एक गहन अन्धेरी गुफा से
अपना जीवन चुरा कर
चक्रव्यूह में फंस गया हूं
रोता रहा रात भर
बचाओ ! बचाओ!
वर्जनाओं के घेरे में
दबे पांव चलने के बावजूद
उफनता दूध गीर पड़ा पैरों पर
क्योंकि मां का दूध
चुरा कर ले जा रहा था
बिना ऋण चुकाये
भाग निकला था….
पर आवरण में
कुछ दिखाई न दिया
टहनियों में छुपते छुपाते…
तिमिर इतना गहन कि
डाली काटने के बदले
हाथ काट लिया
फिर अपने से कट कर
मनमानी का अर्थ भी भूल गया
जिसका इल्जाम ढो रहा था
निर्दोष साबित करने में
झुलसाता रहा अपनी अक्ल को
उन्माद प्रतीत होता था सब को
इस भटकन में
डर के मारे
देखता था तिरछी नजरों से
जहां पर सजा कर रखी थी हर चोरी की चीज
जो जबरदस्ती बांध कर
थानेदार ने मेरे भेजे में उतारी थी
वह भी उस भेजे में
जिसमें थी केवल राख
जो नानी माँ ने
घुट्टी में पिलाई थी
चुपके चुपके सरक कर
फैली है बदन में
बनती है राह का रोड़ा
जिससे ठोकर खाये बिना
निकल जाना चाहता हूँ
कि कोई पदचाप भी सुन न ले
पकड़ा न जाऊँ
आखिर तो है जवाब मेरे पास
सब की साजिश का
इस दुनियाँ को ही मार दूँ
खुद मर कर…
पर रोक लेती है माँ मुझे
जाने कहाँ से टपक पड़ी थी
पिछ्ली बार
कंजूस बनिये की तरह
क्योंकि बाकी ही तो था
उसके दूध का ऋण ।
- हरिहर झा
-
कुछ कवितायें खजाने से
दिल्ली में कड़ाके की ठंड, पारा दो डिग्री से नीचे
एकतरफ़ा मोहब्बत
गैलीलियो निखिल आनंद गिरि की क्षणिकाएँ -
अक्टूबर माह के यूनिकवि अपूर्व शुक्ल की कविताएँ
बसंत का गीत
गुमशुदा चीजों के प्रति
समय की अदालत में
इक्कीसवीं सदी का भविष्य
मिलिए दिसम्बर 2009 के यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के विजेताओं से। इस बार बहुत उम्दा-उम्दा कविताएँ सम्मिलित हुई हैं।
क्या आप इस सप्ताहांत फिल्म देखने जाने की योजना बना रहे हैं तो सप्ताह की बड़ी रीलिज पर पढ़िए फिल्म समीक्षक प्रशेन ह. क्यावल की राय








आइएगा ज़रूर, आपकी प्रतीक्षा रहेगी
12 दिसम्बर को हिन्द-युग्म ने नई दिल्ली में हिन्द-युग्म पर ही प्रकाशित प्रेमचंद के आलेखों पर आधारित पुस्तक का विमचोन कार्यक्रम आयोजित किया और भगत सिंह पर एक विचार-गोष्ठी का भी आयोजन किया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।


आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)
4 कविताप्रेमियों का कहना है :
harihar ji .aap ke dard de sakShat kar kiya.acchaa kiya dard bahar kar diya .ma ka karz ?kya sacmuch ma karz deti hai? aur han to kya use utarnaa sambhav hai?
niyntarknji roman hindi me nahin badal rha hain.shyamskha
जो नानी माँ ने
घुट्टी में पिलाई थी
चुपके चुपके सरक कर
फैली है बदन में
बनती है राह का रोड़ा
जिससे ठोकर खाये बिना
निकल जाना चाहता हूँ
.
बधाई ! एक बहुत ही भाव पूर्ण रचना|
इसकी गहराई एक उम्र गुजारे बिना
नही पकडी जा सकती है |
सादर |
विनय
सुंदर भाव और सुंदर शब्दों का सुंदर समन्वय.
खुद मर कर…
पर रोक लेती है माँ मुझे
जाने कहाँ से टपक पड़ी थी
पिछ्ली बार
कंजूस बनिये की तरह
क्योंकि बाकी ही तो था
उसके दूध का ऋण ।
हरिहर जी
बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।
आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)