.com पर मेल कर सकता है।


राजीव रंजन प्रसाद

कविता इन्हें विरासत में मिली है। कवि के शैशवकाल में ही पिता का देहांत हो गया था। पिता की लेखनी ही इनमें जीती है, ऐसा कवि का मानना है। राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तिसगढ राज्य के अति पिछडे जिले बस्तर (बचेली-दंतेवाडा)में हुई। विद्यालय के दिनों में ही उन्होनें एक अनियतकालीन-अव्यावसायिक पत्रिका "प्रतिध्वनि" निकाली। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं किन्तु अपनी रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करनें का प्रयास उन्होनें कभी नहीं किया। उन्होंने स्नात्कोत्तर की परीक्षा भोपाल से उत्तीर्ण की और उन दिनों वे भोपाल शहर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का सक्रिय हिस्सा भी रहे। इन दिनों वे एक प्रमुख सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहायक प्रबंधक (पर्यावरण)के पद पर कार्यरत हैं। लेखनी उनकी अब भी अनवरत गतिशील है।


गिरिराज जोशी

लेखक का जन्म राजस्थान के नागौर जनपद में हुआ। प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा भी वहीं पर हुयी। बचपन से ही हिन्दी साहित्य में रूचि थी मगर वातावरण अनुकूल नहीं होने के कारण लिखने में असमर्थ रहे। अधिस्नातक की शिक्षा प्राप्त करने हेतु दो वर्ष गंगानगर रहे। वहाँ हॉस्टल में अलग-अलग प्रान्त से आए छात्रों से विभिन्न संस्कृतियों को जानने का अवसर मिला और अनुकूल वातावरण भी। शरबजीतसिंह "काका" जैसे कवि मित्र मिलें और मनोज व गुरप्रित सिंह "गोपी" जैसे आलोचक भी। शरबजीतसिंह "काका" से सुफ़ी संत "बाबा बुल्ले शाह" के बारे में जानने का अवसर मिला। तद्पश्चात लेखक की कलम पुनः जागृत हुई और मित्रों से भरपूर सहयोग पाकर तेजी से फलने-फूलने लगी। लेखक ने अपनी अधिकांश रचनाऐं वहीं पर लिखी। ७६ प्रतिशत अंको से अधिस्नातक उत्तीर्ण करने के पश्चात लेखक ३ माह दिल्ली में रहे और फिर जयपुर। जयपुर में घटे एक अप्रत्याशित घटनाक्रम से आप संस्मरण लिखने को प्रेरित हुए और "वो तीस दिन" नामक संस्मरण लिखा। लेखक ने कई बार अपनी कविताओं को प्रकाशनार्थ पत्रिकाओं को भी प्रेषित किया परन्तु सफलता नहीं मिली। अंततः अन्य चिठ्ठाकारो से प्रेरित होकर लेखक ने अपनी रचनायें क्रमबद्ध रूप से अपने ब्लॉग http://kaviakela.blogspot.com/ पर अगस्त २००६ से प्रकाशित करना शुरू कर दिया। वर्तमान में लेखक एक बहूराष्टीय कम्पनी में Network Engineer के पद पर कार्यरत हैं।




रचनायें- लेखक मूल रूप से आधुनिक कविताएँ ही लिखते हैं।



अनिल कुमार त्रिवेदी

जुलाई १९८१ में जन्मे कवि अनिल कुमार त्रिवेदी का जन्मस्थान हमीरपुर, उत्तर प्रदेश का एक क़स्बा 'राठ' रहा है। कविता से इनका सम्पर्क नैनीताल शहर के 'भारतीय शहीद सौनिक विद्यालय' से माना जा सकता है जब कवि कक्षा ८वीं के विद्यार्थी थे, और अपने विज्ञान के आचार्य श्री विवेक के कविता-वर्णन से बहुत प्रभावित थे। श्री विवेक प्रतिदिन एक कविता, प्रार्थना-काल के समय सुनाते थे। कवि ने सोचा, जब गुरुजी प्रतिदिन एक कविता सुना सकते हैं तो क्या मैं एक कविता भी नहीं लिख सकता! बस फिर क्या था, उठायी कलम, चलते-फिरते पृष्ठ पर शब्दों का कैनवास खींच डाला, मगर उसे वे सहेज ना सके। जल्द ही दूसरी कविता 'आज़ादी के पचास वर्ष' लिख डाली। पर किसी को ना दिखाया ना सुनाया, शायद वह इनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व का परिचायक था। प्रारम्भ में कवि आज़ादी, नेता, ख़ादी, और पश्चिमी सभ्यता की आलोचनाएँ ही कविताओं में समाहित करते रहे, मगर जल्द ही इन्होंने कविता-मंडल का विस्तार किया। सन् २००२ में GLA प्रोद्यौगिकी एवम् प्रबंधन संस्थान, मथुरा में प्रवेश के बाद, वहाँ साथी मित्रों के प्रोत्साहन से कविताएँ वाचने भी लगे फिर भी कभी भी अपने आप को मंच तक ना ले सके। एक-दो बार संस्थान की मासिक पत्रिका 'GLADTimes' में प्रकाशनार्थ, कविताएँ देना चाहे परन्तु दुर्भाग्यवश सफलता हाथ नहीं लगी। कुछ दिनों पूर्व कवि शैलेश भारतवासी की दृष्टि इनके कविताओं पर पड़ी और वे उनको सजाल पर लाने को मजबूर हो गये। वर्तमान में कवि अनिल कुमार त्रिवेदी दिल्ली महानगर में रहकर भारतीय अभियांत्रिकी सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

रचनाएँ- सैकड़ों अप्रकाशित कविताएँ।

मनीषा साधू

आपने एम. एस. सी. , बी. एड., और हिन्दी साहित्य में बी. ए. किया है। राष्ट्रीय प्रातिनिधिक हिन्दी कविता संग्रह "शब्दसागर" में आपकी कविताओं का समावेश है। विदर्भ हिन्दी साहित्य संघ द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका में आपकी कविताओं का प्रकाशन हुआ है। चर्चासत्र और साहित्य संमेलन के अवसर पर आपको सामाजिक और साहित्यिक विषयोंपर भाष्य करने हेतु वक्ता के तौर से बुलाया जाता है। आपके एक मराठी उपन्यास और दो मराठी कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आपका हिन्दी कविता संग्रह प्रकाशन मार्ग पर है। आपकी कविताओं को अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान, नागपुर, अभिव्यक्ती वैदर्भीय संस्था, नागपुर इन संस्थाओं में आप कार्यकारीणी सदस्य के तौर पर दायित्व निभातीं है। नागपुर के मारिस कालेज और भिडे गर्ल्स ज्युनियर कालेज में आप चार साल अध्यापिका रह चुकी हैं।

तुषार जोशी, नागपुर
तुषार जोशी का जन्म महाराष्ट्र राज्य के नागपुर नगर में हुआ। ये ज्यादातर कविताएँ मराठी में लिखतेँ हैं। इन्हे हिन्दी से लगाव है। कुछ कविताएँ ये हिन्दी में भी लिखते हैं। इनका मराठी साहित्य मनोगत स्थल पर प्रकाशित है।

मनीष 'वंदेमातरम्'
कवि मनीष 'वंदेमातरम्' का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के ग़ाजीपुर जनपद के एक छोटे से गाँव नसीरपुर में हुआ। छुटपन से ही हिन्दी साहित्य में विशेष रूचि थी। मनीष ने दो उपन्यासों 'श्रद्धांजली' और 'वसुंधरा' तब ही लिख दिया था, जब वे १०वीं कक्षा के विद्यार्थी थे। ये दोनों उपन्यास, वे अपने एक मित्र को भेंट कर चुके हैं। स्नातक की पढ़ाई के लिए लेखक इलाहाबाद आ गये, जहाँ इन्होने हिन्दी साहित्य की कई अन्य विधाओं में सृजन आरम्भ किया। लेखक ने अपने एक संस्मरण 'असमनिया' जो कि मित्र-मंडली में बहुत लोकप्रिय रही, को प्रकाशनार्थ 'हंस', 'कथादेश' सरीखें कई पत्र-पत्रिकाओं में भेजी, परन्तु सफलता हाथ नहीं आई। अपने कुछ अनन्य मित्रों के साथ लेखक ने समाचार पत्रों के सम्पादकीय विभाग से भी सम्पर्क किया। वर्तमान में लेखक इलाहाबाद में रहकर प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

रचनाएँ-
उपन्यास- वसुंधरा एवम् श्रद्धांजली।
संस्मरण- असमनिया एवम् कानी।
नाटिका- स्वर्ग में आरक्षण।
कविता- सैकड़ों कविताएँ।


अनिल वत्स
भैरवाँ (बलरामपुर, उत्तर प्रदेश) में जन्मे कवि अनिल वत्स कविता के नवीनतम खिलाड़ी हैं। इनके अपने शब्दों में इन्होंने कभी सोचा भी नहीं था, ये कभी कविता जैसी सृष्टि का सृजन करेंगे। जून २००५ तक, कवि मनीष वंदेमातरम्, कवि पंकज तिवारी और कवि शैलेश भारतवासी की कविताओं का मात्र रस लेते आये थे। इसी वर्ष, जुलाई के महीने में कवि ने इलाहाबाद कृषि संस्थान (समतुल्य विश्वविद्यालय) में परास्नातक (जैवरसायनिकी) के अध्ययन के लिए प्रवेश ले लिया। प्रत्येक संस्थान की आवश्यक रीति "रैगिंग" अनिल में कविता-उत्कर्ष का हेतु बनी। वरिष्ठ साथियों को मनीष जी की कविताएँ सुनाते रहें, परन्तु कब तक सुनाते, सोचा, क्यों ना स्वयम् ही कुछ रचा जाय। कुछ लिखा, भारतवासी और वंदेमातरम् ने खूब प्रोत्साहित किया, इन कविताओं को वे अधिक आत्मविश्वास से पढ़ते गये और देखते ही देखते कवि हो गये। कवि ने हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' को अपनी तरह से लिखना आरम्भ किया, लगभग ६० से अधिक छन्द लिख चुके हैं। प्रेम पर एक विवेचना लिखना चाहते हैं। वर्तमान में इलाहाबाद में रहकर परास्नातक होने की ओर अग्रसर हैं।

रचनाएँ-
'अपनी मधुशाला' (६०-७० छन्द), अप्रमाणित पच्चीस से अधिक कविताएँ।

पंकज तिवारी
कवि पंकज तिवारी का जन्मस्थान श्रीकांत का पुरवा (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) है। कविता से प्रथम सम्बन्ध, इनके बाबा जी (दादा जी) के द्वारा इनसे तुलसीकृत 'रामचरित मानस' का पाठ करवाना से है। जब माध्यमिक कक्षाओं के अध्ययन के लिए फ़ैजाबाद आना हुआ, तो वहाँ के वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों (जैसे स्वतॅत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि) में फिल्मी धुनों पर राष्ट्रभक्ति गीत लिखने का अवसर प्राप्त हुआ।, परन्तु कविता को इन्होंने समीप से तब जाना, जब ये इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए इलाहाबाद आये। कुछ कवि सम्मेलनों में जाने का अवसर भी मिला। सन् २००१ में कवि मनीष वंदेमातरम् के सम्पर्क में आने के पश्चात जैसे इनकी अनुभूतियों को पंख मिल गया। हिन्दी-गजल के संकलन की एक पुस्तक 'गजल-ए-हिनदुस्तानी' इनको बहुत प्रिय रही, विशेषरूप से महाकवि गोपालदास नीरज की गजलें। सन् २००२ के अगस्त के महीने में, कवि ने राजकुमार गोएल तकनीकी एवम् प्रबंधन संस्थान, गाज़ियाबाद में प्रवेश ले लिया, जहाँ "रैगिंग" नामक रस्म के समय वरिष्ठ छात्रों ने इनकी अभिरूचि जाननी चाही, इन्होंने कविता लिखना-पढ़ना बता दिया। कवितावाचन की इनकी शैली इतनी सुन्दर है कि जो इक बार सुन लेता है, बार-बार सुनना चाहता है। "फ्रेशर फंक्शन" में आखिर इन्हें कुछ सुनाना ही था तो कलम उठायी और कुछ कविताएँ लिख ही डाली। खूब वाह-वाही बटोरा। तब से अब तक अनवरत लिख रहे हैं। वर्तमान में कवि पंकज दिल्ली महानगर में नौकरी की खाक छान रहे हैं।

रचनाएँ-
मुख्य रूप से कवि पंकज तिवारी हिन्दी कविता/गजल लिखते हैं जिसका कोई प्रमाणित संकलन उपलब्ध नहीं है। (२५-३० कविताएँ)






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कविताप्रेमी का कहना है :

दिवाकर मिश्र का कहना है कि -

आप सभी कविगण एक महान कार्य की ओर अग्रसर हुए हैं । आपका यह हिन्दी सेवा का प्रयास बहुत ही फलदायी होगा और अनेक कवियों को, जिनमें कवि है तो पर सोया या अलसाया हुआ है, जागेगा और अपनी क्षमताओं को पहचानेगा और निखारेगा । धीरे धीरे इस आन्दोलन का विस्तार नए नए क्षेत्रों में होगा और इसमें नए नए लोग जुड़ते रहेंगे और हिन्दी का भी लाभ करेंगे और स्वयं भी लाभान्वित होंगे । हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं ।

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